Essay on Tulsidas in Hindi गोस्वामी तुलसीदास पर निबंध 🤠

हेलो दोस्तों आज फिर मै आपके लिए लाया हु Essay on Tulsidas in Hindi पर पुरा आर्टिकल। आज हम आपके सामने Tulsidas के बारे में बहुत अच्छी जानकारी दूंगा जो आपको हिंदी essay के दवारा दी जाएगी। आईये शुरू करते है Essay on Tulsidas in Hindi

 

Essay on Tulsidas in Hindi

प्रस्तावना : मुझे पढ़ने का बेहद शौक है तभी तो मैं पाठ्य पुस्तकों के साथ-साथ पुस्तकालय में बैठकर कवियों, लेखकों की रचनाएँ पढ़ता रहता हूं। मैंने हिन्दी तथा अंग्रेजी के अनेक कवियों जैसे सूरदास, तुलसीदास, जयशंकर प्रसाद, शेक्सपीयर की रचनाओं को ध्यान से पढ़ा है। निःसन्देह सभी को अपनी-अपनी विशेषताएँ होती हैं। कोई प्रकृति प्रेम का दीवाना तो कोई स्त्री प्रेम का। कोई वीरता की गाथा गाता है, तो कोई देश प्रेम लेकिन मेरे प्रिय कवि कवि शिरोमणि तुलसी दास जी हैं।

जन्म परिचय तथा शिक्षा दीक्षा : कवि शिरोमणि तुलसीदास जी के व्य स्थान के विषय में अनेक मतभेद हैं। अभी तक यह निश्चित नहीं – हो पाया है कि उनका जन्म-स्थान कौन सा है। इसी प्रकार उनकी जन्म तिथि भी एक रहस्य ही है। सच्चाई यह है कि उन्होंने अपने विषय में अधिक कछ नहीं लिखा है। लेकिन कुछ विद्वानों का अनुमान है कि उनका जन्म अशुभ नक्षत्र में सम्वत् 1554 की श्रावण शुक्ला सप्तमी को हुआ था। तुलसीदास के पिताजी का नाम आत्माराम दूबे एवं माता का नाम हलसी था।

अशुभ नक्षत्र में जन्म लेने के कारण उनके माता-पिता ने उन्हें त्याग दिया था और उनका लालन-पालन एक दासी ने किया था। दुर्भाग्य से उस दासी का भी देहान्त हो गया था और तुलसीदास अनाथ हो गए। | थे।

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कुछ समय पश्चात् तुलसीदास की भेंट स्वामी नरसिंह दास से हुई। नरसिंह दास उन्हें अपने साथ अयोध्या ले गए तथा उनको राम नाम की दीक्षा देकर विद्याध्ययन शुरू कर दिया। उसके बाद 25-30 वर्ष की आयु तक वे विद्याध्ययन में लगे रहे।

 

तुलसी जी का विवाह रत्नावली नामक एक सुन्दर तथा सुशील कन्या से हो गया। वे अपनी पत्नी से बेहद प्यार करते थे। एक बार रत्नावली मायके चली गई तो वे नदी पार करके ससुराल जा पहुंचे। लेकिन उनकी पत्नी को यह सब पसन्द नहीं आया और उसने तुलसीदास से कहा, “कि जितना प्यार तुम मुझसे करते हो, उतना प्यार यदि ईश्वर से करोगे, तो तुम्हारा उद्धार हो जाएगा।’

वैराग्य एवं साहित्य रचना :

अपनी पत्नी की बातों से तुलसीदास जी के जीवन में एक परिवर्तन आ गया तथा सांसारिक जीवन को छोड़ वे भगवान की भक्ति में लीन हो गए। उन्होंने अपने जीवन काल में 20 से भी अधिक  रचनाएँ लिखी हैं लेकिन रामचन्द्र जी के जीवन पर आधारित ‘रामचरितमानस उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है। उनका स्वर्गवास 125 वर्ष की आयु में सम्वत् 1631 में हुआ था। |

निष्कर्ष :

ऐसे कवि शिरोमणि विरले ही इस दुनिया में जन्म लेते हैं। इस महान विभूति ने समाज तथा साहित्य की जो सेवा की है, वह अवर्णनीय है। उनके समान उदार तथा समन्वयवादी एकाध ही होता है।

 

Essay on Tulsidas in Hindi

गोस्वामी तुलसीदास का जन्म सौरों के निकट रामपुर ग्राम में सन् 1600 से पूर्व हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी था। जाति से ब्राह्मण थे। जन्म लेने के बाद ही इनके माता-पिता की मृत्यु हो गई। इस कारण इन्हें बाल्यकाल में बहुत कष्ट उठाने पड़े। गोस्वामी जी की रचनाओं से विदित होता है कि उन्होंने गृहस्थ जीवन भी बिताया।

