essay on population growth in hindi भारत की जनसंख्या वृद्धि पर निबंध

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हेलो दोस्तों आज फिर मै आपके लिए लाया हु essay on population growth जिससे हम हिंदी में जनसंख्या वृद्धि कहते है। जनसंख्या वृद्धि किसी भी देश के लिए बहुत बड़ी समस्या है इस आर्टिकल में हम जनसंख्या वृद्धि पर बात करेंगे। आज हम आपको essay on population growth in Hindi यानि जनसंख्या वृद्धि के बारे में बताएँगे तो अगर आप अपने बच्चे के लिए जनसंख्या वृद्धि पर निबंध ढूंढ रहे है तो यह आपके बच्चे के होमवर्क में बहुत मदद करेगा।

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भूमिका :

हमारा भारतवर्ष वैसे तो हर क्षेत्र में बहुत प्रगति कर रहा है लेकिन फिर से यह अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है। 15 अगस्त, 1947 की स्वतन्त्रता प्राप्ति के साथ ही हमारा देश अनेक आर्थिक समस्या से जूझ रहा है, जिनमें एक प्रमुख समस्या है-दिन-रात जनसंख्या वृद्धि।

भारत की जनसंख्या :

हमारे देश की जनसंख्या दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रही है। परिणामस्वरूप आज हमारे देश की कुल जनसंख्या 100 करोड़ के आँकड़े को पार कर चुकी है। जनसंख्या के आधार पर आज हमारा देश चीन के बाद दूसरे स्थान पर है।

जनसंख्या वृद्धि के प्रमुख कारण 

जनसंख्या वृद्धि के अनेक कारणों  में दो कारण मुख्य हैं। पहला कारण है बाह्य तथा दूसरा कारण है आन्तरिक । बाह्य कारणों में है सन 1947 का भारत-विभाजन। उस समय अनगिनत शरणार्थी भारत में आकर बस गए और फिर उसके बाद समय-समय – विदेशी भी भारत में आकर बस रहे हैं जिसके कारण भारत की जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है। आन्तरिक कारणों में है-जन्मदर का तेजी से बटन तथा मृत्युदर का नीचे गिरना।

इस असंतुलन का मुख्य कारण है लोगों की अज्ञानता तथा अशिक्षा। आज भी नीचे तबके के लोग बच्चों को भगवा की इच्छा मानकर पैदा करते रहते हैं और इसके दुष्परिणामों की चिन्ता न करते । मृत्युदर कम होने के कारण है स्वास्थ्य तथा चिकित्सा सुविधाओं में निरन्तर सुधार होना, शिशु मृत्युदर में कमी होना।

जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणाम :

इस समस्या का हम भारतीयों को निरन्तर सामना करना पड़ रहा है। प्रतिव्यक्ति आमदनी कम होना, जनसंख्या का धरती पर अत्यधिक दबाव, जीवन-स्तर में गिरावट, चिकित्सा तथा शिक्षा सुविधाओं की कमी, अन्न की कमी, बेकारी तथा बेरोजगारी की समस्या इत्यादि सभी जनसंख्या वृद्धि की ही देन है।

इन समस्याओं से छुटकारा हम तभी पा सकते हैं, जब हम तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या पर रोक लगाएँगे। हमारा देश भूखमरी, बेरोजगारी, निर्धनता, भिक्षावृत्ति तथा अनेक सामाजिक तथा आर्थिक बुराइयों से छुटकारा भी जनसंख्या पर रोक लगाकर ही पा सकता है। हमारी प्रगति तब तक बेकार है जब तक हम जनसंख्या वृद्धि पर रोक नहीं लगा सकते।

समस्या का समाधान :

