Essay on Guru Nanak Dev Ji in Hindi गुरू नानक देव जी पर निबंध

हेलो दोस्तों आज हम आपको Essay on Guru Nanak Dev Ji in Hindi और गुरु नानक देव जी के जीवन परिचय के बारे में बहुत सारी बातें बातयेंगे। नानक सिखों के सबसे पहले गुरु हैं। इनके सभी नानक, नानक देव जी, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं। लद्दाख व तिब्बत में इन्हें नानक लामा भी कहा जाता है। नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु – सभी के गुणों को समेटे हुए थे।

इस आर्टिकल में हम आपको उनके बचपन से जवानी तक का सफर के बारे में सारी जानकारी देंगे।आईये शुरू करते है Essay on Guru Nanak Dev Ji in Hindi या गुरू नानक देव जी पर निबंध

Essay on Guru Nanak Dev Ji in Hindi

प्रस्तावना :

हमारे धर्म प्रधान देश भारत में जब अज्ञान का अंधकार बढ़ गया था, अनेक सामाजिक कुरीतियाँ अपने चरम पर थीं, तब गुरु नानक देव का जन्म हुआ था। गुरु नानक देव जी सिक्खों के प्रथम गुरु थे। उन्होंने जात-पात, ऊँच-नीच तथा छूआछूत जैसी सामाजिक तथा धार्मिक बुराइयों को दूर करने के लिए ही ‘सिक्ख धर्म की स्थापना की।

जन्म तथा बाल्यकाल :

गुरुनानक देव का जन्म संवत् 1526 में कार्तिक | पूर्णिमा को पंजाब के तलबंदी नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम कालू चन्द तथा माता का नाम तृप्ता देवी था। आजकल तलवंडी पाकिस्तान में है। उनके पिता ने नानक को पढ़ने स्कूल भेजा, लेकिन उनका मन तो बचपन से ही वैराग्य की ओर था। वे तो प्रभु भक्ति तथा साधु सेवा में लीन रहते थे।

सच्चा सौदा :

नानक की वैराग्य भावना से इनके पिता बहुत चिन्तित थे अतः उन्होंने नानक को व्यापार में लगा दिया। एक बार उनके पिता ने | उन्हें कुछ धन देकर रोजगार के लिए शहर भेज दिया। नानक अभी शहर पहुँच भी नहीं पाए थे कि रास्ते में उन्हें साधु-संतों की एक टोली मिल गई। नानक ने सारा धन उन्हीं साधु-संतों के भोजन पर खर्च कर दिया। जब वे खाली हाथ घर लौटे तो उन्होंने कहा कि वे ‘सच्चा सौदा’ कर आए हैं। उनके पिता बहुत क्रोधित हुए लेकिन नानक पर इसका कोई असर नहीं हुआ।

गृहस्थ जीवन तथा यात्राएँ :

इनके पिता ने इनका विवाह एक सुशील कन्या सुलक्षणा से करा दिया, जिनसे इनके दो पुत्र भी हुए, लेकिन पत्नी और संतान का मोह भी इन्हें रोक नहीं पाया और नानक ने अपना घर छोड़ दिया और अपने शिष्य ‘बाला’ तथा ‘मरदाना’ के साथ भ्रमण करने लगे। वे मक्का मदीना भी गए। उन्होंने साधु- सन्तों तथा जनसाधरण में अपने | उपदेशों की अमृत-वर्षा की और अनेक शिष्य बना लिए।

गुरुवाणी :

गुरु नानक देव की अमृत वाणी ‘गुरुग्रन्थ साहिब में संकलित है। अपनी रचनाओं के कारण वे हिन्दी के संत-कवियों में भी बहुत प्रसिद्ध हैं। उनका विश्वास था कि सभी धर्मों का सार एक ही है। सभी धर्म त्याग, सेवा, अच्छे आचरण की शिक्षा देते हैं। कोई भी धर्म झूठ, पाखंड या अंधविश्वास का समर्थन नहीं करता।

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गुरुनानक देव ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने अपने आध्यात्मिक विचारों से समाज को नई दिशा दी और ज्ञान का नया मार्ग दर्शाया। गुरुनानक का जन्म 20 अक्तूबर, 1469 ई० में हिन्दू परिवार में ‘राय भोई की तलवण्डी’ नामक स्थान में हुआ था। अब यह स्थान ‘ननकाना साहब’ के नाम से प्रसिद्ध है और पाकिस्तान में है। इनके पिता मेहता कल्याण राय थे जो गाँव के पटवारी थे।