यौवनावस्था में वे विषय-वासना में लीन हो गये। ऐसा माना जाता है। कि एक बार वे वासना के वशीभूत होकर मुर्दे के सहारे नदी पार कर अपनी धर्मपत्नी के पास रात्रि में पहुँचे तो पत्नी ने उन्हें फटकार दिया कि हमारे शरीर में ऐसा क्या है जो आप इतने कष्ट उठाकर आये। जैसा प्रेम हमारे शरीर से है वैसा अगर राम से हो तो तुम्हें मोक्ष मिल जायेगा। बस वे गृहस्थ जीवन त्याग कर भक्ति में लीन हो गये और रामचरितमानस व विनयपत्रिका जैसे पवित्र ग्रन्थों की रचना की। सन् 1680 में उनकी मृत्यु हो गई। स्वयं लिखा है-

संवत सोलह सो असी, असी गंग के तीर । श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर। रचनायें तुलसी रचित 56 ग्रन्थ कहे जाते हैं, किन्तु विद्वानों ने निम्नलिखित ग्रन्थ ही स्वीकार किये हैं-

1. रामचरितमानस, 2. विनय पत्रिका, 3. गीतावली, 4. कवितावली, 5. कृष्ण गीतावली, 6. पार्वती मंगल, 7. जानकी मंगल, 8. रामलला नहछु, 9. दोहावली, 10. रामाज्ञा प्रश्न, 11. वैराग्य सन्दीपनी, 12. बरवै रामायण।।

जब मनुष्य के ऊपर विपत्ति के काले बादल घनीभूत अन्धकार के समान छ जाते हैं। और चारों दिशाओं में निराशा के अन्धकार के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं पड़ता, तब केवल सच्चा मित्र ही एक आशा की किरण के रूप में सामने आता है। तन से, मन से, मित्रता होनी चाहिये मीन और नीर जैसी। सरोवर में जब तक जल रहा, मछलियाँ भी क्रीड़ा तथा मनोविनोद करती रहीं। परन्तु जैसे-जैसे तालाब के पानी पर विपत्ति आनी आरम्भ हुई, मछलियाँ उदास रहने लगीं, जल का अन्त तक साथ दिया।

उसके साथ संघर्ष में रत रहीं, परन्तु जब मित्र न रहा तो स्वयं भी अपने प्राण त्याग दिये, परन्तु अपने साथी जल का अन्त तक विपत्ति में भी साथ न छोड़ा। मित्रता दूध और जल की सी नहीं होनी चाहिये कि जब दूध पर विपत्ति आई और वह जलने लगा तो पानी अपना एक ओर को किनारा कर गया, अर्थात् भाप बनकर भाग गया। बेचारा अकेला दूध अन्तिम क्षण तक जलता रहा। स्वार्थी मित्र सदैव विश्वासघात करता है, उसकी मित्रता सदैव पुष्प और भ्रमर जैसी होती है।

भंवरा जिस तरह रस रहते हुए फूल का साथी बना रहता है और इसके अभाव में उसकी बात भी नहीं पूछता। इसी प्रकार स्वार्थी मित्र भी विपत्ति के क्षणों में मित्र का सहायक सिद्ध नहीं होता।

इसीलिये संस्कृत में कहा गया है कि “आपदगतं च न जहाति ददाति काले” अर्थात् विपत्ति के समय सच्चा मित्र साथ नहीं छोड़ता, अपितु सहायता के रूप में कुछ देता ही है। जिस प्रकार स्वर्ण की परीक्षा सर्वप्रथम कसौटी पर घिसने से होती है, उसी प्रकार | मित्र की विपत्ति के समय त्याग से होती है। इतिहास साक्षी है कि ऐसे मित्र हये हैं।

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Essay on Tulsidas in Hindi

रामाश्रयी शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि एवं संत तुलसीदास की जन्मतिथि और जन्मस्थान केविषय में विद्वानों में मतभेद है। इसपर भी अधिकांश विद्वानों का कहना है कि इनका जन्म सन् 1600 में श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन सोरों नामक ग्राम में हुआ था। ‘गोसाईं चरित’ के अनुसार, जब ये उत्पन्न हुए थे तो इनके मुख में दाँत थे। देखने में ये पाँच वर्ष के बालक केसमान लगते थे। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था।

