Dussehra Essay in Hindi – दशहरा पर निबंध @ 2019

हेलो दोस्तों आज फिर में आपके लिए लाया हु एक और essay का article इसमें हम आपको बातयेंगे Dussehra Essay in Hindi में जिससे आप पूरी तरह से उसको समझ सके और अपने बच्चो को पढ़ा सके। आजकल हिंदी भाषा का परियोग सिर्फ स्कूल तक ही सीमित हो गया है क्योकि इंग्लिश ने हर जगह अपना स्थान बना लिया है लेकिन हिंदी भाषा का विषय स्कूलों में होना इससे अभी तक बचया हुवा है। तो निचे दिए गए है essay on Dussehra in hindi के कई प्रकार जैसे की 100 ,200 ,300 ,400 ,500 ,600 शब्दो के निबंध जो आप अपनी जरूरत के अनुशार यूज़ कर सकते है।

Dussehra Essay in Hindi

 

भारत भूमि त्यौहारों की भूमि है। विजयदशमी भारतीयों का एक पुनीत, सांस्कृतिक तथा धार्मिक पर्व है। इस दिन भगवान राम ने दस सिर वाले असुर रावण का वध किया था इसीलिए इसको ‘दशहरा’ कहा जाता है। यह पर्व असत्य पर सत्य की तथा बुरे पर अच्छाई की विजय का । प्रतीक है। इसीलिए इसे ‘विजयदशमी’ भी कहते हैं।

मनाने की तिथि :

यह त्यौहार प्रतिवर्ष अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है। उत्तरी भारत में यह ‘विजयदशमी’ के रूप ३ तथा बंगाल में दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। यह त्यौहार शरद ऋतु का त्यौहार है।

दशहरा मनाने का प्रयोजन :

यह पर्व श्री राम भगवान की रावण पर विजय का प्रतीक है। रामचन्द्र जी ने रावण का मी दिन विभीषण को लंका का राज्य सौंपा गया था। इसी दिन सीता को चन्द्र जी ने रावण का वध इसी दिन किया था। रावण के अत्याचारों से मुक्ति मिली थी। राजस्थान के क्षत्रिय लोग इसा न अपने हथियारी तथा घोड़ों की पूजा करते हैं। किसानों के लिए यह त्यौहार खेती उगाने से सम्बनि

शहरा मनाने की विधि :

दशहरा से पूर्व नवरात्रों में जगह-जगह रामलीलाओं का आयोजन किया जाता है जिनमें रामजी के जीवन की प्रमुख घटनाओं का नाट्य प्रदर्शन किया जाता है। दशहरा वाले दिन रावण-वध की लीला होती है। खुले मैदान में रावण, मेघनाद तथा कुम्भकर्ण के आतिशबाजी भरे पुतलों को जलाया जाता है। बड़े-बड़े मेलों का आयोजन किया जाता है।

बच्चे, जवान सभी नए-नए वस्त्र धारण करके इनका आनन्द लेते हैं। हिन्दू लोग घरों की सफाई करके दशहरे का पूजन करते हैं तथा बहने अपने भाइयों के कानो में नौरतें रखती हैं।

 

दशहरा का सांस्कृतिक महत्व 

विजयदशमी का त्यौहार हमारी सभ्यता तथा संस्कृति का प्रतीक है। इस दिन सैनिक और राजा युद्धाभियान करते हैं, व्यापारी लोग अपने व्यवसाय आदि के लिए दूसरे स्थानों को प्रस्थान करते हैं तथा विवाह, विद्या, यात्रा आदि शुभ कार्य आरम्भ किए जाते हैं।

इसी दिन भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। यह त्यौहार भारतीय समाज में नई चेतना, नए उत्साह, नई स्फूर्ति तथा नए जीवन संचार का प्रतीक है।

उपसंहार :

प्रत्येक त्यौहार की अपनी मर्यादा होती है और वे अपने साथ कोई न कोई संदेश अवश्य लेकर आते हैं। हम सभी का यह उत्तरदायित्व है कि हम हर त्यौहार को उसके पवित्र तथा सहज रूप में मनाएँ।

