Essay on Parishram ka Mahatva परिश्रम का महत्व पर निबंध

हेलो दोस्तों आज फिर में आपके लिए लाया हु Essay on Parishram ka Mahatva पर पुरा आर्टिकल लेकर आया हु। परिश्रम करना बहुत ही जरुरी है क्योकि बिना परिश्रम के कोई चीज़ नहीं मिलती। इस आर्टिकल में हम आपके लिए लाये है परिश्रम का महत्व की पूरी जानकारी जो आपको अपने बच्चे का होमवर्क करवाने में बहुत मदद मिलेगी।

Essay on Parishram ka Mahatva

Essay on Parishram ka Mahatva

भूमिका :

जीवन में परिश्रम ही सफलता की कुंजी है। परिश्रम के बिना तो खाना भी नहीं पचता। परिश्रम के बिना कोई भी व्यक्ति मंजिल तक नहीं पहुँच सकता। इतिहास गवाह है कि हमने आज जो कुछ भी प्राप्त किया है, परिश्रम द्वारा ही प्राप्त किया है। विज्ञान के नए-नए अविष्कार, परिश्रम द्वारा ही संभव हुए हैं।

परिश्रम के प्रकार :

हर व्यक्ति अपने जीवन में दो प्रकार के परिश्रम करता है-बोद्धिक तथा शारीरिक। दोनों ही श्रम अपना-अपना विशेष महत्व रखते हैं। केवल शारीरिक-श्रम ही परिश्रम नहीं है, अपित् जो व्यक्ति पर दिन ऑफिस में बैठकर फाइलों के साथ माथापच्ची करता है, वह भी श्रम ही है। मानसिक श्रम हमारे बौद्धिक विकास के लिए लाभदायक है, तो शारीरिक श्रम करने से हमारा शरीर चुस्त रहता है, पाचन क्रिया ठीक रहती है तथा आलस्य भी दूर रहता है। आज जितने भी वकील, डॉक्टर इत्यादि, जो केवल मानसिक श्रम करते हैं, अपने शारीरिक विकास के लिए प्राणायाम, प्रातःकालीन भ्रमण इत्यादि क्रियाएँ करते हैं, इससे उनका मन तथा शरीर दोनों तंदुरुस्त रहते हैं।

परिश्रम के लाभ :

जो मनुष्य पुरुषार्थी होता है तथा पूरे लगन से तन, मन, धन तथा कर्म से कठोर परिश्रम करता है, उसे सफलता अवश्य प्राप्त होती है। आलसी व्यक्ति जीवन में कुँए के मेंढक की भाँति होता है और उसका जीवन निरर्थक चला जाता है। कठोर परिश्रम, चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक, मनुष्य को निराशाओं से दूर रखकर आशा तथा उत्साह से भरा जीवन जीना सिखाता है। इतिहास साक्षी है कि जितने भी देश आज विकसित हैं, वे सब उस देश के मनुष्यों की मेहनत का ही परिणाम है। अमेरिका तथा जापान इसके सबसे ज्वलंत उदाहरण हैं। ये देश आज धन-धान्य से परिपूर्ण हैं तथा साथ ही नई से नई तकनीकों द्वारा अच्छा धन कमा रहे हैं। महाकवि तुलसीदास ने सच कहा है-‘सकल पदार्थ है जग माहीं। कर्महीन नर पावत नाही।’ अर्थात् इस संसार में सभी पदार्थ, सुख-सुविधाएँ, धन-दौलत सब कुछ है लेकिन उन्हें आलसी व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। परिश्रम से ही सभी कुछ प्राप्त किया जा सकता है।

कुछ परिश्रमी व्यक्तियों के उदाहरण :

संसार के सभी महापरुषों ने परिश्रम से ही सफलता प्राप्त की है। बालगंगाधर तिलक, नेपोलियन, जॉर्ज वॉशिंगटन, अब्राहिम लिंकन, महात्मा गाँधी, हिटलर, इंदिरा गाँधी, मदर टेरेसा सभी ने प्रसिद्धि की ऊँचाईयों को केवल परिश्रम करके ही छआ था।

परिश्रम की शक्ति :

परिश्रम में अपार शक्ति होती है जिस व्यक्ति ने इसे प्राप्त कर लिया, उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। परिश्रम से मूर्ख विद्वान बन जाता है, निर्बल बलवान बन जाता है। सफलता परिश्रमी व्यक्ति के कदमों में स्वयं आकर गिर जाती है, तभी तो कहा भी गया है-‘पुरुष सिंहभुषैति लक्ष्मी।

उपसंहार :

