बालश्रम पर निबंध- Essay On Child Labour In Hindi

हेलो दोस्तों आज फिर मै आपके लिए लाया हु Essay on Child Labour in Hindi पर पुरा आर्टिकल। हम आपको बालश्रम के बारे मे बहुत सी जानकारी बतायंगे जो आपको सोचने पर मजबूर कर देंगी की हमारे देश में बालश्रम की समस्या कितनी बड़ी है। बाल श्रम समाज की गंभीर बुराइयों में से एक है। गरीब बच्चों का भविष्य अंधकारमय है। पूरे संसार में गरीब बच्चों की उपेक्षा हो रही है तथा उन्हें तिरष्कार का सामना करना पड़ता है।आईये बालश्रम के बारे में पूरी जानकारी शुरू करते है

essay Child Labour

Essay On Child Labour In Hindi

प्रत्येक बच्चा इस दुनिया में स्वतन्त्र ही पैदा होता है और बचपन में खेलना-कूदना, स्वच्छन्द रूप से खाना-पीना, खेलना, पढ़ना-लिखना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन कुछ अभागे बच्चे ऐसे भी हैं जिन्हें कच्ची उम्र में ही दिन रात कठिन मेहनत-मजदूरी करनी पड़ती है। छोटे-छोटे बालक घरों, ढाबों, होटलों तथा छोटी-छोटी फैक्टरियों के अस्वस्थ वातावरण में श्रम करने को मजबूर है। दक्षिण भारत का माचिस एवं आतिशबाजी बनाने वाला उद्योग, बंगाल की बीड़ी उद्योग तथा काश्मीर का कालीन उद्योग पूरी तरह इन बाल-श्रामिकों पर ही निर्भर करता है।

इन उद्योगों में इन मासूमों के साथ अनेक प्रकार के अत्याचार भी होते हैं जैसे वेतन कम देना, छुट्टी न देना, उनके स्वास्थ्य का ध्यान न रखना तथा कभी-कभी उनकी पिटाई करना। होटलों, चाय की दुकानों, चाट-पकौड़ो की दुकानों पर तो इन बालकों की दशा और भी दयनीय है। यहाँ पर इन्हें दिनभर झूठे बर्तन धोने पड़ते हैं, आने वालों की खातिरदारी करनी पड़ती है, फिर भी इन्हें न तो भरपेट भोजन मिल पाता है, न ही पूरी नींद।

सुबह जल्दी उठते हैं और देर रात तक काम करते हैं। इतने भयावह माहौल में किसका विकास संभव है? इस सबके पीछे बच्चे के माता-पिता, परिवार, समाज सभी जिम्मेदार होते हैं। लेकिन कारण चाहे जो भी हो, बाल-श्रम किसी भी स्वतन्त्र राष्ट्र के नाम पर कलंक है। देश का भविष्य कहे जाने वाले इन बालकों को इस अमानवीय व्यवहार से छुटकारा दिलाना हम सबका कर्तव्य है।

Essay On Child Labour In Hindi

भारत में भगवान के बाल रूप के अनेक मंदिर है जैसे बाल गणेश, बाल हनुमान, बाल कृष्ण एवं बाल गोपाल इत्यादि। भारतीय दर्शन के अनुसार बाल रूप को स्वयं ही भगवान का रूप समझा जाता है। ध्रुव, प्रहलाद, लव-कुश एवं अभिमन्यु आज भी भारत में सभी के दिल-दिमाग में बसे हैं।

आज के समय में गरीब बच्चों की स्थिति अच्छी नहीं है। बाल श्रम समाज की गंभीर बुराइयों में से एक है। गरीब बच्चों का भविष्य अंधकारमय है। पूरे संसार में गरीब बच्चों की उपेक्षा हो रही है तथा उन्हें तिरष्कार का सामना करना पड़ता है। उन्हें स्कूल से निकाल दिया जाता है और शिक्षा से वंचित होना पड़ता है, साथ ही बाल श्रम हेतु मजबूर होना पड़ता है। समाज में गरीब लड़कियों की स्थिति और भी नाजुक है। नाबालिग बच्चे घरेलु नौकर के रूप में काम करते हैं। वे होटलों, कारखानों, दुकानों एवं निर्माण स्थलों में कार्य करते हैं और रिक्शा चलाते भी दिखते हैं। यहाँ तक की वे फैक्ट्रियों में गंभीर एवं खतरनाक काम के स्वरुप को भी अंजाम देते दिखाई पड़ते हैं।

भारतीय के संविधान, 1750 के अनुच्छेद 24 के अनुसार 14 वर्ष से काम आयु के किसी भी फैक्ट्री अथवा खान में नौकरी नहीं दी जाएगी। इस सम्बन्ध में भारतीय विधायिका ने फैक्ट्री एक्ट, 14 एवं चिल्ड्रेन एक्ट, 1660 में भी उपबंध किये हैं। बाल श्रम एक्ट, 1986 इत्यादि बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित रखने हेतु भारत सरकार की पहल को दर्शित करते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद ४५ के अनुसार राज्यों का कर्ततव्य है कि वे बच्चों हेतु आवश्यक एवं निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करें।

गत कुछ वर्षों से भारत सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा इस सम्बन्ध में प्रशंसा योग्य कदम उठाए गए हैं। बच्चों की शिक्षा एवं उनकी बेहतरी के लिए अनेक कार्यक्रम एवं नीतियाँ बनाई गयी है तथा इस दिशा में सार्थक प्रयास किये गए हैं। किन्तु बाल श्रम की समस्या आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है।