 

Dussehra Essay in Hindi

 

दशहरा हिन्दुओं के प्रसिद्ध त्यौहारों में से एक है। दशहरा शब्द दशहरा से मिलकर बना है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने इस दिन रावण के दस सिरों का। वध न्याय, धर्म और सत्य की रक्षा के लिए किया था। इसीलिए यह दिन दशहरा कहलाया और इसी याद में यह त्यौहार प्रतिवर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को विजय दशमी के रूप में मनाया जाता है। यह अधर्म पर धर्म की तथा अन्याय पर न्याय की विजय का प्रतीक है।

भारतवर्ष में दशहरे के दस दिन पूर्व से (नवरात्रों में) श्री राम की लीला का अद्भुत प्रदर्शन होता है। इस दिन श्रीराम तथा रावण के युद्ध का प्रदर्शन होता है जिसमें रावण मारा जाता है तथा श्रीराम की विजय होती है। अन्त में रावण, कुम्भकरण व मेघनाद के आतिशबाजी युक्त पुतलों को जलाया जाता है। इस दिन सारे भारत में अनेक विशाल मेलों का आयोजन होता है। बच्चे, बूढे स्त्री पुरुष सभी नए वस्त्र धारण करके इन मेलों का आनन्द लेने जाते हैं।

बंगाल में लोग इस दिन देवी दुर्गा की पूजा करते हैं। वहीं नवरात्रों में नौ दिन तक महिषासुर मर्दिनी कालिका का पूजन होता है। विजय दशमी के दिन माँ दुर्गा की प्रतिमा को नदी अथवा समुद्र में विसर्जित कर दिया जाता है। अनेक भक्तजन नौ दिनों तक व्रत रखते हैं।

यह दिन अनेक कार्यों के लिए शुभ माना जाता रहा है। प्राचीन काल में । यातायात के साधन सुलभ नहीं होते थे। अतः व्यापारी, यात्री, साधु तथा सैनिक, अपनी यात्रा इस दिन को शुभ मान कर प्रारम्भ करते थे। मराठे तथा राजपूत इसी दिन शत्रु पर चढ़ाई करते थे। योद्धा अपने शस्त्रास्त्रों एवं घोड़ों की पूजा करते थे। हिन्द स्त्रियों इस दिन घर की सफाई आदि करके दशहरे के पूजन के बाद अपने भाइयों के कानों में नौरतें टाँगती हैं जो भाई बहिन में स्नेह का प्रतीक है। इसी दिन भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था जिस कारण इस पर्व का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।

दशहरा भारतीय समाज में एक नई स्फूर्ति, नया जीवन तथा नए उत्साह का संचार करता है। इस पर्व से हमें यही शिक्षा मिलती है कि सर्वदा सत्य की विजय तथा असत्य की पराजय होती है। अर्थात् अन्याय व अत्याचार को सहन करना। महान दुर्बलता, नपुंसकता तथा पाप है। यह पर्व सदा से राष्ट्र के उत्थान तथा समाज की प्रगति में सहायक रहा है।

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Dussehra Essay in Hindi

दशहरा हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह त्योहार आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष में दस दिनों तक मनाया जाता है। इन दिनों माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। त्योहार का अंतिम दिन विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है। असत्य पर सत्य की जीत इस त्योहार का मुख्य संदेश है।

माँ दुर्गा शक्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं। जीवन में शक्ति का बहुत महत्त्व है, इसलिए भक्तगण माँ दुर्गा से शक्ति की याचना करते हैं। पं. बंगाल, बिहार, झारखंड आदि प्रांतों में महिषासुर मर्दिनी माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती है। नौ दिनों तक दुर्गासप्तशती का पाठ चलता रहता है। शंख, घड़ियाल और नगाड़े बजते हैं। पूजा-स्थलों में धूम मची रहती है। तोरणद्वार सजाए जाते हैं। नवरात्र में व्रत एवं उपवास रखे जाते हैं।

मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है। प्रसाद बाँटने और लंगर चलाने के कार्यक्रम होते हैं। उत्तर भारत के विभिन्न प्रांतों में रामलीला का मंचन होता है। कहा जाता है कि विजयादशमी के दिन भगवान राम ने लंका नरेश अहंकारी रावण का वध किया था। रावण अत्याचारी और घमंडी राजा था। उसने राम की पत्नी सीता का छल से अपहरण कर लिया था। सीता को रावण के चंगुल से मुक्त कराने के लिए राम ने वानरराज सुग्रीव से मैत्री की। वे वानरी सेना के साथ समुद्र पार करके लंका गए और रावण पर चढ़ाई र दी। भयंकर युद्ध हुआ।

इस युद्ध में मेघनाद, कुंभकर्ण, रावण आदि सभी वीर योद्धा मारे गए। राम ने अपने शरण आए रावण के भाई विभीषण को लंका का राजा बना दिया और पत्नी सीता को लेकर अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। रामलीला में इन घटनाओं का विस्तृत दृश्य दिखाया जाता है। इसके द्वारा श्रीराम का मर्यादा पुरुषोत्तम रूप उजागर होता है।

रामलीलाओं के साथ-साथ अन्य धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। स्थान-स्थान पर मेलों का आयोजन किया जाता है। बच्चे मेले में उत्साह के साथ भाग लेते हैं। वे झूला झूलते हैं और खेल-तमाशे देखते हैं। हर तरफ़ उत्साह और उमंग मचा रहता है। विजयादशमी के दिन रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों के दहन का कार्यक्रम होता है। इसमें हजारों लोग भाग लेते हैं। पुतले जलाकर लोग बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश दोहराते हैं। इस अवसर पर आकर्षक आतिशबाजी भी होती है। फिर लोग मिठाइयाँ खाते और बाँटते हैं।

विजयादशमी के दिन माँ दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन का कार्यक्रम होता है। ट्रकों और ट्रॉलियों पर प्रतिमाएँ लाद कर लोग गाजे-बाजे के साथ चलते हैं। लोग भारी संख्या में इस जलूस में शामिल होते हैं। प्रतिमाएँ विभिन्न मार्गों से होते हुए किसी नदी या सरोवर के तट पर ले जायी जाती हैं। वहाँ इनका विसर्जन कर दिया जाता है। इस तरह दस दिनों तक चलनेवाला उत्सव समाप्त हो जाता है।

दशहरा भक्ति और समर्पण का त्योहार है। भक्त भक्ति-भाव से दुर्गा माता की आराधना करते हैं। नवरात्र में दुर्गा के नौ विभिन्न रूपों की पूजा होती है। दुर्गा ही आवश्यकता के अनुसार काली, शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, कुष्मांडा आदि विभिन्न रूप धारण करती हैं और आसुरी शक्तियों का संहार करती हैं। वे आदि शक्ति हैं। वे ही शिव पत्नी पार्वती हैं। संसार उन्हें पूजकर अपने अंदर की आसुरी शक्ति को नष्ट होने की आकांक्षा रखता है। दुर्गा रूप, जय, यश देती हैं तथा द्वेष समाप्त करती हैं। वे मनुष्ट को धन-धान्य से संपन्न कर देती हैं।

भारत में हिमाचल प्रदेश में कुल्लू घाटी का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है। यहाँ का दशहरा देखने देश-विदेश के लोग आते हैं। यहाँ श्रद्धा, भक्ति और उल्लास की त्रिवेणी देखने को मिलती है।

Dussehra Essay in Hindi

दशहरा हिन्दुओं का मुख्य त्योहार है। दशहरा आश्विन माह की दसवीं तिथि को मनाया जाता है। इस माह में ठण्ड का हल्का-सा आगमन हो जाता है। यह महीना बड़ा ही खुशगवार होता है। इस महीने में न तो अधिक गर्मी होती है और न ही अधिक सर्दी होती है।