समय-समय पर अनेक अर्थशास्त्रियों तथा समाज-सुधारकों ने इस समस्या को सुलझाने के उपाय बताए हैं। उनके अनुसार इस समस्या का निदान देश में आर्थिक तथा सामाजिक प्रगति लाकर ही किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त विवाह आयु निश्चित करना, दो से अधिक बच्चों पर रोक लगाना, परिवार नियोजन, शिक्षा, जागरूकता, नारी-शिक्षा, लड़का-लड़की समानता आदि को प्रोत्साहित करके तथा लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाकर भी इस समस्या से निजात पाया जा सकता है।

निष्कर्ष :

परिवार नियोजन के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए माज सेवी संस्थाओं का आयोजन किया जाना चाहिए। हमारे राजनेताओं ने भी इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। तभी हम इस समस्या से अपर उठ सकते हैं नहीं तो एक समय ऐसा आएगा जब इस धरती पर रहने के लिए किसी को भी पर्याप्त स्थान नहीं मिलेगा तथा लोगों को मजबूरीवश बिलों में रहना पड़ेगा।

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भारत में जनसंख्या भयावह दर से बढ़ रही है. 2001 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या लगभग 102.8 करोड़ है. 1991 में जनसंख्या लगभग 86 करोड़ थी, इस प्रकार एक दशाब्दी में 21 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई. यदि हम इन आँकड़ों की तुलना इससे पूर्व की जनगणनाओं के आँकड़ों से करें तो हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि औसतन प्रत्येक दशाब्दी में जनसंख्या लगभग 25 प्रतिशत बढ़ी है.

अनेक उपायों को अपनाने के बावजूद हम पर्याप्त रूप से इस प्रतिशत को घटाने में सफल नहीं रहे हैं. नतीजा यह है कि हमारे यहाँ जनसंख्या विस्फोट का खतरा उत्पन्न हो गया है और हम अति जनसंख्या की ओर बढ़ रहे हैं. अति जनसंख्या वह स्थिति है जिनमें जनसंख्या उपलब्ध साधनों के आगे बढ़ जाती है, भारत में यह स्थिति बहुत ही निकट भविष्य में पहुँच जाएगी. अति जनसंख्या भी बहुत से खतरों से परिपूर्ण है, भूख, बीमारी, दयनीय आवास की दशाएँ. अकाल, कुपोषण  आदि बुराइयाँ अति जनसंख्या के साथ चलती हैं.

भारत की यह बढ़ती हुई जनसंख्या चिन्ता का विषय बन गई है, क्योंकि हम प्रत्येक वर्ष एक करोड़ से अधिक व्यक्ति अपनी पहले से  ही बहुत बड़ी जनसंख्या में जोड़ देते हैं, बढ़ती हुई जनसंख्या में स्थान की समस्या उत्पन्न कर दी है. आवास की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है. सड़कों पर भीड़ रहती हैं। और ट्रैफिक जाम हो जाते हैं. ट्रेनों और बसों में इस कदर अत्यधिक भीड़ रहती है कि यात्रा अपने में ही वास्तव में एक साहसी काय बन गई है.

शैक्षिक संस्थाएँ प्रवेश की समस्या का सामना कर रही है. एक समन्वित रणनीति के अभाव में शिक्षा का स्तर इतनी तीव्रगति से गिर रहा है कि अव कोई स्तर ही नहीं रहा है. यदि जनसंख्या वर्तमान भयावह दर से बढ़ती रही तो हमारे सभी विकास के प्रयास निग्थक हो जायेगे, निधना का कोई राहत नहीं पहुंचा  सकेंगे और जीवन के रहन सहन के स्तर में कोई पर्याप्त प्रगति नहीं हो पाएगी. भारत में जहाँ पर कि जनसंख्या पहले से ही 102 करोड़ की संख्या को पार कर चुकी हो, उसमें अब अधिक बढ़ोत्तरी से बर्बादी ही होगी, परमाणु वमों से होने वाली बर्बादी से भी अधिक भयावह  बवाद भारत की वृहत जनसंख्या के बहुत से कारण हैं, प्रथम, भारत एक गरम देश है, जहाँ  पर लड़कियां जल्दी उम्र में ही परिपक्वता को प्राप्त कर लेती हैं और दम्पत्तियों में जनन अवधि अन्य देशों की अपेक्षा यहाँ अधिक है, द्वितीय, बड़े परिवार की स्थिति के लिए बाल विवाह की प्रथा ने काफी योगदान किया है.