गुरुनानक बचपन से ही चिन्तन में डूबे रहते थे। पिता उनके इस स्वभाव से चिन्तित रहते थे। वह ज्यों-ज्यों बड़े होने लगे, उनका मन साधु-संन्यासियों के साथ अधिक लगने लगा। उन्होंने संस्कृत, फारसी और  मुनीमी की शिक्षा घर पर ही प्राप्त  की। उनका विवाह 18 वर्ष की उम्र में सुलखणी के साथ कर दिया गया। उनके दो पुत्र हुए। श्रीचन्द बड़े थे और लक्ष्मी दास छोटे थे।

गुरुनानक के बाल्यकाल से ही चमत्कारिक घटनाएँ होने लगी थीं। एक बार वे पशु चराने गए तो वे सो गए तब उनके सिर पर एक साँप ने फन फैलाकर उन पर धूप नहीं आने दी। एक बार उनके पिता ने उन्हें घर का कुछ सामान लाने भेजा, तो वे साधु-संतों को भोजन कराके खाली हाथ घर लौट आए।

गुरुनानक को ईश्वरीय ज्ञान नदी में स्नान करते समय मिला। उन्हें अनुभव हुआ कि भगवान उनसे मानव जाति का कल्याण करने के लिए। कह रहे हैं। फिर उन्होंने भक्ति-मार्ग अपना लिया और उपदेश देने लगे। लोग उनके उपदेशों से आकर्षित होकर उनके शिष्य बन गए और उन्हें अपना गुरु मानने लगे।

गुरुनानक धर्मों के भेदभाव को दूर करके एक ईश्वर की उपासना का प्रचार करने स्थान-स्थान पर जाने लगे। अपनी प्रथम यात्रा में वे कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, बनारस, उड़ीसा, बंगाल से होकर असम पहुँचे। वे लोगों में भ्रातृत्व, अपनत्व और प्रेम के भाव भरने लगे। उन्होंने कहा कि सभी मनुष्य समान हैं। जाति के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में भेद नहीं करना चाहिए।

उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों को निकट लाने का कार्य किया। उन्होंने समझाया कि ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा ही सबसे बड़ी भक्ति है। उनके विचारानुसार मानव-सेवा ईश्वर की सेवा है। उन्होंने अहंकार त्यागने का संदेश दिया और कहा कि मनुष्य को स्वार्थी नहीं होना चाहिए। उन्होंने ईश्वर को ‘एक ओंकार’ करतार, अकाल, सत्य, प्रिय और निरंजन की संज्ञा दी थी।

गुरुनानक ने अपना संपूर्ण जीवन मानव-सेवा में लगा दिया था। उन्होंने तत्कालीन समाज को नया रूप देने का सार्थक कार्य किया था। नानक जी ने अपने जीवन का अंतिम समय करतारपुर में व्यतीत किया। भाई लहणा जी उनके परम प्रिय शिष्य थे। उनका निधन 7 सितंबर, 1539 में हुआ था।

गुरुनानक के भक्ति के पद “गुरु ग्रंथ साहब” में संकलित हैं। उनके विचारों के आधार पर ही सिख धर्म की नींव रखी गई थी। आज के हम सभी के लिए पूजनीय हैं।

 

Essay on Guru Nanak Dev Ji in Hindi

 

चमत्कारी महापरुषों और महान धर्म प्रवर्तकों में प्रमुख स्थान रखने वाले सिख धर्म के प्रवर्तक गुरुनानक देव का जन्म कार्तिक पूर्णिमा संवत् 1526 को लाहोर जिले के तलवंडी गाँव में हुआ था जो आजकल ‘ननकाना साहब’ के नाम से जाना जाता है। यह स्थान अव पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) में है।

आपके पिताश्री कालूचंद वेदी तलवंडी के पटवारी थे और आपकी माताश्री तृप्ता देवी बड़ी साध्वी और शांत स्वभाव की धर्म-परायण महिला थीं।

गुरुनानक जी बचपन से ही कुशाग्र और होनहार प्रकृति के बालक थे। अतएव आप किसी भी विषय को शीघ्र समझ जाते थे। आप एकान्त प्रेमी और चिन्तनशील स्वभाव के बालक थे। इसलिए आपका मन विद्याध्ययन और खेल-कूद में न लगकर साधु-संतों की संगति में अत्यधिक लगता था तथापि घर पर ही आपको संस्कृत, अरबी और फारसी भाषा-साहित्य का ज्ञान दिया गया।