जनश्रुतियों और अंतः-साक्ष्यों के आधार पर पता चलता है कि इन्हें बचपन में ही माता-पिता ने त्याग दिया था। इनका बचपन का नाम रामबोला था। ये सरयूपारी ब्राह्मण थे। पाँच वर्षकी अवस्था में माता-पिता द्वारा त्यागे जाने पर इनका लालन-पालन मुनिया नामक दासी नेकिया। उसकी मृत्यु के उपरांत इन्हें इधर-उधर भटकना पड़ा। ये भीख माँगकर उदर की पूर्तिकरते रहे।

अंत में बाबा नरहरिदास ने इन्हें अपने पास रख लिया और शिक्षा-दीक्षा दी। रत्नावलीनाम की कन्या के साथ इनका विवाह हुआ। इन्हें अपनी पत्नी से बहुत प्रेम था।

एक बार इन्हें बिना बताए जब इनकी पत्नी अपने मायके चली गई तो आँधी-तूफान कासामना करते हुए उससे मिलने के लिए अर्धरात्रि के समय ये अपनी ससुराल जा पहुँचे।रत्नावली को यह अच्छा न लगा। वह इन्हें धिक्कारते हुए बोली-

‘लाज न लागत आपको दौरे आयहु साथ।
धिक्-धिक् ऐसे प्रेम कौं कहा कहाँ मैं नाथ ॥
अस्थि-चर्ममय देह मम तामें ऐसी प्रीति।
ऐसी जो श्रीराम महँ होत न तो भवभीति॥’

पत्नी की इस फटकार ने तुलसी को विरक्त कर दिया। इनके हृदय में रामभक्ति जाग्रत होउठी। गृह त्यागकर कुछ दिन ये काशी में रहे, तत्पश्चात् अयोध्या चले गए। इसके अनंतर येतीर्थयात्रा पर निकले और जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम्, द्वारका होते हुए बद्रिकाश्रम गए।

इस तीर्थयात्रा से लौटने के उपरांत बहुत दिनों तक ये चित्रकूट में रहे। यहाँ पर इनकी अनेक संतोंसे भेंट हुई। तत्पश्चात् सं. १६३१ में अयोध्या जाकर इन्होंने ‘रामचरितमानस’ की रचना प्रारंभ संवत् सोलह सौ असी असी गंग के तीर।श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी तज्यो शरीर॥

पर बाबा वेणीमाधव के ‘गोसाईं चरित’ में दूसरी पंक्ति इस प्रकार है-‘श्रावण कृष्णा तीज शनि तुलसी तज्यो शरीर।’टोडर वंशी इसी तिथि को ठीक मानकर साधुओं को सीधा देते हैं। इस कारण यह तिथिमान्य है।

रचनाएँ-तुलसी की प्रतिभा सर्वतोमुखी थी। इनकी समस्त रचनाएँ रामभक्ति अथवारामचरित पर ही आधारित हैं। इनकी प्रमुख रचनाओं में ‘रामचरितमानस’, ‘विनयपत्रिका’,‘गीतावली’ और ‘कवितावली’ हैं।

इनके अतिरिक्त ‘वैराग्य संदीपनी’, ‘रामललानहछू’, ‘बरवै रामायण’, ‘पार्वती मंगल’, ‘जानकी मंगल’, ‘रामाज्ञा प्रश्न’, ‘दोहावली’, ‘श्रीकृष्ण गीतावली’ आदि ग्रंथ हैं।

विभिन्न छंदों, रागों और भाषा में राम का गुणगान करना ही इनकी काव्य-साधनारही है। सभी ग्रंथों में इनकी प्रतिभा विद्यमान है, किंतु ‘मानस’ में इनका कवित्व उत्कर्ष पर है,साथ ही दार्शनिक समन्वय की चरम सीमा के दर्शन भी इसी में मिलते हैं। इस रचना ने इनकेनाम को अमर कर दिया है।

व्यक्तित्व-तुलसीदास दार्शनिक, भक्त और प्रभावशाली सुधारक होते हुए भी सर्वप्रथममहान् कवि हैं। इसी कारण सभी क्षेत्रों में इनकी अंतर्दृष्टि व्यापक एवं गंभीर हो गई है।दार्शनिक दृष्टिकोण-तुलसीदास ने अपने दार्शनिक दृष्टिकोण का स्पष्टीकरण मानसऔर ‘विमयपत्रिका’ में ही अधिक किया है।