निर्धनता भी भारत की बड़ी जनसंख्या के लिए कि मुख्य कारण है गरीव दम्पनियों के जीवन में सेक्स के अतिरिक्त मनोरंजन का अन्य कोई साधन नहीं है, इसका नतीजा होता है परिवार में बच्चों की अधिक संख्या होना, इसके अतिरिक्त, हमारी अज्ञानी जनता वड़े परिवारों को दायित्व के स्थान पर सम्पत्ति समझती है।

क्योंकि परिवार में अतिरिक्त बच्चे होने का अर्थ है कमाने वालों की ज्यादा संख्या होना और । परिवार की आय में अतिरिक्त वृद्धि होना. पिछले दशकों में गिरती हुई मृत्यु दर ने भी । जनसंख्या बढ़ोत्तरी में योगदान किया है. बड़े पैमाने पर विदेशों से लोगों का भारत आना और यहाँ आकर बस जाना, यह भी बढ़ती हुई जनसंख्या का एक कारण रहा है. प्राचीन भारत में आक्रामकों के झुंड के झुंड भारत में घुस आए और यहाँ आकर बस गए.

मंगोलिया, चीन और अरव के देशों से भारत में बहुत बड़ी संख्या में मुसलमानों का आना हुआ. ये लोग आक्रमणकारियों के साथ आए और यहाँ आकर बस गए. हाल ही में हमको बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और अफ्रीका के कुछ देशों से बड़ी संख्या में विदेशी लोगों का आना देखने को मिला है. कुछ पिछले समय से कुछ राजनीतिक कारणों से जनसंख्या के कुछ वर्ग अपने परिवारों का आकार सीमित करने से कतराते रहे हैं, क्योकि लोकतंत्र में संख्या का बहुत महत्त्व है, मुस्लिम और अनुसूचित जाति/जनजाति के लोग परिवार नियोजन नहीं अपनाते हैं, क्योकि वे समग्र जनसंख्या में अपने समुदाय की संख्या का प्रतिशत बढ़ाना चाहते हैं.

इसलिए इसमें आश्चर्य नहीं है कि हिन्दुओं की तुलना में मुसलमानों की जनसंख्या में अधिक तीव्रगति से वृद्धि हुई है. प्रत्येक दम्पत्ति में परिवार के लिए बालक शिशु के लिए उत्कट इच्छा भी परिवार के वड़ा होने में एक महत्वपूर्ण कारक है. वे सन्तान उत्पत्ति जब तक वन्द नहीं करेंगे, जब तक कि लड़के का जन्म न हो जाए. इन सभी कारणों से हमारी जनसंख्या में अति वृद्धि हुई है, इतनी कि हम यह सोचकर कॉप जाते है कि यदि जनसंख्या वृद्धि को उचित नियन्त्रण में नहीं लाया गया तो लगभग अगले पचास वर्ष में क्या दशा होगी ?

अतः हमको जनसंख्या नियन्त्रण के कार्यक्रम को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए. सबसे पहली आवश्यकता है हमारी समस्त जनसंख्या को शिक्षा उपलब्ध कराना, शिक्षा के द्वारा वडे परिवारों के विषय में रूढ़िवादी विचारों को बदलना चाहिए, हमें अपनी जनता के रहन सहन के स्तर को ऊँचा उठाना है, रहन सहन का स्तर और परिवार का आकार साथ साथ चलते है.