संसार के प्रति गुरुनानक जी का मन उदास और उपेक्षित रहता था। इस प्रकार की वैरागमयी प्रकृति को देखकर इनके पिताश्री ने इन्हें पशु चराने का काम सौंप दिया। नानक के लिए यह काम बहुत ही सुगम और आनन्ददायक सिद्ध हुआ। वे पशुओं की चिन्ता छोड़कर संसार की चिन्ता में मग्न होते हुए ईश्वर ध्यान में दूब जाते थे और मन-ही-मन ईश्वर का भजन-भाव करते रहते थे।

गुरुनानक के जीवन में कई असाधारण घटना घटी और उन्होंने संसार को चमत्कृत भी किया। जैसे-बहुत बड़े सर्प का नानक के उपर फण फैलाकर छाया करना, मक्का की ओर पैर करना आदि । गुरुनानक देव का विवाह लगभग उन्नीस वर्ष की आयु में मूलाराम पटवारी की कन्या से हुआ।

इससे आपके दो पुत्र श्रीचन्द और लक्ष्मीदास उत्पन्न हुए। इन दोनों ने  गरुनानक देव की मृत्यु के बाद उदासी मत को चलाया था।

गुरुनानक देव की मृत्यु संवत् 1596 में मार्गशीर्ष माह की दशमी की 70 वर्ष की आयु में हुई । सांसारिक अज्ञानता के प्रति गुरुनानक देव ने कहा था- रैन गवाई सोई के, दिवसु गवाया खाय। हीरे जैसा जन्म है, कौड़ी बदले जाय।।

गुरु नानक देव ने ईश्वर को सर्वव्यापी मानने पर बल दिया है। जाति-पांति के बन्धन को तोड़ने का आह्वान किया है। मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए केवल ‘एक ओंकारा मत सत गुरु प्रसाद के जप को स्वीकार किया है।

आपके रचित धर्मग्रन्थ ‘गुरु ग्रन्थ साहब’ पंजाबी भाषा में है जिसमें मीरा, तुलसी, कबीर, रैदास, मलूकदास आदि भक्त कवियों की वाणियों का समावेश है। उपर्युक्त तत्वों से आपका अमरत्व स्वरूप सिद्ध हो जाता है।

 

Essay on Guru Nanak Dev Ji in Hindi

 

सिख धर्म के प्रथम प्रवर्तक गुरुनानक देव का जन्म संवत् 1526 की कार्तिक पूर्णिमा को | लाहौर जिले के तलवंडी नामक गाँव में हुआ था। यह स्थान अब पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) में ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है। इनके पिता कालूचंद बेदी पटवारी थे। माता का नाम तृप्ता देवी था, जो शांत स्वभाव के साथ-साथ धार्मिक विचारों की थी। बचपन से ही कुशाग्र और होनहार प्रकृति के बालक थे गुरुनानक जी।

किसी भी विषय को आप शीघ्र समझ जाते थे। एकान्त प्रेमी और चिन्तनशील स्वभाव होने के कारण गुरुनानक का मन विद्याध्ययन और खेलकूद में न लगकर साधु-संतों की संगति में अधिक लगता था।

पढ़ने-लिखने के बजाय ईश्वर स्मरण में अधिक समय बिताने के कारण कई लोग गुरुनानक देव को देखकर दंग होते थे। संस्कृत, अरबी और फारसी भाषा-साहित्य का ज्ञान आपने घर में ही प्राप्त किया।

नानक जी को इनके पिता ने गाय भैंस चराने का काम सौंपा। ये पशुओं को चरने छोड़ खुद ईश्वर भजन में मग्न हो जाते थे। पशुओं को चराने के दौरान एक दिन गुरुनानक देव भजन गाते-गाते कब सो गये उन्हें पता ही न चल पाया। इन पर तेज धूप पड़ती देख एक फन वाले सांप ने इन पर छाया कर दी।

वहां से गुजर रहे लोगों को इस दृश्य ने विस्मित कर दिया। इस घटना के बाद से लोगों ने यह स्वीकार किया कि गुरुनानक कोई साधारण मनुष्य नहीं अपितु ईश्वर का कोई रूप है। इसी घटना के बाद से गुरुनानक के नाम के आगे देव शब्द जुड़ गया।