‘विनयपत्रिका’ में आत्मनिवेदन के पदों का आधिक्य होते हुए भी उनके कुछ पदों में सिद्धांतों का निरूपण है। इन्होंने सभी सिद्धांतों के सत्य को अपनाया है। मानस’ में भी प्रसंग-प्रसंग पर इनकी दार्शनिकता की छाप दृष्टिगोचर होती है। गोस्वामी तुलसीदास हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उनके ‘रामचरितमानस’ का घर- घर में पाठ होता है।

Essay on Tulsidas in Hindi

प्रभु का निर्भय सेवक था, स्वामी था अपना,
जाग चुका था, जग था जिसके आगे सपना।
प्रबल प्रचारक था, जो उस प्रभु की प्रभुता का,
अनुभव था संपूर्ण जिसे उसकी विभुता का।
राम छोड़कर और की, जिसने कभी न आस की,
रामचरितमानस-कमल, जय हो तुलसीदास की।
-जयशंकर प्रसाद

मैं यह तो नहीं कहता कि मैंने बहुत अधिक अध्ययन किया है तथापि भक्तिकालीन कवियों में कबीर, सूर और तुलसी तथा आधुनिक कवियों में प्रसाद, पंत और महादेवी के काव्य का आस्वादन अवश्य किया है।

इन सभी कवियों के काव्य का अध्ययन करते समय तुलसी के काव्य की अलौकिकता के कारण मेरा मस्तिष्क उनके सामने सदैव नत होता रहा है। उनकी भक्तिभावना, समन्वयात्मक दृष्टिकोण तथा काव्य-सौष्ठव ने मुझे अनजाने आकृष्ट किया है।

जन्म की परिस्थितियाँ- तुलसीदास का जन्म ऐसी विषम परिस्थितियों में हुआ, जब हिंदू-समाज अशक्त होकर विदेशी चंगुल में फंस चुका था, हिंदू-समाज की संस्कृति और सभ्यता प्रायः विनष्ट हो चुकी थी, कहीं कोई उचित आदर्श नहीं था।

इस युग में मंदिरों का विध्वंस किया गया, ग्रामों व नगरों का विनाश हुआ, संस्कारों की भ्रष्टता चरम सीमा पर पहुँची। तलवार के बल पर हिंदुओं को मुसलमान बनाया जा रहा था। सर्वत्र धार्मिक विषमताओं का तांडव नर्तन हो रहा था। विभिन्न संप्रदायों ने अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग अलापना आरंभ कर दिया था। ऐसी स्थिति में भोली-भाली जनता यह समझने में असमर्थ

जब-जब होई धरम कै हानी।
बाढहिं असुर अधम अभिमानी।
तब-तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा।।
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।। 

 

लसी ने अपने काव्य में सभी देवी देवताओं की स्तुति की है लेकिन अंत में वे यही कहते हैं-

माँगत तुलसीदास कर जोरे,
बसहिं रामसिय मानस मोरे।

निम्न पंक्तियों में उनकी अनन्यता और भी अधिक स्पष्ट हुई है-

एक भरोसो, एक बल, एक आस बिस्वास।
एक राम घनस्याम हित, चातक तुलसीदास।

तुलसी के समक्ष ऐसे राम का जीवन था, जो मर्यादाशील थे और शक्ति एवं सौंदर्य के अवतार थे।

तुलसीदास की निष्काम भक्ति-भावना- सच्ची भक्ति वही है, जिसमें आदान-प्रदान का भाव नहीं होता है। भक्त के लिए भक्ति का आनंद ही उसका फल है। तुलसी का तो यही कथन है-

मो सम दीन न, दीन हित तुम समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंसमनि, हरहु बिषम भवभीर।

तुलसी का समन्वय- तुलसी के काव्य का सबसे बड़ा धर्म समन्वय है। इस प्रवृत्ति के कारण वे वास्तविक अर्थों में लोकनायक कहलाए। उनके काव्य में समन्वय के निम्नलिखित रूप दृष्टिगत होते हैं-

 (क) सगुण-निर्गुण का समन्वय-

ईश्वर के सगुण एवं निर्गुण दोनों रूपों का विवाद दर्शन एवं भक्ति दोनों क्षेत्रों में प्रचलित था, किंतु तुलसीदास ने कहा थी कि वह किस संप्रदाय का आश्रय ले? उस समय दिग्भ्रमित जनता को ऐसे नाविक की आवश्यकता थी, जो उसकी जीवन-नौका की पतवार भी सँभाले। वास्तव में, गोस्वामी तुलसीदास ने अंधकार के गर्त में डूबी हुई जनता के समक्ष भगवान का लोकमंगलकारी रूप प्रस्तुत करके उसमें अपर्व आशा एवं शक्ति का संचार किया।