परिवार कल्याण कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से चलाया जाना चाहिए, जनसंख्या नियन्त्रण के सभी उपायों को प्रचारित करने के लिए सभी प्रयास किए जाने चाहिए प्रोत्साहन के अतिरिक्त, जो दम्पत्तियों को परिवार नियोजन करने पर प्रदान किए जाते हैं कुछ निरुत्साह करने के तरीकों की भी उतनी ही आवश्यकता है. हमारे समक्ष चीन एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है, ‘एक परिवार एक बच्चे के आदर्श पर सख्ती से चलकर वे जनसंख्या के प्रत्येक वर्ष होने वाली बढ़ोतरी के प्रतिशत को पर्याप्त रूप से घटाने में सफल रहे हैं हमारे समक्ष चीन के उदाहरण पर अमल करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है कि परिवार नियोजन कार्यक्रम की परम्परा, धर्म आदि के आधार पर जनसंख्या के विभिन्न वर्गों में बिना भेदभाव किए कठोरता से लागू करें.

हमारे लिए परिणाम बहुत भयावह होंगे यदि जनसंख्या वर्तमान गति से बढ़ती रही. हमको सरकार के साथ उसके जनसंख्या नियन्त्रण के उपायों को सफल बनाने के लिए सहयोग प्रदान करना चाहिए, सरकार के प्रत्येक विभाग को परिवार नियोजन को अपनी प्राथमिकताओं के शीर्ष पर रखना चाहिए, प्रत्येक योजना में परिवार नियोजन के लिए रखे गए काफी मात्रा की धनराशि के अद परिणाम निकलने चाहिए और आने वाले वषों में जनसाव्या वृद्धि के प्रतिशत में पर्यात कमी आनी चाहिए।

जनसंख्या नियंत्रण के लिए उठाए जाने वाले उपायों के साथ-साथ ही हमें विकास की और अतिरिक्त संसाधन उत्पन्न करने की गति में भी तीव्रता लानी होगी जिससे अति संख्या की स्थिति को टाला जा सके.

भ्रूण परीक्षण का विषय भी विवादास्पद बना हुआ है. दम्पत्तियों द्वारा भ्रूण परीक्षण यह निर्धारित कराने के लिए कराया जाता है कि गर्भ में लड़का है अथवा लड़की. यदि गर्भ में स्थित उनकी इच्छा के बच्चे के लिंग से भिन्न बच्चा है तो वे गर्भपात करा देते हैं. मानवीय दृष्टिकोण से इसको अपराधिक कृत्य समझा जा सकता है और काफी संख्या में लोग इसके विरुद्ध हैं, किन्तु यदि इससे जनसंख्या नियंत्रण में सहायता मिलती है तो इसको उसी प्रकार कानूनी रूप दिया जा सकता है जिस प्रकार गर्भपात अथवा चिकित्सीय आधार पर गर्भपात को कानूनी रूप दिया जा चुका है.

अनिच्छित सन्तान रखने और बढ़ती हुई जनसंख्या का बोझ उठाते रहने में कोई तुक नहीं दिखाई देती, किन्तु इस कानूनीकरण को सावधानियों और प्रतिबन्धों के साथ लागू किया जाना चाहिए और यह सुनिश्चित कर लिया जाना चाहिए कि इस प्रेक्टिस से जनसंख्या में स्त्री पुरुष अनुपात पर तो प्रतिकूल प्रभाव न पड़े. भारतीय संसद ने भ्रूण परीक्षण का अगस्त 1994 के विधेयक के द्वारा गैर कानूनी और अपराधिक करार दे दिया है.

इसको उसने चिकित्सीय संस्तृत मामलों में ही अनुमति दी है. यह कदम भारत के उन लोगों पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए लिया गया है जिनकी वैज्ञानिक तरीकों का दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति होती है. कुछ भी हो जनसंख्या पर नियंत्रण आवश्यक है.