इसमें कोई शक नहीं है कि बाल श्रम की समस्या का जल्दी से जल्दी कोई हल निकलना चाहिए। यह एक गंभीर सामाजिक कुरीति है तथा इसे जड़ से समाप्त होना आवश्यक है।

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बालश्रम पर निबंध

बाल-मन सामान्यतया अपने घर-परिवार तथा आस-पास की स्थितियों से अपरिचित रहा करता है। स्वच्छन्द रूप से खाना-पीना और खेलना ही वह जानता एवं इन्हीं बातों का प्राय: अर्थ भी समझा करता है। कुछ और बड़ा होने पर तख्ती, स्लेट और प्रारम्भिक पाठमाला लेकर पढ़ना-लिखना सीखना शुरू कर देता है। लेकिन आज परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बन गई और बन रही हैं कि उपर्युक्त कार्यों का अधिकार रखने वाले बालकों के हाथ-पैर दिन-रात मेहनत मजदूरी के लिए विवश होकर धूल-धूसरित तो हो ही चुके हैं, अक्सर कठोर एवं छलनी भी हो चुके होते हैं। चेहरों पर बालसुलभ मुस्कान के स्थान पर अवसाद की गहरी रेखायें स्थायी डेरा डाल चुकी होती हैं।

फूल की तरह ताजा गन्ध से महकते रहने योग्य फेफड़ों में धूल, धुआं, भरकर उसे अस्वस्थ एवं दुर्गन्धित कर चुके होते हैं। गरीबीजन्य बाल मजदूरी करने की विवशता ही इसका एकमात्र कारण मानी जाती हैं ऐसे बाल मजदूर कई बार तो डर, भय, बलात कार्य करने जैसी विवशता के बोझ तले दबे-घुटे प्रतीत होते हैं और कई बार बड़े बूढ़ों की तरह दायित्वबोध से दबे हुए भी। कारण कुछ भी हो, बाल मजदूरी न केवल किसी एक स्वतंत्र राष्ट्र बल्कि समूची मानवता के माथे पर कलंक है।

छोटे-छोटे बालक मजदूरी करते हुए घरों, ढाबों, चायघरों, छोटे होटलों आदि में तो अक्सर मिल ही जायेंगे. छोटी-बडी फैक्टरियों के अन्दर भी उन्हें मजदरी का बोझ ढोते हुए देखा जा सकता है। काश्मीर का कालीन-उद्योग, दक्षिण भारत का माचिस एवं पटाखा उद्योग, महाराष्ट्र, गुजरात और बंगाल का बीड़ी उद्योग तो पूरी तरह से बाल-मजदूरों के श्रम पर ही टिका हुआ है। इन स्थानों पर सुकुमार बच्चों से बारह- चौदह घण्टे काम लिया जाता है, पर बदले में वेतन बहुत कम दिया जाता है, अन्य किसी प्रकार की कोई सुविधा नहीं दी जाती। यहां तक कि इनके स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं रखा जाता। इतना ही नहीं, यदि ये बीमार पड़ जाये तब भी इन्हें छुट्टी नहीं दी जाती बल्कि काम करते रहना पड़ता है। यदि छुट्टी कर लेते हैं तो उस दिन का वेतन काट लिया जाता है।

कई मालिक तो छुट्टी करने पर दुगुना वेतन काट लेते हैं। ढाबों, चायघरों आदि में या फिर हलवाइयों की दुकानों पर काम कर रहे बच्चों की दशा तो और भी दयनीय होती है। कई बार तो उन्हें बचा-खुचा जूठन ही खाने-पीने को बाध्य होना पड़ता है। बेचारे वहीं बैंचों पर या भट्टियों की बुझती आग के पास चौबीस घण्टों में दो चार घण्टे सोकर गर्मी सर्दी काट लेते हैं। बात-बात पर गालियां तो सननी ही पड़ा करती हैं, मालिकों के लात-घूसे भी सहने पड़ते हैं।

यदि किसी से कांच का गिलास या कप-प्लेट टूट जाता है तो उस समय मार पीट और गाली गलौच के साथ जुर्माना तक सहन करना पड़ता है। यही मालिक अपनी गलती से कोई वस्तु इधर-उधर रख देता है और न मिलने पर इन बाल मजदूरों पर चोरी करने का इल्जाम लगा दिया जाता है। इस प्रकार बाल मजदूरों का जीवन बड़ा ही दयनीय एवं यातनापूर्ण होता है।

बाल-मजदूरों का एक अन्य वर्ग भी है। कन्धे पर झोला लादे इस वर्ग के मजदूर सड़क पर फिके हुए गन्दे, फटे कागज, पॉलिथीन के लिफाफे या प्लास्टिक के टुकड़े आदि बीनते दिखाई दे जाते हैं। कई बार गन्दगी के ढ़ेरों को कुरेद कर उसमें से लोहे, टिन, प्लास्टिक आदि की वस्तुएँ चुनते, राख में से कोयले बीनते हुए भी देखा जा सकता है। ये सब चुनकर कबाड़खानों पर जाकर बेचने पर इन्हें बहुत कम दाम मिल पाता है जबकि ऐसे कबाड़ खरीदने वाले लखपति-करोड़पति बन जाते हैं।