दशहरे से दस दिन पहले से रामलीलाओं का प्रदर्शन किया जाता है। दशहरे का महत्त्व रामलीलाओं के कारण सुविख्यात है। भारत के हर शहर एवं गाँव में रामलीला दिखाई जाती है। दिल्ली में तो हर कॉलोनी में रामलीला होती है। परंतु दिल्ली गेट के नज़दीक रामलीला ग्राउण्ड की रामलीला सर्वाधिक मशहूर है। वहाँ पर दशहरे वाले दिन प्रधानमंत्री स्वयं रामलीला देखने आते हैं। उनके साथ अन्य मंत्रीगण एवं अधिकारी भी होते हैं। उनके अलावा वहाँ लाखों लोगों की भीड़ होती है।

दशहरे के दिन भव्य मेले का आयोजन होता है। उस दिन रावण, कुम्भकर्ण एवं मेघनाद के पुतले जलाए। जाते हैं। दरअसल, अधिकांश लोग तो इन्हीं पुतलों को देखने आते हैं। रामलीला के अलावा, दशहरे के दिन आतिशबाजी भी खूब होती है जो दर्शकों का मन मोह लेती है। कई शहरों में तो आतिशबाजी की प्रतियोगिता होती है जिनमें आगरा शहर प्रमुख है।

वहाँ पर कई शहरों से आतिशबाज आते हैं और जिसकी आतिशबाजी सबसे अच्छी होती है, उसे ईनाम दिया जाता है। आतिशबाजी दिखाने के बाद रामचंद्र जी रावण का वध करते हैं। फिर बारी-बारी से पुतलों में आग लगाई जाती है। पहले कुंभकर्ण का पुतला जलाया जाता है। उसके बाद मेघनाद के पुतले में आग लगाई जाती है और सबसे बाद में रावण के पुतले में आग लगाई जाती है।

रावण का पुतला सबसे बड़ा होता है। उसके दस सिर होते हैं और उसके दोनों हाथों में तलवार और ढाल होती है। रावण के पुतले को श्रीराम अग्निबाण से जलाते हैं। रावण के पुतले में आग लगने के पश्चात् सभी दर्शक अपने-अपने घरों को चल पड़ते हैं।

हमारे हिन्दू समाज में दशहरे का दिन अत्यंत शुभ दिन माना जाता है। इस दिन मजदूर लोग अपने-अपने काम के यंत्रों की पूजा करते हैं। और लड्डू बाँटकर खुशी जाहिर करते हैं।

दशहरे का पर्व असत्य पर सत्य एवं बुराई पर अच्छाई की विजय माना जाता है। इस दिन श्री राम ने बुराई के प्रतीक रावण का वध किया था। अत: हमें भी अपनी बुराइयों को त्यागकर अच्छाइयों को ग्रहण करना चाहिए तभी यह दिन सार्थक सिद्ध होगा।

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विजयदशमी का त्योहार प्रतिवर्ष आश्विन शुक्ला दशमी को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। विजयदशमी से कुछ दिन पूर्व क्षत्रिय लोग अपने शस्त्रास्त्रों तथा गणवेशों (वदियों) को चमकाने लगते थे। विजयदशमी के दिन वे प्रातः शस्त्र-पूजन करते तथा सीमोल्लंघन किया करते थे।

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रथमा (पड़वा) को पहला नवरात्र आरम्भ होता है। इस दिन घरों में रामायण की कथा आरम्भ हो जाती है। नगरों और कस्बों में इस दिन से श्रीराम- कथा के आधार पर झाँकियाँ निकलने लगती हैं। ये लगातार नौ दिन तक निकलती रहती हैं और हजारों-लाखों लोग इन्हें वड़ी रुचि तथा श्रद्धा से देखते हैं। दसवें दिन विजयदशमी का पर्व होता है।