इनके पिता ने इन्हें गृहस्थ जीवन में लगाने का कई बार प्रयास किया। एक बार इनके पिता ने इन्हें बीस रुपये देकर लाहौर जाकर व्यापार करने को कहा। पिता की बात मान यह लाहौर की ओर चल पड़े। रास्ते में इन्हें कुछ साधु मिले जो कई दिनों से भूखे थे। गुरुनानक देव ने सोचा कि पिता जी ने सच्चा व्यापार करने को कहा है।

यदि मैं इन साधुओं को भोजन करा दूं तो इससे बड़ा सच्चा व्यापार और कौन सा हो सकता है। उन्होंने पिता द्वारा दिये पैसे से खाद्य सामग्री खरीद कर साधुओं के बीच वितरित कर दी।

गुरुनानक देव के साथ एक रोचक घटना घटी। एक बार आपको खेत की रखवाली का कार्य भार सौंपा गया। लेकिन यहां भी आप ईश्वरीय चिन्तन में लीन रहे। फलत: खेत में पड़ा अनाज चिड़ियां चुगती रहीं और आप ईश्वर चिन्तन में मग्न रहे। सोलह वर्ष की आयु में गुरुनानक ने एक सरकारी गल्ले की दुकान में नौकरी कर ली। वेतन के रूप में मिलने वाले पैसों को वे साधुओं के बीच बांट देते थे।

18 वर्ष की आयु में गुरुनानक देव का विवाह सुलक्षणा देवी से हुआ। इनसे गुरुनानक के दो पुत्र हुए जिनके नाम श्रीचन्द और लक्ष्मी दास थे।

गुरुनानक के जीवन में कई घटनायें घर्टी लेकिन एक घटना ने उन्हें काफी विचलित किया।घटना के अनुसार नदी में स्नान करने के बाद जब आप एक पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे तभीभविष्यवाणी हुई कि प्यारे नानक तुम अपना काम कब करोगे।

इस संसार में तुम जिस काम केलिए आए हुए हो, उसके लिए मोह ममता छोड़ दो। भूले-भटकों को मार्ग पर लाओ। इस घटनाके बाद से आप फिर कभी घर नहीं लौटे। उन दिनों दिल्ली साम्राज्य के पतन का दौर चल रहा था।

देश में अत्याचार और अनाचार हो रहे थे। हिन्दुओं में जहाँ योगी, साधु, संन्यासी मूर्ख बना रहे थेवहीं मुसलमानों पर मुल्ला, उलमा और ओलिया रौब जमा रहे थे। धर्म का वास्तविक रूप कोईनहीं समझा रहा था।

हिन्दुओं की दशा देख गुरुनानक घर-बार छोड़कर धर्मोपदेश के लिए निकल पड़े। उन्होंने | इस दौरान भारत का ही भ्रमण नहीं किया बल्कि मक्का-मदीना तक गये।

वहां मुसलमान उनसे खासे प्रभावित हुए। गुरुनानक का कहना था सच्चे मन से भगवान का भजन करो, संयमित जीवन बिताओ, मेहनत से कमाई करो और मधुर व परहितकारी वचन बोलो। गुरुनानक देव का कहना था कि शरीरधारी का नाम नहीं जपना चाहिए।

भ्रमण करते हुए जब आप मक्का-मदीना में रुकने के दौरान एक दिन आप काबा की ओर पैर करके सो गये। सुबह जब मुसलमानों ने उन्हें काबा की ओर पैर कर सोते देखा, तो वे बिगड़ पड़े और उन्होंने गुरुनानक देव को काफी भला-बुरा कहा, उनकी बात समाप्त होने पर गुरुनानक  देव ने उनसे कहा मेरा पैर उधर कर दो, जिधर खुदा न हो  कहा जाता है कि गुरुनानक का पैर जिधर घुमाया गया, उधर ही काबा दिखाई दिया। इससे मुसलमानों ने नानक से क्षमा मांगकर उनके प्रति श्रद्धा अर्पित की।

संवत् 1566 में करतारपुर में मार्गशीर्ष की दशमी को 70 वर्ष की आयु में गुरुनानक देव की मृत्यु हुई। गुरुनानक देव ने ईश्वर को सर्वव्यापी मानने पर बल दिया। उन्होंने मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए सतगुरु प्रसाद के जप को स्वीकार किया।

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