आखिर में बाल-मजदूर उत्पन्न कहाँ से होते हैं ? इसका सीधा-सा एक ही उत्तर है-गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले घर-परिवारों से आया करते हैं। फिर चाहे ऐसे घर-परिवार ग्रामीण हों या नगरीय झुग्गी-झोपड़ियां, दूसरे अपने घर-परिवार से गुमराह होकर आये बालक। पहले वर्ग की विवशता तो समझ में आती है कि वे लोग मजदूरी करके अपने घर-परिवार के अभावों की खाई पाटना चाहते हैं।

दूसरे उन्हें पढ़ने-लिखने के अवसर एवं सुविधाएं नहीं मिल पाती। लेकिन दूसरे गुमराह होकर बाल-मजदूरी करने वाले बाल-वर्ग के साथ कई प्रकार की कहानियां एवं समस्यायें जुड़ी रहा करती हैं। जैसे पढ़ाई में मन न लगने या फेल हो जाने पर मार के डर से घर से दूर भाग आना, सौतेली मां या पिता के कठोर व्यवहार से पीड़ित होकर घर त्याग देना, बुरी आदतों और बुरे लोगों की संगत के कारण घरों में न रह पाना या फिर कामचोर आदि कारणों से घर से भाग कर मजदूरी करने के लिए विवश हो जाना पड़ता है।

देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों को किसी भी कारण से मजदूरी करनी पड़े, इसे मानवीय नहीं कहा जा सकता। एक तो घरों में बालकों के रह सकने योग्य सुविधायें परिस्थितियां पैदा करना आवश्यक है। दूसरे स्वयं राज्य को आगे बढ़कर बालकों के पालन की व्यवस्था सम्हालनी चाहिए, तभी समस्या का समाधान सम्भव हो सकता है।

बालश्रम पर निबंध

मासूम, कोमल बच्चे हैंसते-खेलते हुए ही अच्छे लगते है। जीवन की प्रत्येक चिन्ता से मुक्त मुस्कराता हुआ बचपन जीवन की अनमोल धरोहर बनकर जीवनपर्यन्त समृति में रहता है। न जीवनयापन का बोझ, न ही कर्तव्य-पालन की चिन्ता, केवल हँसना-खेलना और जीवन जीने की कला को सीखने का प्रयास करना, यही होता है बचपना। परन्तु कुछ मासूम चेहरों का दुर्भाग्य उनके कोमल कन्धों पर जिम्मेदारी का भारी बोझ डाल देता है और इस प्रकार जन्म लेती है बाल-मजदूरी। हमारे विशाल भारत में प्रत्येक नगर-महानगर में, गाँव-कस्बे में मासूम बचपन मजदूरी करते हुए देखा जा सकता है। यद्यपि सरकार ने बाल-मजदूरी पर प्रतिबंध लगाया हुआ है, परन्तु जनसंख्या वृद्धि और गरीबी बाल-मजदूरी को रोकने में बाधक बनी हुई है।

बच्चों को देश का भविष्य कहा जाता है। हँसते-खेलते हुए बच्चे, शिक्षा ग्रहण करते हुए योग्य नागरिक बनने की दिशा में आगे बढ़ेंगे, तभी देश का भविष्य उज्ज्वल हो सकेगा। परन्तु जिस देश में बचपना मिल-कारखानों में, खेत-खलीहानों में, ढाबों-चाय की दुकानों में पिसता-सिसकता रहेगा, उस देश का भविष्य कैसा होग  अशिक्षित और बीमार। वास्तव में बाल-मजदूरी किसी भी राष्ट्र के लिए कलंक के समान है।

जिन बच्चों को माता-पिता का प्यार-दुलार मिलना चाहिए, उन्हें मिल-मालिकों, होटल-मालिकों की गालियाँ सुननी पड़ती हैं। जिस आयु में शिक्षा ग्रहण करके योग्यता अर्जित करनी चाहिए उस आयु में प्रदूषित कारखानों में बीमारियों से लड़ना पड़ता है।

वास्तव में बाल-मजदूरों की स्थिति अत्यन्त दयनीय है। बीड़ी, दीयासलाई, आतिशबाजी आदि के कारखानों में सस्ती दर पर उपलब्ध होने के कारण बाल-मजदूरों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। इन कारखानों में बाल-मजदूरों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और उनके लिए चिकित्सा की भी समुचित व्यवस्था नहीं होती। अपनी जान जोखिम में डालकर मासूम बच्चे मिल-कारखानों में काम करते हैं।

स्पष्टतया बाल-मजदूरी का प्रमुख कारण गरीबी है। घर पर भुखमरी के शिकार बच्चे ही ज्यादातर मजदूरी करने पर विवश -होते हैं। गरीब परिवारों में एक व्यक्ति की आय से परिवार का भरण-पोषण सम्भव नहीं होता अज्ञानता और अशिक्षा के कारण परिवार में सदस्यों की संख्या बढ़ती रहती है। अतः सभी के भरण-पोषण के लिए होश सम्भालते ही परिवार के बच्चों को मेहनत-मजदूरी करने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