जनसंख्या नीति-2000 

सरकार जनसंख्या विस्फोट से उत्पन्न खतरों के प्रति सजग है. इसी को ध्यान में रखकर जनसंख्या नीति-2000 बनाई गई. इसमें जनसंख्या को 2045 तक स्थिर करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. जन्म-दर को काफी घटाना है. प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक जनसंख्या आयोग का भी गठन किया गया है जो जनसंख्या नियंत्रण के लिए किए जाने वाले उपायों का प्रवर्तन करेगा. हमें आशा करनी चाहिए कि अति की जनसंख्या (Over population) की स्थिति हमारे देश में उत्पन्न नहीं होगी.

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देश का आर्थिक विकास और कल्याण काफी हद तक जनसंख्या वृद्धि दर पर निर्भर करता । है। जनसंख्या उत्पादन का एक महत्वपूर्ण स्रोत ही नहीं होता अपितु उत्पादन का उद्देश्य भी इसी पर निर्भर करता है। उत्पादन मनुष्य की वर्तमान तथा भावी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जाता है। जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव अर्थव्यवस्था के विकास के साथ-साथ देश के आर्थिक विकास पर भी पड़ता है। इस प्रकार जनसंख्या वृद्धि और आर्थिक विकास परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। भारत की जनसंख्या आज विश्व में दूसरे स्थान पर है तथा आज यह 1 अरब की रेखा पार गई है। वर्तमान में भारत में विश्व की जनसंख्या का 16 प्रतिशत हिस्सा निवास कर रहा है। पिछले पचास वर्षों में भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ी किसी भी देश में अगर क्षेत्रफल के अनुपात में जनसंख्या कम हो, तो वहाँ जनसंख्या में वृद्धि आर्थिक विकास में सहायक होती है, क्योंकि देश की भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों का समुचित एवं पर्याप्त उपयोग सम्भव हो पाता है। इस प्रकार, जनसंख्या किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को बहुत प्रभावित करती है।

भारत के संदर्भ में यह विचारधारा भिन्न है। भारत की जनसंख्या बहुत अधिक है, जो कि भारत के आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न करती है। भारत की निरंतर बढ़ती जनसंख्या के कारण यह दबाव और भी बढ़ता जा रहा है। जनसंख्या के कारण कृषि भूमि पर भार तेजी से बढ़ रहा है, जिससे प्रति व्यक्ति कृषि योग्य भूमि का औसत घट रहा है। इसका कृषि के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जनसंख्या में वृद्धि के कारण खाद्यान्न की पूर्ति नहीं हो पाती, जिससे खाद्य संकट की स्थिति पैदा हो जाती है तथा लोगों की कार्यदक्षता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। अत: यह स्पष्ट है कि भूमिगत संसाधनों व जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत की बढ़ती जनसंख्या उसके आर्थिक विकास में बाधक हैं।।

जनसंख्या की अधिकता के संबंध में निर्णय किसी अन्य देश की जनसंख्या घनत्व को देखकर नहीं लिया जा सकता बल्कि यह उस देश-विशेष के उपलब्ध संसाधनों, उनके उपयोग पर निर्भर करता है। यह जरूरी नहीं है कि जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ उत्पादन में भी वृद्धि  हो। उत्पादन अधिशेष तभी प्राप्त किया जा सकता है जब उत्पादन की तकनीक में विशेष सुधार किया जाए तथा संसाधनों का सही प्रयोग किया जाए। यदि ऐसा न किया जाए तो यह बचत और निवेश को हतोत्साहित करता है। इससे आर्थिक विकास में कई तरह की परेशानियों का जन्म होता है।

भारत में कृषि उत्पादन अनेक देशों की तुलना में बहुत कम है। इसमें  वृद्धि लाने के लिए क्षेत्र तो पर्याप्त है, लेकिन पूँजी, पूँजीगत सामान एवं तकनीक की कमी भारत में आय का स्तर भी बहुत कम है, जिसके कारण जनसंख्या वृद्धि से बाजार विस्तार की उम्मीद नहीं की जा सकती। अत: बड़े पैमाने पर उत्पादन प्रणाली एवं विशिष्टीकरण को अपनाना संभव नहीं हो सकता। पूँजीगत पदार्थों का निर्माण करना भारत की मूल समस्या है।