वास्तव में सिंह के समान वीर पुरुष ही धन लक्ष्मी पाता है। सिंह भी तो परिश्रम करके अपना शिकार स्वयं ही ढूँढता है। अतः यदि हमें अपने जीवन में कुछ पाना है, आगे बढ़ना है, तो हमें परिश्रम के महत्व को समझना चाहिए।

परिश्रम का महत्व पर निबंध

परिश्रम से अभिप्राय उस प्रयल से है जो किसी व्यक्ति द्वारा अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है। मनुष्य की उन्नति का एकमात्र साधन उसके द्वारा किया गया परिश्रम ही है। सभी प्रकार की धन-सम्पत्तियाँ और सफलताएँ निरन्तर किए गए परिश्रम से ही प्राप्त हुआ करती हैं। ऐसा कहा जाता है कि “उद्योगिनम् पुरुष सिंहनुपैत्ति लक्ष्मीः” अर्थात् उद्योग या परिश्रम करने वाले पुरुष सिंहों का ही लक्ष्मी वरण किया करती है। यह कटु सत्य है कि परिश्रम ही सफलता की कुंजी है।

निरन्तर परिश्रम व्यक्ति को चुस्त-दुरुस्त रख कर सजग तो बनाता ही है, निराशाओं से दूर रखकर आशा-उत्साह भरा जीवन जीना भी सिखाया करता है। उद्यमी या परिश्रमी व्यक्ति जो भी चाहे कर सकते हैं। जो मनुष्य पुरुषार्थी हैं और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मन, वचन और कर्म से लगातार कठोर परिश्रम करते रहते हैं, सफलता उनके कदम चूमती है। उसके विपरीत जो व्यक्ति परिश्रम नहीं करते हैं उनका जीवन दुःखी बना रहता है। संसार का इतिहास साक्षी है कि जो जातियाँ आज उन्नति के शिखर पर हैं, उनकी उन्नति का एकमात्र रहस्य उनका परिश्रमी होना है।

अमेरिका तथा जापान देशों के उदाहरण हमारे सम्मुख हैं। ये देश आज धन-धान्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हैं।

परिश्रम किसी भी प्रकार का हो, शारीरिक या मानसिक, दोनों ही प्रकार के परिश्रम गौरव प्राप्त करने के कारण हैं। प्रायः देखा गया है कि रस्सी की लगातार रगड़ से कुएँ का भारी-से-भारी पत्थर भी घिस जाता है। यह भी परिश्रम का एक उत्तम उदाहरण है। संसार में अनेकों ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने कठोर परिश्रम द्वारा अपने जीवन को उज्ज्वल बनाया है।

उनमें से बाल गंगाधर तिलक, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, जार्ज वाशिंगटन, नेपोलियन बोना पार्ट, हिटलर, अब्राहिम लिंकन आदि महापुरुषों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

महाकवि तुलसीदास जी ने ठीक ही कहा है – ‘सकल पदारथ हैं जग माहीं. कर्महीन नर पावत नाहीं।’ अर्थात् इस संसार में सभी प्रकार के पदार्थ मौजूद हैं, जो लोग कर्म नहीं करते, इन्हें नहीं पा सकते। परिश्रम के सामने तो प्रकृति भी झुक जाती है और दासी की तरह कार्य करने लगती है। परिश्रम ही ईश्वर की सच्ची उपासना है। इससे हमारा लोक-परलोक भी सुधर जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि परिश्रम करने वाले के सामने कभी कोई बाधा नहीं टिक सकती।

अतः यदि हम अपने जीवन पथ पर निर्बाध गति से आगे बढ़ना चाहते हैं तो हमें निरन्तर परिश्रम करते रहना चाहिए। दृढ़ निश्चय करके परिश्रम करने वाले व्यक्ति ही सदैव असफलताओं और पराजयों को पीछे ढकेल कर विजय का आलिंगन करते हैं।

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कभी मानव जंगलों में जानवरों के समान विचरण किया करता था। आज वह गगनचुंबी इमारतों में सुविधा सम्पन्न जीवन व्यतीत कर रहा है। आदिकाल से मानव-समाज निरन्तर उन्नति की ओर बढ़ रहा है। आज मानव पृथ्वी से अंतरिक्ष की यात्रा कर रहा है।

इस उन्नति की मानव ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। लेकिन मानव को यह सफलता अकस्मात् नहीं मिली है। यह उसके निरन्तर परिश्रम का परिणाम है, जो आज मानव-समाज सभ्य है, शिक्षित है, नयी-नयी सफलताएँ प्राप्त कर रहा है। वास्तव में बिना परिश्रम के मनुष्य जीवन के किसी भी मंच पर सफल नहीं हो सकता। परिश्रम को इसीलिए सफलता की कुंजी अर्थात सफलता का द्वार खोलने वाली चाबी माना जाता है।