घर से भागे हुए बच्चों को भी पेट की भूख शान्त करने के लिए मजदूरी करने पर विवश होना पड़ता है। इन बच्चों की विवशताओं का लाभ मिल-मालिक, ढाबा-मालिक उठाते हैं। वे बच्चों से दिन-रात काम लेते हैं और मेहनताना नाम मात्र को देते हैं। कोठी-बँगलों में काम करने वाले घरेलू नौकरों की स्थिति भी गुलामों से कम  नहीं है। घरेलू बाल-मजदूरों को देर रात तक काम करना पड़ता  है और मालिकों की गालियाँ भी सुननी पड़ती हैं। अनेक बाल-मजदूरों को मालिकों द्वारा बेरहमी से पीटने की भी घटनाएँ सुनने-पढ़ने में आई हैं।

बाल-मजदूरी दण्डनीय अपराध होने पर भी मजदूरी के लिए बच्चों का निरन्तर शोषण किया जा रहा है। वास्तव में केवल कानून बनाने से गरीब बच्चों के जीवन में विशेष सुधार होना सम्भव नहीं है। गरीब परिवारों के पेट की भूख बच्चों को  मजदूरी के लिए विवश करती है। इस समस्या के निवारण के | लिए सरकार को गरीब बच्चों के लालन-पालन और शिक्षा की

जिम्मेदारी लेनी होगी। समाज के सम्पन्न नागरिकों को भी गरीब बच्चों की सहायता के लिए यथासम्भव प्रयास करना चाहिए। देश का भविष्य माने जाने वाले बच्चों के विकास के लिए समाज में जागरूकता की आवश्यकता है। बच्चों का शोषण करने वाले मिल-मालिकों, होटल-मालिकों आदि को भी विचार करने की आवश्य है कि अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए वे मासूम बच्चों पर अत्याचार करके पाप के भागी बन रहे हैं।

निस्संदेह किसी भी देश के बच्चे उसका भविष्य हैं। यह भी आवश्यक नहीं है कि प्रतिभा पर केवल धनवान परिवार के बच्चों का अधिकार है। प्रतिभा गरीब बच्चों में भी होती है। अतः प्रत्येक वर्ग के बच्चों का स्वस्थ, शिक्षित और योग्य होना आवश्यक है, तभी देश का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए हमें बाल-मजदूरी के कलंक को मिटाने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास करना चाहिए।

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बालश्रम पर निबंध

भारत के समक्ष बाल श्रम की समस्या लगातार एक चुनौती के रूप में रही है। सरकार इस समस्या से निपटने के लिए विभिन्न उपाय भी करती रही है। बाल श्रम की समस्या एक सामाजिक और आर्थिक समस्या है, जो सीधे-सीधे निर्धनता और निरक्षरता के साथ जुड़ी हुई है। इस समस्या से निपटने के लिए समाज के सभी वर्गों द्वारा अथक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। भारत के संविधान के अंतर्गत बच्चों के लिए अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के साथ-साथ उन्हें आर्थिक गतिविधियों एवं उनकी आयु के प्रतिकूल व्यवसायों में उलझने से बचाने हेतु श्रम संरक्षण का प्रबंध करने हेतु संगत उपबंधों का समावेश किया गया है। हाल ही में किए गए संवैधानिक संशोधन के पश्चात् 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार अब एक मूलभूत अधिकार बन गया है।

संवैधानिक उपबंधों के अनुकूल देश ने बाल श्रम उन्मूलन के लिए आवश्यक संवैधानिक प्रावधान भी बनाए तथा विकासात्मक उपायों को कार्यान्वित किया है; फिर भी, सरकार के प्रयासों के बावजूद भी निर्धनता एवं निरक्षता के कारण बाल श्रम की समस्या अभी भी बरकरार है। वर्ष 2001 में भारत के महापंजीयक द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, हमारे देश में 1991 में 1.13 करोड़ की तुलना में वर्ष 2001 में कार्यरत बच्चों (5-14 वर्ष के आयु वर्ग से संबंधित) की संख्या 1.26 करोड़ थी। बाल श्रमिकों की सबसे अधिक संख्या उत्तर प्रदेश (0.19 करोड़) में है। इसके पश्चात् आंध्र प्रदेश (0.14 करोड़), राजस्थान (0.13 करोड़) तथा बिहार (0.10 करोड़) हैं। 90 प्रतिशत से अधिक बाल श्रमिक ग्रामीण क्षेत्रों में लगे हैं, जो कृषि एवं सम्बद्ध उद्योगों, जैसे-जुताई, कृषि श्रम, पशुधन, वानिकी एवं मत्स्यन सम्बन्धी कार्य करते हैं।

अनेक बाल श्रमिकों को कार्य में विवश परिस्थितियों के चलते झोंका जाता है, जिस पर उनका कोई वश नहीं होता है। गरीबी सबसे मुख्य कारण है, जिसके परिणामस्वरूप अपने जीवन के प्रारंभिक वर्षों में ही इन्हें काम की ओर धकेल दिया जाता है। भारत की कुल जनसंख्या में गरीबी की रेखा से नीचे रह रही 40 प्रतिशत जनसंख्या द्वारा बच्चों को अतिरिक्त आय का साधन’ समझा जाता है, जो इसमें सहयोग तथा परिवार की आय को बढ़ा सकते हैं। अतः बच्चों के थोड़ा बड़ा होते ही उनके माता-पिता द्वारा उन्हें काम में धकेल दिया जाता है। बंधुआ मजदूरों के बच्चों को भी बंधुआ मजदूरों के रूप में कार्य करने के लिए मजबूर किया जाता है।