युगद्रष्टा तुलसी ने भारतीय समाज में व्याप्त विभिन्न मतों, संप्रदायों एवं धाराओं का समन्वय अपने ‘रामचरितमानस’ द्वारा किया। उन्होंने अपने युग को नवीन दिशा, नई गति एवं नवीन प्रेरणा दी। उन्होंने सच्चे लोकनायक के समान वैमनस्य की चौड़ी खाई को पाटने का सफल प्रयत्न किया।

तुलसीदास : एक लोकनायक- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन है-‘

लोकनायक वही हो सकती है, जो समन्वय कर सके, क्योंकि भारतीय समाज में नाना प्रकार की परस्पर विरोधिनी संस्कृतियाँ, साधनाएँ, जातियाँ, आचार-निष्ठा और विचार-पद्धतियाँ प्रचलित हैं। बद्धदेव समन्वयकारी थे, सेता ने समन्वय की चेष्टा की और तुलसीदास भी समन्वयकारी थे।

‘ तुलसी के राम- तुलसी उन राम के उपासक थे, जो सच्चिदानंद परमब्रह्म थे तथा जिन्होंने भूमि का भार हरण करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया था-

सगुनहिं अगुनहिं नहिं कछु भेदा,
गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा।।

(ख) कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का समन्वय-

तुलसी की भक्ति मनुष्य को संसार से विमुख करके अकर्मण्य बनाने वाली नहीं है, उनकी भक्ति तो सत्कर्म की प्रबल प्रेरणा देने वाली है। उनका सिद्धांत है कि राम के समान
आचरण करो, रावण के सदृश कुकर्म नहीं-

भगतिहिं ग्यानहिं नहिं कछु भेदा,
उभय हहिं भव-भम्भव खेदा।।

तुलसी ने ज्ञान और भक्ति के धागे में राम-नाम का मोती पिरो दिया, जो सबके लिए मान्य है-

हियँ निर्गुन नयनन्हि सगुन, रसना राम सुनाम।
सम्पुट लसत, तुलसी ललित ललाम।

(ग) युगधर्म समन्वय-

भक्ति की प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार के बाह्य तथा आंतरिक साधनों की आवश्यकता होती है। ये साधन प्रत्येक युग के अनुसार बदलते रहते हैं और इन्हीं को युगधर्म की संज्ञा दी जाती है। तुलसी ने इनका भी समन्वय प्रस्तुत किया है-

कृतयुग त्रेता, द्वापर पूजा मख अरु जोग।
जो गति होई सो कलि हरि, नाम ते पावहिं लोग।

(घ) साहित्यिक समन्वय-

साहित्यिक क्षेत्र में भाषा, छंद, सामग्री, रस, अलंकार आदि की दृष्टि से भी तुलसी ने अनुपम समन्वय स्थापित किया। उस समय साहित्यिक क्षेत्र में विभिन्न भाषाएँ विद्यमान थीं, विभिन्न छंदों में रचनाएँ की जाती थीं। तुलसी ने अपने काव्य में संस्कृत, अवधी तथा ब्रज का अदभत समन्वय किया।

तुलसी के दार्शनिक विचार- तुलसी ने किसी विशेष वाद को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने वैष्णव धर्म को इतना व्यापक रूप दिया, जिसके अंदर शैव, शाक्त और पुष्टिमार्गी भी सरलता से समविष्ट हो गए। वस्तुत: तुलसी भक्त हैं और इसी आधार पर वह अपना व्यवहार निश्चित करते हैं।

उनकी भक्ति सेवक-सेव्य भाव की है। वे स्वयं को राम का दास मानते हैं और राम को अपना स्वामी।

रचनाएँ- तुलसी के 12 ग्रंथ प्रमाणिक माने जाते हैं। ये हैं–रामचरितमानस,विनयपत्रिका, गीतावली, कवितावली, दोहावली, रामलला नहछु, पार्वतीमंगल,जानकीमंगल, बरवै रामायण, वैराग्य संदीपनी, कृष्णगीतावली, रामाज्ञा प्रश्नावली।तुलसी की ये रचनाएँ विश्वसाहित्य की अनुपम निधि हैं।

तुलसी ने अपने युग और भविष्य, स्वदेश और विश्व, व्यक्ति और समाज सभी के लिए महत्त्वपूर्ण सामग्री दी है। तुलसी को आधुनिक दृष्टि ही नहीं, हर युग की दृष्टि मूल्यवान मानेगी, क्योंकि मणि की चमक अंदर से आती है, बाहर से नहीं।

 

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