एक किसान खेतों में हल चलाता है, बीज बोता है, अपनी फसल की सिंचाई करता है। दिन-रात के कड़े परिश्रम के उपरान्त उसे फसल प्राप्त होती है। मनुष्य को जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए निरन्तर परिश्रम करना पड़ता है।

आज मानव-समाज की उन्नति उसके निरन्तर परिश्रम के कारण ही सम्भव हो सकी है। आज हम जो ऊँची-ऊँची इमारतें, बड़े-बड़े कारखाने, यातायात के आधुनिक साधन, संचार की नयी-नयी सुविधाएँ देख रहे हैं, इनके पीछे मनुष्य का अनवरत परिश्रम लगा हुआ है।

वास्तव में परिश्रम के बिना मनुष्य के लिए बड़ी सफलता प्राप्त करना तो दूर, अपने परिवार का पालन-पोषण करना भी सम्भव नहीं है। एक आलसी व्यक्ति, जिसे हाथ-पैर हिलाने में शर्म महसूस होती है, अपने सगे-सम्बंधियों के लिए भी बोझ बन जाता है। अपने पेट की भूख शान्त करने के लिए मनुष्य को न चाहकर भी परिश्रम करना पड़ता है। महत्त्वाकांक्षी व्यक्तियों को तो अपनी आकांक्षा पूर्ण करने के लिए निरन्तर संघर्ष करना पड़ता है।

इस पृथ्वी पर मनुष्य ने जो नये-नये कारनामे करके दिखाए हैं, वह उसके निरन्तर परिश्रम से ही सम्भव हो सके हैं। इसीलिए परिश्रम को सफलता की कुंजी कहा जाता है। परिश्रमी व्यक्तियों को प्रत्येक कार्य में सफलता मिलती हो, यह आवश्यक नहीं है। परन्तु परिश्रमी व्यक्ति असफलताओं से घबराते नहीं हैं।

अज्ञानतावश अथवा अनुभवहीनता के कारण प्रायः परिश्रम का सुखद परिणाम नहीं मिलता। परन्तु जिन व्यक्तियों के लिए सफलता ही उनके जीवन का लक्ष्य होता है, वे असफल होने पर अपनी गलतियों का आकलन करके उनमें सुधार करते हैं और पुनः उत्साहित होकर प्रयत्नशील हो जाते हैं। वास्तव में जीवन के किसी भी क्षेत्र में मनुष्य को तत्काल सफलता प्राप्त नहीं होती। मनुष्य निरन्तर अभ्यास से योग्यता प्राप्त करता है। योग्य व्यक्ति सही दिशा में प्रयत्न करता है, इसलिए अपने कार्य को पूर्ण करने में उसे अधिक कठिनाई नहीं होती। कई बार योग्य व्यक्ति भी जाने-अनजाने में भूल कर बैठता है और सफलता उससे दूर हो जाती है।

वास्तव में मनुष्य के सफल होने के अन्य भी कई कारण होते है। अनुकूल परिस्थितियों में सफलता सरल होती है, जबकि प्रतिकूल परिस्थितियाँ बना बनाया काम बिगाड़ देती हैं। आंधी-तूफान और तेज वर्षा से तैयार खड़ी फसल नष्ट हो जाती है और किसान का परिश्रम व्यर्थ चला जाता है। परन्तु सफलता के लिए मनुष्य को पुनः परिश्रम करने की आवश्यकता पड़ती है। आलसी एवं कामचोर व्यक्तियों को इस जीवन में कभी सफलता प्राप्त नहीं होती। मानव-समाज ने जो भी उन्नति की है, वह मनुष्य के निरन्तर परिश्रम से ही सम्भव हो सकी है। मनुष्य के परिश्रम ने पर्वतों को काटकर सड़के बनाई हैं, विशाल नदियों पर ऊँचे पुलों का निर्माण किया है, समुद्र की गहराई में जाकर मूल्यवान मोतियों को खोजकर निकाला है।

मनुष्य के निरन्तर परिश्रम ने ही अनुसंधान के द्वारा वैज्ञानिक उन्नति की है। सत्य यही है कि बिना परिश्रम के मनुष्य सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। जो व्यक्ति शीघ्र ही हार मानकर बैठ जाते हैं, उन्हें कदापि सफलता का सुखद अनुभव प्राप्त नहीं होता। सफलता के लिए मनुष्य को अथक परिश्रम करना ही पड़ता है।