प्रतिवर्ष बढ़ रही जनसंख्या को ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार न मिलने के कारण ग्रामीण श्रमिक अपने बच्चों के साथ शहरों में आकर होटल, सेवा केन्द्रों इत्यादि में रोजगार प्राप्त कर लेते हैं। ये बच्चे प्रायः शहरी अनौपचारिक इकाइयों से जुड़े रहते हैं, जबकि इनके माता-पिता गांवों को वापस लौट जाते हैं। निर्धन परिवार ऋणदेयता, विशेषकर ग्रामीण कृषि ऋणदेयता, के कारण भी अपने बच्चों को घरेलू नौकरों, कृषि मजदूरों एवं दैनिक दिहाड़ी कर्मचारियों के रूप में कार्य कराने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

विजय ए. कुमार एवं के. प्रसन्ना भारत में बाल श्रम नामक अपने लेख में यह विश्लेषित करते हैं कि चूंकि गरीब परिवारों हेतु सामाजिक सुरक्षा का कोई भत्ता उपलब्ध नहीं है इसीलिए माता-पिता मजबूर हो जाते हैं कि वे अपने बच्चों को श्रम बाजार में धकेल दें। श्रम बाजार में बच्चों की उपस्थिति वयस्कों के रोजगार स्तर को कम कर देती है, जिसके परिणामस्वरूप वयस्क मजदूरों की दिहाड़ी दरों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

इसके परिणामतः उभरी गरीबी माता-पिता को प्रेरित करती है कि वे बच्चों को परिवार के अस्तित्व हेतु काम करने के लिए बाध्य करें। इस दूषित चक्र को और मजबूती उस समय मिल जाती है जब गरीब लोग पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं क्षमता आदि का अधिगम नहीं कर पाते हैं। उत्पत्ति, जाति एवं धर्म जैसे समाजार्थिक मापकों की उपस्थिति भी तनाव एवं परेशानियों को बढ़ाती है। भारत में भिखारी बच्चों तथा घरों के हिंसापूर्ण वातावरण एवं जटिल आर्थिक स्थितियों के कारण घर से भाग आए बच्चों की संख्या भी काफी अधिक है।

इन बच्चों के सामने खाने एवं वस्त्र हेतु काम के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं होता। अभी भी बाल श्रम अस्तित्व में होने का एक अन्य प्रमुख कारण अनिवार्य शिक्षा हेतु किसी उपबंध की कमी होना है, जिसके परिणामस्वरूप अनेक उद्योगों के औपचारिक एवं अनौपचारिक क्षेत्रों में बच्चों को आसानी से एवं त्वरित रोजगार प्राप्त हो जाता है क्योंकि बाल श्रमिकों को रोजगार देना एक लाभ का सौदा है। बच्चे श्रम के सस्ते साधन हैं, जो बिना किसी विरोध के वयस्क के समान कार्य को कम लागत में करते हैं। इससे नियोक्ता के लाभ में वृद्धि होती है।

अतः माता-पिता की अपने बच्चों को कार्य के लिए भेजने की चाह तथा नियोक्ता द्वारा उन्हें रोजगार प्रदान करना बाल श्रम के निरन्तर चलते रहने को सुनिश्चित करता है। कठिन परिस्थितियों में काम के दौरान बाल मजदूरों को अहेलित एवं प्रताड़ित किया जाता है। देश के अनेक भागों में किए गए अध्ययन समान रूप से वही दशति हैं कि बाल श्रमिकों को लम्बी अवधियों के लिए काम करना पड़ता है तथा प्रायः उन्हें भुगतान कम किया जाता है।

अध्ययन यह भी दशति हैं कि बच्चे कई जगहों पर अमानवीय स्थितियों में भी काम करते हैं, जहां उनके जीवन को निम्नतम सुरक्षा भी प्राप्त नहीं होती है। ईट की भट्टियों में वे भारी बोझ उठाते हैं परिणामतः उन्हें चोट, कमजोरी एवं विकृति आदि को सहना पड़ता है। कालीन बुनने वाले बच्चे ऐसी परिस्थितियों में काम करते हैं जो उनकी दृष्टि को नष्ट तथा अंग एवं पिछले भाग को विकृत कर सकती हैं।

कश्मीर के कालीन उद्योग में 60 प्रतिशत रोजगार प्राप्त बच्चों में तपेदिक एवं दमे की शिकायत पाई गई, क्योंकि वे निरंतर ऊन एवं रुई के रोयों को अन्दर लेते रहते हैं। उत्तर प्रदेश स्थित फिरोजाबाद के कांच-चूड़ी उद्योग में कार्यरत बाल मजदूर दमा, श्वासनली-शोध एवं दृष्टि रोगों से पीड़ित हैं। निर्माण कार्यों में कार्यरत बच्चों को चोटें लग सकती हैं या दुर्घटनाएं हो सकती हैं।

ऐसी ही स्थिति आग भट्टी उद्योगों में कार्यरत बच्चों की है। मशीन की दुकानों एवं यांत्रिक कार्यों में अनेक ऐसे कार्य हैं जैसे परीक्षण का अभाव; औजारों के रख-रखाव का अभाव; चश्मों, दस्तानों एवं अन्य सुरक्षात्मक उपकरणों की कमी; खराब रोशनी व्यवस्था एवं अपर्याप्त वायु-संचालन जिनके परिणामस्वरूप दुर्घटनाएं एवं बीमारियां होती हैं। कार्य के दौरान दुर्घटना या अन्य कार्य संबंधी कठिनाई से ग्रस्त बच्चे को प्रायः उपचार या रियायत नहीं दी जाती है।