यह पर्व बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। एक बड़े मैदान में, जिसे प्रायः रामलीला मैदान कहा जाता है, कागजों के तीन विशालकाय पुतले खड़े किये जाते हैं। इनकी हड्डियाँ बाँस, वेत, लकड़ी आदि से बनी होती हैं। सिर पर मुकुट भी गत्ते आदि के होते हैं। तन पर कागज, कपड़े आदि के रंग-बिरंगे वस्त्र पहनाये गये होते हैं।

खाने-पीने की चीजों, फलों, मूर्तियों, चित्रों, धनुष-बाण आदि वस्तुएँ बेचने वालों की दुकानें सजी होती हैं। लोगों की भीड़ निरन्तर बढ़ती जाती है। तीन-चार बजे तक तो तिल धरने को जगह नहीं रहती । सामने ही रावण, कुम्भकरण और मेघनाद के पुतले होते हैं। लोग रह-रहकर उनकी ओर देखते हैं। इतने में नगर में घूमती हुई राम-लक्ष्मण की सवारी राम- लीला मैदान की ओर आती है। हनुमान् के पीछे लाल वस्त्र पहने वानर-सेना उछलती-कदती आती है। इसके बाद पीछे- पीछे रावण की सवारी आती है। कुम्भकरण और मेघनाद भी आते हैं। उनके पीछे राक्षस-सेना नीले-काले वस्त्र पहने आती है। मैदान में पहुँचकर राम-रावण की सेनाओं में कृत्रिम युद्ध होता है। एक ओर सोने की लंका बनायी गई होती है। हनुमान जी अपने दल सहित जाकर उसे आग लगा देते हैं। इतने में राम अपनी बाण रावण पर चलाते हैं। फिर लक्ष्मण मेघनाद को बाण मारते हैं। तब राम कुम्भकरण पर बाण मारते हैं। इसके साथ ही पुतलों में आग का पलीता लगा दिया जाता है । पुतलों के अन्दर भरे पटाखे ठा-ठा करके चलने लगते हैं। बच्चे, बढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष भगवान राम की जय- जयकार से गगन गुंजाने लगते हैं। देखते ही देखते तीनों राक्षसों के पुतले जलकर राख हो जाते हैं। दशहरा हमें यह शिक्षा दे जाता है कि अपना चरित्र राम की तरह बनाना चाहिए, रावण जैसा नहीं।

 

Dussehra Essay in Hindi

अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक पर्व दशहरा प्रतिवर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है। हमारे देश में विजयदशमी का महत्त्व दो तरह से है। प्रथम तो यह पर्व उस महान् स्मृति का प्रतीक है, जिस दिन दुराचारी, पापात्मा रावण का वध मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने किया था और इस प्रकार अधर्मी का अंत करके और लंका में धर्म की पताका फहराकर श्रीरामचन्द्र अपनी भार्या सीताजी और भाई श्रीलक्षमण के साथ वापस अयोध्या दीपावली के दिन आए थे। दूसरा महत्त्व इसलिए है कि हमारे देश के बंगाल राज्य में शारदीय नवरात्रों का विशिष्ट महत्त्व है तथा जगह-जगह दुर्गाजी की प्रतिमाएं स्थापित करके उनकी नियमित पूजा की जाती है। विजयदशमी को दोपहर 12 बजे पूजा पूरी होती है तथा शाम को प्रतिमाओं का जलाशय अथवा नदी में विसर्जन कर दिया जाता है।

हो सकता है भगवती महाशक्ति पुंज दुर्गाजी ने भी शुंभ-निशुंभ नामक दैत्यों का वध इसी दिन किया हो। इस प्रकार दोनों तरह से दशहरा शक्ति का एक महान् पर्व है। गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम के चरित्र को जन-जन में फैलाने के लिए श्रीरामलीला करने की प्रेरणा दी थी। काशी में सर्वप्रथम रामलीला शुरू हुई थी और अब तो लगभग सम्पूर्ण भारत में श्रीरामलीलाएं होती हैं और आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से लेकर एकादशी पर्यन्त रामलीला का आयोजन धूमधाम से होता है। दिल्ली में तो जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर स्थित एक पुराना मैदान श्रीरामलीला मैदान के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि इस मैदान में रामलीला मुगलों के जमाने से हर वर्ष होती आ रही है।