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सफलता प्राप्त करने के लिए परिश्रम आवश्यक है। बिना परिश्रम के कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। मेहनत कर विशेष रूप से मन लगाकर किया जाने वाला मानसिक या शारीरिक श्रम परिश्रम कहलाता है। सृष्टि की रचना से लेकर आज की विकसित सभ्यता मानव परिश्रम का ही परिणाम है। जीवन रूपी दौड़ में परिश्रम करने वाला ही विजयी रहता है। इसी तरह शिक्षा क्षेत्र में परिश्रम करने वाला ही पास होता है। उद्यमी तथा व्यापारी की उन्नति भी परिश्रम में ही निहित है।

मानव जीवन में समस्याओं का अम्बार है। जिन्हें वह अपने परिश्रम रूपी हथियार से दिन-प्रतिदिन दूर करता रहता है। कोई भी समस्या आने पर जो लोग परिश्रमी होते हैं वे उसे अपने परिश्रम से सुलझा लेते हैं और जो लोग परिश्रमी नहीं होते वह यह सोचकर हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते हैं कि समस्या अपने आप सुलझ जायेगी। ऐसी सोच रखने वाले लोग जीवन में कभी सफल नहीं हो पाते। परिश्रमी व्यक्ति को सफलता मिलने में हो सकता है देर अवश्य लगे लेकिन सफलता उसे जरूर मिलती है। यही कारण है कि परिश्रमी व्यक्ति निरन्तर परिश्रम करता रहता है।

सृष्टि के आदि से अद्यतन काल तक विकसित सभ्यता मानव के परिश्रम का ही फल है। पाषाण युग से मनुष्य वर्तमान वैज्ञानिक काल में परिश्रम के कारण ही पहुंचा। इस दौरान उसे कई बार असफलता भी हाथ लगी लेकिन उसने अपना परिश्रम लगातार जारी रखा। परिश्रम से ही लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। आजकल के समय में जिसके पास लक्ष्मी है वह क्या नहीं पा सकता। परिश्रम से शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों का विकास होता है। कार्य में दक्षता आती है। साथ ही साथ मानव में आत्मविश्वास जागृत होता है।

परिश्रम का महत्व जीवन विकास के अर्थ में निश्चय ही सत्य और यथार्थ है। आज विज्ञान प्रदत्त जितनी भी सुविधाएं मानव भोग रहा है वे परिश्रम का ही फल है। विज्ञान की विभिन्न सुविधाओं के द्वारा मनुष्य जहां चांद पर पहुंचा है वहीं वह मंगल ग्रह पर जाने का प्रयास किये हुए है। यदि परिश्रम किया जाय तो किसी भी इच्छा को अवश्य पूरा किया जा सकता है। यह बात अलग है कि सफलता मिलने में कुछ समय लग जाय। वर्तमान में विश्व के जो राष्ट्र विकासशील या विकसित हैं उनके विकासशील होने या विकसित होने के पीछे उनके परिश्रमी व कर्मठ नागरिक हैं।

इन कर्मठ व परिश्रमी नागरिकों के कारण ही वे राष्ट्र विश्व में अपनी प्रतिष्ठा बनाये हुए हैं। जरूरी नहीं कि शारीरिक कार्य करने में ही परिश्रम होता है। इंजीनियर, दार्शनिक, राजनीतिज्ञ भी परिश्रम करते हैं। ये लोग परिश्रम शारीरिक रूप से न करके मानसिक रूप से करते हैं।

अमेरिका, जापान, फ्रांस, जर्मनी, चीन आदि राष्ट्रों की महानता अपने-अपने परिश्रमी नागरिकों के कारण ही बनी हुई है। उल्लेखनीय है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान परमाणु बम के कारण जापान के हिरोशिमा व नागासाकी क्षेत्र ध्वस्त होकर नेस्तोनाबोद हो गये थे। लेकिन वहां के परिश्रमी लोगों ने परिश्रम कर आज जापान को विश्व के विशिष्ट राष्ट्रों की गिनती में ला खड़ा किया है। परिश्रमी व्यक्ति को जीवन में हमेशा सफलता मिलती है। इसलिए कहा जा सकता है जीवन में सफलता के लिए परिश्रम का महत्वपूर्ण स्थान है।

जीवन में सुख और शान्ति पाने का एक मात्र उपाय परिश्रम है। परिश्रम रूपी पथ पर चलने वाले मनुष्य को जीवन में सफलता संतुष्टि और प्रसन्नता प्राप्ति होती है। वह हमेशा उन्नति की ओर अग्रसर रहता है। आलसी व्यक्ति जीवन भर कुण्ठित और दुःखी रहता है। क्योंकि वह सब कुछ भाग्य के भरोसे पाना चाहता है।

वह परिश्रम न कर व्यर्थ की बातें सोचता रहता है। ठीक इसके विपरीत परिश्रम करने वाला व्यक्ति अपना जीवन स्वावलंबी तो बनाता ही है श्रेष्ठता भी प्राप्त करता है।

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