बच्चों द्वारा श्रमिक गतिविधियों में भाग लेने के कारण उनमें शैक्षिक विकास की क्षमता कम हो जाती है। सम्पन्न परिवारों के बच्चों की तुलना में गरीब परिवार के बच्चों को शिक्षा के अधिगम प्राप्त नहीं होते। कई बार शिक्षा हेतु उपलब्ध आधारिक सरंचना के बावजूद बच्चे इन सुविधाओं का प्रयोग नहीं करते हैं क्योंकि विद्यालय प्रवेश के संबंध में कुछ प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कीमतें होती हैं। स्कूली पढ़ाई की कमी कुशल कार्यों एवं अन्य ऐसी संभावनाओं हेतु उनकी पात्रता को अस्वीकृत करा देती है। अतः शिक्षा वह यंत्र है जो यह सुनिश्चित करता है कि अधिक से अधिक बच्चे स्कूल जाएं तथा समाज की धरोहर बनें।

बाल-श्रम विकट रूप से बंधुआ श्रम से जुड़ा हुआ है। आन्ध्र प्रदेश में बंधुआ मजदूरों में 21 प्रतिशत 16 वर्ष से कम आयु के बच्चे हैं। कर्नाटक में 10.3 प्रतिशत और तमिलनाडु में 8.7 प्रतिशत इस आयु समूह के हैं। एक अध्ययन से ज्ञात होता है कि बंधुआ मजदूर बनते समय कई मजदूर केवल पांच वर्ष के होते हैं। उड़ीसा में ऋण चुकाने का एक आम तरीका आठ से दस वर्ष की अपनी पुत्रियों को ऋणदाताओं को नौकरानी के रूप में बेचना है। देश के कई भागों में बंधुआ पिता, जो 40 वर्ष से अधिक आयु के हैं, अपने पुत्रों को बंधुआ बनाकर स्वयं को मुक्त करते हैं।

बच्चे हानिकर प्रदूषित कारखानों में काम करते हैं जिनकी दीवारों पर कालिख जमी रहती है और हवा में विषादजनक बू होती है। वे ऐसी भट्टियों के पास काम करते हैं, जो 1400° सेल्सियस के तापमान पर जलती हैं। वे आर्सनिक और पोटाशियम जैसे खतरनाक रसायनों को काम में लेते हैं। वे कांच-धमन (Glass Blowing) की इकाइयों में कार्य करते हैं, जहां इस काम से उनके फेफड़ों पर जोर पड़ता है, जिससे तपेदिक जैसी बीमारियां होती हैं।

कार्यरत बच्चों में कई अपने परिवार में प्रमुख अथवा प्रधान वेतनभोगी होते । हैं जो अपने आश्रितों के भरण-पोषण के लिए सदैव चिन्तित रहते हैं। प्रवासी बाल श्रमिक, जिनके माता-पिता दूर किसी शहर अथवा गांव में रहते हैं, साधारणतया निराश रहते हैं। जब कारखाने पूरी तरह चालू रहते हैं तो उन्हें 500 रुपये प्रतिमाह तक मिल जाते हैं और कमाई हुई सम्पूर्ण राशि वे अपने अभिभावकों को देते हैं और वे अभिभावक उन्हें रात की पारी के लिए एक रुपया भी चाय के लिए नहीं देते। ऐसा भी कई बार होता है कि जब उनके बदन में दर्द होता है, दिमाग परेशान होता है, उनके दिल रोते हैं और आत्मा दुःखी होती है, उस समय भी मालिकों के आदेशों पर उन्हें 15 घंटे लगातार काम करना पड़ता है।

दिल्ली, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के कारखानों में जाने पर यह पता चलता है कि बड़ी संख्या में बाल श्रमिकों की छातियां बैठी हुई हैं और हड्डियों के जाल पतले हैं, जिस कारण वे दुर्बल दिखाई पड़ते हैं। बाल श्रमिकों की एक बड़ी संख्या छोटे कमरों में अमानुषिक स्थितियों और अस्वास्थ्यकर वातावरण में रहती है। इनमें से अधिकांश बच्चे बहुत ही निर्धन परिवारों के होते हैं। या तो वे स्कूल छोड़े हुए होते हैं या कभी भी स्कूल गये हुए नहीं होते।

उन्हें बहुत कम मजदूरी मिलती है और वे अत्यन्त खतरनाक स्थितियों में काम करते हैं। जोखिम भरी स्थितियां उन्हें नुकसान पहुंचाती हैं। बच्चों को फेफड़ों की बीमारियां, तपेदिक, आंख की बीमारियां, अस्थमा, ब्रोन्काइटिस और कमर के दर्द होते हैं। कुछ आग की दुर्घटनाओं में घायल हो जाते हैं। कई बीस वर्ष की आयु में ही नौकरी करने योग्य नहीं रहते। यदि वे घायल अथवा अपंग हो जाते हैं तो मालिकों द्वारा उन्हें निर्दयतापूर्वक निकाल दिया जाता है।