प्राकृतिक संसाधन एवं श्रम की पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद पूँजी की कमी के कारण इनका पर्याप्त उपयोग नहीं हो पाता। भारतीय अर्थव्यवस्था की मूल समस्या निम्न आय स्तर है और इसके लिए तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या जिम्मेदार है।

अत: भारत जैसे विकासशील देशों के आर्थिक विकास में जनसंख्या वृद्धि साधक कम बाधक अधिक होती है। जनसंख्या में निरंतर वृद्धि से आज भारत के सामने श्रम आधिक्य की समस्या है। देश की जनसंख्या अधिक होने के कारण बेरोजगारी भी बढ़ रही है। बेरोजगारी की समस्या भारतीय अर्थव्यवस्था की बहुत बड़ी विडंबना बनी हुई है। भारत के संदर्भ में तेजी से बढ़ती जनसंख्या के लिए रोजगार तथा उत्पादन एवं उपभोग की वस्तुओं को जुटाने के लिए अधिक मात्रा में पूँजी की आवश्यकता होती है। पूँजी की मात्रा में वृद्धि से ही रोजगार एवं आवश्यक साधनों को उपलब्ध कराया जा सकता है।

पूँजी निर्माण की दर में वृद्धि जितनी अधिक होगी, उतनी ही तेजी से आर्थिक विकास होगा। यदि जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ती है तो उससे उपभोग की मात्रा में भी वृद्धि होती है जिसके कारण बचत क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण पूंजी निर्माण संभव नहीं हो पाता। इस प्रकार बढ़ती जनसंख्या और पूंजी निर्माण में कमी से अर्थव्यवस्था अवरुद्ध हो जाती है।

तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या के कारण प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि एवं लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना कठिन हो जाता है। यदि राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है, तो भी प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि नहीं हो पाती। राष्ट्रीय आय में तभी वृद्धि हो सकती है जब बचत और निवेश में भी वृद्धि हो, लेकिन यह सब जनसंख्या आधिक्य के कारण संभव नहीं हो पाता।

आर्थिक विकास के लिए बेहद जरूरी है कि जनसंख्या नियंत्रण के साथ साथ परिवार नियोजन के द्वारा जन्मदर को घटाने का प्रयास किया जाए। पूरी अर्थव्यवस्था का केंद्र मानव और उसका उत्पादन है। उत्पादन में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। अत: उपलब्ध संसाधन में लोगों की कार्यकुशलता एवं क्षमता में वृद्धि लाना आवश्यक है। जनसंख्या आर्थिक विकास में तब तक ही सहयोगी है, जब तक वह नियंत्रित एवं अर्थव्यवस्था के अनुरूप है।

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बढ़ती आबादी : समस्या व समाधान आंकड़ों के आईने में देखा जाए तो संसार के कुल क्षेत्रफल का मात्र 2.4 प्रतिशत भू-भाग भारत के पास है जबकि दुनिया की कुल आबादी का 16.7 प्रतिशत भाग देश में निवास करता है। स्पष्ट है, भारत में क्षेत्रफल व जनसंख्या का अनुपात असमान है। इस कारण बढ़ती जनसंख्या का विषय और भी जटिल हो जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार हमारे देश की जनसंख्या 1 अरब 21 करोड़ तथा जनसंख्या घनत्व 382 प्रति वर्ग कि.मी. है। इस एक अरब 20 करोड़ से अधिक आबादी में प्रति 1000 पुरुषों पर 940 स्त्रियों का अनुपात है।