विजयदशमी का चरम उत्कर्ष होता है दशमी के दिन, अर्थात् जिस दिन रावण मारा जाता है। इस दिन प्रायः सभी रामलीलाओं के प्रबंधक रावण, कुंभकर्ण एवं मेघनाथ के काफी बड़े-बड़े पुतले बनाते हैं। इन पुतलों के अन्दर काफी बारूद भरी होती है। बारी-बारी से इन पुतलों में राम के बाण द्वारा आग लागई जाती है। आग लगते ही पुतलों में कारीगरी के साथ भरी बारूद में विशेष चमक पैदा होती है और ऐसा लगता है कि क्षणभर के लिए मानो पुतलों ने कीमती जेवर और रत्न पहन रखे हों। किन्तु क्षणभर बाद ही बारूद अपना रंग लाती है और पुतले धू-धू कर जलने लगते हैं। मान्यता है कि पुतलों का पीठ के बल गिरना अच्छा नहीं होता। पुतले प्रायः सामने राम को नमन करते हुए गिरते हैं।

दिल्ली की मुख्य रामलीलाओं में कई बड़े-बड़े नेता भी रामलीला देखने के लिए आते हैं। डॉ. जाकिर हुसैन जैसे राष्ट्रपति भी रामलीला में आकर राजा राम को तिलक करते थे। पं. जवाहरलाल नेहरू रामलीला मैदान में रामलीला देखने जरूर आते थे। वे जीप में वैठकर रामलीला मैदान में बैठे लोगों का अभिवादन स्वीकार करते थे। दशहरा अथवा विजयदशमी का त्योहार ऐसा त्योहार है जो हमें यह बताता है कि हमेशा अधर्म पर धर्म की विजय होती है। पाप पर हमेशा पुण्य की विजय होती है। सच्चाई का उद्घाटन अवश्य होता है तथा एक-न-एक दिन लोगों को असलियत का पता अवश्य लग जाता है।

दशहरा के बारे में यह भी कहा जाता रहा है कि यह क्षत्रियों का त्योहार है। ऐसा कहना उचित नहीं है। त्योहारों के बीच जातियों के आधार पर कोई विभाजन रेखा खींचना अनुचित होगा। रक्षाबंधन को कभी ब्राह्मणों का त्योहार माना जाता था। प्राचीन काल में आमतौर से ब्राह्मण जंगलों में रहा करते थे। वे लोककल्याण की भावना से यज्ञ करते थे और यज्ञ करने के उपरान्त यजमान वर्षभर स्वस्थ रहे, इसके लिए उसके हाथ में एक रक्षा सूत्र बांधते थे, जिसे रक्षाबंधन कहा जाता था। वे परम्पराएं लुप्त हो गई हैं और अब रक्षाबंधन विशुद्ध रूप से भाई-बहन के त्योहार के रूप में जाना जाता है।

विजयदशमी भी अब दुर्गापूजा का चरमोत्कर्ष है अथवा रामलीला का आखिरी दिन। देश-काल एवं परिस्थितियों के अनुकूल पर्वो के स्वरूप भी बदले हैं। दशहरा भी अब तक सार्वजनिक त्योहार बन गया है, जो श्रीराम के वीरत्व, उनकी न्यायप्रियता एवं दयालुता का संदेश प्रतिवर्ष देता है।

Dussehra Essay in Hindi

 

‘विजयादशमी’ हिंदुओं का प्रमुख पर्व है। इसे ‘दशहरा’ भी कहते हैं। सभी बड़ी श्रद्धा के साथ मनाते हैं। विजयादशमी का संबंध ‘शक्ति’ से है। जिस प्रकार ज्ञान के लिए सरस्वती की उपासना की जाती है उसी प्रकार शक्ति के लिए दुर्गा की उपासना की जाती है।