बाल श्रम की समस्याओं का सामना करने के लिए अनेक सवैधानिक एवं विधिक उपबंधों का निर्माण किया गया है। भारत सरकार ने अपनी संवैधानिक बाध्यताओं के अतिरिक्त बाल श्रम से संबंधित अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की छः प्रसविदाओं पर भी हस्ताक्षर किए हैं। भारत सरकार द्वारा बाल श्रम के बहिष्करण हेतु अनेक कार्यक्रमों के लिए आईएलओ से सहायता प्राप्त की जाती है।

 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-24 में यह व्यवस्था की गई है कि, “14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी कारखाने, खान या अन्य कठिन रोजगार में नहीं। लगाया जाएगा।” राज्य नीति के निदेशात्मक नियमों के अनुच्छेद-39(ड) एवं 35 (च) राज्य से मांग करते हैं कि राज्य यह सुनिश्चित करे कि श्रमिक व्यक्तियों, महिलाओं एवं छोटी आयु के बच्चों की शक्ति एवं स्वास्थ्य का उल्लंघन नहीं हुआ है तथा नागरिकों को आर्थिक आवश्यकता इस हेतु बाध्य नहीं करती है कि वे अपनी आयु एवं शक्ति से अनुपयुक्त व्यवसाय का चयन करें तथा “बच्चों को यह अवसर एवं सुविधाएं प्रदान की जाती हैं कि वे अपने आस-पास स्वस्थ वातावरण तथा स्वतंत्र एवं अखण्ड परिस्थितियों में विकास कर सकें ताकि उनकी बाल्यावस्था एवं युवा अवस्था को शोषण तथा मानसिक एवं साधन परित्याग के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान की जा सके।”

संविधान का अनुच्छेद-45 यह व्यवस्था उपलब्ध कराता है कि राज्य अपने अस्तित्व में आने के दस वर्षों में 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए प्रयास करेगा।

भारत में कारखानों में कार्यरत बच्चों के रोजगार हेतु पहला विनियामक कानून 1881 में बनाया गया था। 1891 के अधिनियम ने रोजगार की निम्नतम आयु को 9 वर्ष कर दिया तथा बाल श्रमिक द्वारा कार्य करने की अवधि को 7 घंटे कर दिया गया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार ने फैक्ट्री अधिनियम, 1948 द्वारा कारखानों, खानों एवं अन्य कठिन कार्यों में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को रोजगार देने पर प्रतिबंध लगा दिया।

बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 पहला विस्तृत कानून है, जो 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को व्यवस्थित उद्योगों एवं अन्य कठिन औद्योगिक व्यवसायों (उदाहरणतः बीड़ी एवं कालीन निर्माण, माचिस निर्माण, बम एवं पटाखे) में रोजगार देने पर प्रतिबंध लगाता है। इन्हें अधिनियम की अनुसूची के भाग ‘क’ एवं ‘ख’ में सूचीबद्ध किया गया है। 1986 के अधिनियम का खण्ड-5 बाल श्रम तकनीकी सलाहकार समिति के गठन का सझाव देता है ताकि अधिनियम की अनुसूची में व्यवसायों एवं प्रक्रमों को सम्मिलित करने के लिए केन्द्र सरकार को सुझाव दिए जा सकें। समिति में एक अध्यक्ष तथा ऐसे सदस्य होते हैं, जिनकी संख्या 10 से अधिक नहीं होती। इनकी नियुक्ति केन्द्र सरकार द्वारा की जा सकती

कारखानों, खानों एवं परिसंकटमय नियोजनों में 14 वर्ष से कम आयु के बालकों के नियोजन को रोकना एवं अन्य नियोजनों में बालकों की कार्य स्थिति को नियंत्रित करना भारत सरकार की नीति है। बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 उपर्युक्त उद्देश्यों को प्राप्त करने की कोशिश करता है। यह अधिनियम की अनुसूची के भाग क एवं ख में सूचीबद्ध व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध करता है। यह अधिनियम अन्य नियोजनों, जो बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत प्रतिषेध नहीं है, में बालकों की कार्यस्थिति को भी नियंत्रित करता है।

अधिनियम की अनुसूची में अन्य व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं के जोड़ने के प्रयोजन में केन्द्र सरकार को सलाह देने हेतु बाल श्रम तकनीकी सलाहकार समिति (जो कि विशेषज्ञों का निकाय है) का गठन करने के लिए यह अधिनियम प्रबंध करता है। समिति में अध्यक्ष तथा अधिकतम 10 सदस्यों को केन्द्र सरकार नियुक्त करती है। तकनीकी सलाहकार समिति की सिफारिश पर पिछले पांच वर्षों के दौरान अधिनियम की अनुसूची में अंकित जोखिमपूर्ण व्यवसायों की संख्या 7 से बढ़कर 13 हो गयी है तथा प्रक्रियाओं की संख्या 18 से बढ़कर 57 हो गई है। ।। बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 को कार्यान्वित करने का अधिकार राज्य सरकार को दिया गया है। राज्य में श्रम विभाग को अपने निरीक्षणालय तंत्र के जरिए प्रवर्तन करने का अधिकार प्राप्त है।

बाल श्रम पर राष्टीय नीति की घोषणा 1987 में की गई थी। यह नीति वैधानिक कार्य योजना पर ध्यान केन्द्रित करती है; जहां संभव हो वहां बच्चों के लाभ हेतु सामान्य विकास कार्यक्रम; दिहाड़ी/अर्द्ध-दिहाड़ी रोजगारों में कार्यरत बच्चों के उच्च घनत्व क्षेत्रों में परियोजना आधारित कार्य योजनाएं इस नीति की परिधि में आती हैं।