प्रतिवर्ष  1.70 करोड़ नागरिक अतिरिक्त रूप से हमारी आबादी में सम्मिलित हो जाते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार 2001-2011 में जनसंख्या की वृद्धि दर 7.64 प्रतिशत रही। हमारे देश में सन् 1975 में जनसंख्या को कारगर तरीकों से रोकने के उपाय किए गए थे परन्तु उन उपायों को लेकर काफी हाय-तौबा मची थी। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकार ही बदल गई। जिस ढंग से परिवार नियोजन के कार्यक्रम लागू किए गए उन्हें  जनता ने पसन्द नहीं किया।

हमारे देश का दुर्भाग्य यह रहा है कि यहां के नेताओं की सत्ता लिप्सा ने कर्तव्य पालन की भावना को नकार दिया है। चीन में इसके विपरीत स्थिति होने से वह एक महाशक्ति | बन गया है। जनसंख्या को नियंत्रित करने में उसके द्वारा जो कार्रवाई की गई है वह भारत के लिए अनुकरणीय है।

जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए सरकार तथा जनता दोनों को मिलकर काम करना होगा तभी इसमें सफलता मिल पाएगी। प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में परिवार नियोजन के लिए अपार धनराशि निर्धारित करनी पड़ेगी। इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि परिवार नियोजन कार्यक्रमों के अन्तर्गत जो लाभ दिए जाने हों, वे केवल उन्हीं को दिए जाएं जो वास्तव में परिवार नियोजन को व्यावहारिक रूप दे रहे हों।

गर्भ निरोधक औषधियां, निरोध, स्वास्थ्य संबंधी परामर्श की व्यवस्था इतने अन्तर पर करनी चाहिए ताकि दम्पतियों को उचित सलाह लेने के लिए भागना न पड़े और उनका ज्यादा समय खराब न हो।

एक अन्य उपाय और है जिसके द्वारा परिवार नियोजन को सफल बनाकर जनसंख्या को नियंत्रित किया जा सकता है वह है सरकारी लाभों को सीमित करना। सरकार की तरफ से ऐसा ऐलान होना चहिए कि राशन, चिकित्सा, ऋण आदि की सुविधाएं केवल उन  दम्पतियों को मिलेंगी जिनके दो सन्तानें होंगी। इससे अधिक जितनी सन्तानें होंगी उनके लिए माँ-बाप को अपने स्तर पर बाजार भाव से राशन खरीदना होगा।

चिकित्सा खुद खर्च करके करवानी होगी। शिक्षा संस्थाओं में ज्यादा फीस देने पर प्रवेश मिलेगा। सरकारी नौकरी में भी उन्हीं लोगों को तरक्की दी जानी चाहिए जिनके दो से अधिक बच्चे न हों। यदि इस प्रकार के कुछ नियम बनाए जाएं तथा कुछ अवरोध लगाए जाएं, तो एक दशक के भीतर जनसंख्या पर काफी सीमा तक काबू किया जा सकता है। चीन में इस प्रकार के कुछ नियम बनाए गए हैं जिसके शुभ परिणाम सामने आने लगे हैं।

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बढ़ती आबादी : समस्या व समाधान

सन् 2011 के पूर्वार्द्ध में हुई जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 1,21,01,93,422 थी। दुनिया में भारत चीन के बाद सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। क्षेत्रफल व आकार के अनुपात में देश की जनसंख्या कहीं ज्यादा है। इस बढ़ती हुई आबादी का ही यह दुष्प्रभाव है कि आज देश में बेरोजगारों की तादाद दिनोंदिन सुरसा के मुख सदृश बढ़ती जा रही है। सरकार जो भी विकास योजनाएं बनाती है, उसके अच्छे प्रभावों को यह बढ़ी हुई आबादी निष्फल बना देती है।

यही नहीं इस बढ़ी हुई आबादी के कारण ही नागरिक सुविधाओं व जनसुविधाओं की हालत दिनोंदिन खस्ता होती जा रही है। यही नहीं इस बढ़ती हुई आबादी के दुष्परिणामस्वरूप आवासीय समस्या व खाद्यान्न का संकट भी विकराल रूप लेता जा रहा है। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक संतुलन-हवा, पानी व प्रकृति प्रदत्त सुविधाएं भी बिगड़ रही हैं।