कहा जाता है कि अत्याचार करनेवाले ‘महिषासुर’ नामक राक्षस का उन्होंने संहार किया था। इसके लिए उन्होंने ‘महिषासुरमर्दिनी’ का रूप धारण किया था। दुर्गा ने ही शुभ-निशुंभ नामक राक्षसों को मारा था। उन्होंने चामुंडा का रूप धारण करके चंड- मुंड राक्षसों का वध किया।

श्रीरामचंद्र ने दुर्गा माँ की पूजा करके ही रावण का वध किया था। इसलिए बंगाल में तथा कुछ अन्य क्षेत्रों में भी इस पर्व को ‘दुर्गा पूजा’ के नाम से भी जाना जाता है।

विजयादशमी का त्योहार दस दिनों तक चलता रहता है। आश्विन मास शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से इसका आरंभ होता है। दशमी के दिन इसकी समाप्ति होती है। प्रतिपदा के दिन प्रत्येक हिंदू परिवार में देवी भगवती की स्थापना की जाती है। गोबर से कलश सजाया जाता है। कलश के ऊपर जौ के दाने खोंसे जाते हैं। आठ दिनों तक नियमपूर्वक देवी की पूजा, कीर्तन और दुर्गा-पाठ होता है।

नवमी के दिन पाँच कन्याओं को खिलाया जाता है। उसके बाद देवी की मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। इस उत्सव को ‘नवरात्र’ भी कहते हैं। इन नौ दिनों में पूजा करनेवाले बड़े संयम से रहते हैं। दशमी के दिन विशेष उत्सव मनाया जाता है। इसे ‘विजयादशमी (दशहरा) कहते हैं। दशहरा दस पापों को नष्ट करनेवाला माना जाता है।

इस पर्व को कुछ लोग कृषि प्रधान त्योहार के रूप में भी मनाते हैं। इसका संबंध उस दिन से जोड़ते हैं, जब श्रीरामचंद्र ने लंका के राजा रावण को मारकर विजय प्राप्त की थी, इसलिए यह ‘विजयादशमी’ के नाम से भी जाना जाता है। विजयादशमी के साथ अनेक परंपरागत विश्वास भी जुड़े हुए हैं। इस दिन राजा का दर्शन शुभ माना जाता है। इस दिन लोग ‘नीलकंठ’ के दर्शन करते हैं। गाँवों में इस दिन लोग जौ के अंकुर तोड़कर अपनी पगड़ी में खोंसते हैं। कुछ लोग इसे कानों और टोपियों में भी लगाते हैं।

उत्तर भारत में दस दिनों तक श्रीराम की लीलाओं का मंचन होता है । विजयादशमी रामलीला का अंतिम दिन होता है। इस दिन रावण का वध किया जाता है तथा बड़ी धूमधाम से उसका पुतला जलाया जाता है। कई स्थानों पर बड़े-बड़े मेले लगते हैं। राजस्थान में शक्ति-पूजा की जाती है। मिथिला और बंगाल में आश्विन शुक्लपक्ष में दुर्गा की पूजा होती है। मैसूर का दशहरा पर्व देखने लायक होता है। वहाँ इस दिन ‘चामुंडेश्वरी देवी’ के मंदिर की सजावट अनुपम होती है। महाराजा की सवारी निकलती है। प्रदर्शनी भी लगती है। यह पर्व सारे भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

विजयादशमी के अवसर पर क्षत्रिय अपने अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करते हैं। जिन घरों में घोड़ा होता है, वहाँ विजयादशमी के दिन उसे आँगन में लाया जाता है। इसके बाद उस घोड़े को विजयादशमी की परिक्रमा कराई जाती है और घर के पुरुष घोड़े पर सवार होते हैं।

इस दिन तरह-तरह की चौकियाँ निकाली जाती हैं। ये चौकियाँ अत्यंत आकर्षक होती हैं। इन चौकियों को देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग टूट पड़ते हैं।

 

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