आंकड़ों के आईने में देखा जाए तो संसार के कुल क्षेत्रफल का मात्र 2.4 प्रतिशत भू-भाग भारत के पास है, जबकि दुनिया की कुल आबादी का 16.7 प्रतिशत भाग देश में | निवास करता है। स्पष्ट है, भारत में क्षेत्रफल व जनसंख्या का अनुपात असमान है। इस कारण बढ़ती जनसंख्या का विषय और भी जटिल हो जाता है। हमारे देश में जनसंख्या घनत्व 382 प्रति वर्ग कि.मी. है। इस एक अरब से अधिक आबादी में प्रति 1000 पुरुषों पर 940 स्त्रियों का अनुपात है।

प्रतिवर्ष 1.70 करोड़ नागरिक अतिरिक्त रूप से हमारी आबादी में सम्मिलित हो जाते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार 2001-2011 में जनसंख्या की वृद्धि दर 17.64 प्रतिशत रही।।

हमारे देश में सन् 1975 में जनसंख्या को कारगर तरीकों से रोकने के उपाय किए  गए थे परन्तु उन उपायों को लेकर काफी हाय-तौबा मची थी। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकार ही बदल गई। जिस ढंग से परिवार नियोजन के कार्यक्रम लागू किए गए उन्हें जनता ने पसन्द नहीं किया।

हमारे देश का दुर्भाग्य यह रहा है कि यहां के नेताओं की सत्ता लिप्सा ने कर्तव्य पालन की भावना को नकार दिया है। चीन में इसके विपरीत स्थिति होने से वह एक महाशक्ति बन गया है। जनसंख्या को नियंत्रित करने में उसके द्वारा जो कार्रवाई की गई है वह भारत के लिए अनुकरणीय है।

जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए सरकार तथा जनता दोनों को मिलकर काम करना होगा; तभी इसमें सफलता मिल पाएगी। प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में परिवार नियोजन के लिए अपार धनराशि निर्धारित करनी पड़ेगी। इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि परिवार नियोजन कार्यक्रमों के अन्तर्गत जो लाभ दिए जाने हों, वे केवल उन्हीं को दिए जाएं जो वास्तव में परिवार नियोजन को व्यावहारिक रूप दे रहे हों।

गर्भ निरोधक औषधियां, निरोध, स्वास्थ्य संबंधी परामर्श की व्यवस्था इतने अन्तर पर करनी चाहिए ताकि दम्पतियों को उचित सलाह लेने के लिए भागना न पड़े और उनका ज्यादा समय खराब न हो। एक अन्य उपाय और है जिसके द्वारा परिवार नियोजन को सफल बनाकर जनसंख्या को नियंत्रित किया जा सकता है वह है सरकारी लाभों को सीमित करना। सरकार की तरफ से ऐसा ऐलान होना चहिए कि राशन, चिकित्सा, ऋण आदि की धाएं केवल उन दम्पतियों को मिलेंगी जिनके दो सन्तानें होंगी। इससे अधिक जितनी सन्तानें होंगी उनके लिए माँ-बाप को अपने स्तर पर बाजार भाव से राशन खरीदना होगा।

चिकित्सा खुद खर्च करके करवानी होगी। शिक्षा संस्थाओं में ज्यादा फीस देने पर प्रवेश मिलेगा। सरकारी नौकरी में भी उन्हीं लोगों को तरक्की दी जानी चाहिए जिनके दो से अधिक बच्चे न हों। यदि इस प्रकार के कुछ नियम बनाए जाएं तथा कुछ अवरोध लगाए जाएं, तो एक दशक के भीतर जनसंख्या पर काफी सीमा तक काबू किया जा सकता है। चीन में इस प्रकार के कुछ नियम बनाए गए हैं जिसके शुभ परिणाम सामने आने लगे हैं।

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