परियोजना-आधारित कार्य योजनाओं के अंतर्गत सातवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 12 राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजनाएं (एनसीएलपी) आरम्भ की गईं। इन 12 राष्ट्रीय बाल परियोजनाओं को इन क्षेत्रों में लागू किया गया है-आंध्र प्रदेश (जगमपेट एवं मरकपुर), बिहार (गढ़वा), मध्य प्रदेश (मंदसौर), महाराष्ट्र (ठाणे), उड़ीसा (सम्भलपुर), राजस्थान (जयपुर), तमिलनाडु (शिवकाशी) एवं उत्तर प्रदेश (वाराणसी-मिर्जापुर-भदोई, मुरादाबाद, अलीगढ़ एवं फिरोजाबाद)। विद्यालयों की स्थापना एनसीएलपी नीतियों का एक मुख्य घटक है। यह विद्यालय रोजगार से हटाये गये बच्चों को गैर-औपचारिक शिक्षा; व्यावसायिक प्रशिक्षण, अनुपूरक पोषण, वृत्तिका, स्वास्थ्य सुरक्षा, इत्यादि उपलब्ध कराता है। विशेष विद्यालयों की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि ये काम करने वाले बच्चे अनेक समाजार्थिक संदर्भो से आते हैं, जिनमें भिन्न क्षमताएं एवं अनुभव होते हैं, जिन्हें सामान्य विद्यालय इनकी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप अनुरक्षित नहीं कर सकते हैं। विशेष विद्यालय इन कार्यरत बच्चों को सामान्य विद्यालयों में प्रवेश दिलाने में उपयोगी हैं।

प्रधानमंत्री द्वारा अगस्त 1994 में एक योजना की घोषणा की गई थी, जिसके अनुसार सभी कठिन रोजगार क्षेत्रों में कार्यरत बच्चों को वर्ष 2000 तक बाल श्रम से बाहर निकालना था। इस कार्यक्रम एवं सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के परिणामस्वरूप 12 सतत् परियोजनाओं के अतिरिक्त 64 क्षेत्र-आधारित परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई थी। नौवीं पंचवर्षीय योजना की समाप्ति तक, राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना को 13 राज्यों में 100 जिलों में विस्तारित किया गया था। दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान विद्यमान 100 बाल श्रम परियोजनाओं को निरंतर चलाने के लिए सरकार ने अनुमोदन दे दिया है। सरकार ने 150 अतिरिक्त बाल श्रम परियोजनाओं की स्थापना के लिए भी स्वीकृति दे दी है। इसलिए 10वीं पंचवर्षीय योजना में स्कीम को 20 राज्यों के 250 जिलों में लागू किया जाएगा। सभी 150 अतिरिक्त जिलों को निर्धारित कर दिया गया है और नये निर्धारित जिलों में योजना का कार्यान्वयन करने के प्रयास पहले से ही किए जा रहे हैं। 10वीं पंचवर्षीय योजना के लिए व्यय को पिछली योजना अवधि की तुलना में 250 करोड़ रुपए से 667 करोड़ रुपए तक बढ़ाया गया है (इण्डस परियोजना में श्रम और रोजगार मंत्रालय के अंशदान सहित)।

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Essay on Child Labor in Hindi

 

प्रस्तावनाः

देश एवं राष्ट्र के स्वर्णिम भविष्य के निर्माता उस देश के बच्चे होते हैं। अतः राष्ट्र, देश एवं समाज का भी दायित्व होता है कि अपनी धरोहर की अमूल्य निधि को सहेज कर रखा जाये। इसके लिये आवश्यक है कि बच्चों की शिक्षा, लालन-पालन, शारीरिक एवं मानसिक विकास, समुचित सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाये और यह उत्तरदायित्व राष्ट्र का होता है, समाज का होता है, परन्तु यह एक बहुत बड़ी त्रासदी है कि भारत देश में ही नहीं अपितु समूचे विश्व में बालश्रम की समस्या विकट रूप में उभर कर आ रही है।

चिन्तनात्मक विकासः

बालश्रम की समस्या से आज देश ही नहीं अपितु विश्व के अधिकांश देश ग्रस्त हैं। बालश्रम की समस्या का मूल कारण गरीबी एवं जनसंख्या वृद्धि होती है और इस दृष्टि से भारत इन दोनों समस्याओं से ग्रसित है। सभी बच्चों को अपने परिवार के सदस्यों का पेट भरने हेतु कमरतोड़ मेहनत वाले कार्यों में झोंक दिया जाता है, जबकि उनका कोमल शरीर और कच्ची उम्र उन कार्यों के अनुकूल नहीं होती। उनकी उम्र खेलने-कूदने और पढ़ने की होती है, किन्तु खतरनाक उद्योगों या कार्यों में जबरन लगा देने के कारण ऐसे बच्चे फूल बनने से पूर्व ही मुरझा जाते हैं। गंभीर चोट, जलने या खांसी, दमा, टी.बी जैसी अनगिनत बीमारियों का शिकार होकर दम तोड़ देते हैं या फिर जिंदा लाश बनकर मौत का इन्तजार करते रहते हैं। विगत कुछ वर्षों से देश-विदेश में बालश्रम पर रोक लगाने हेतु अनेक प्रयास किये जा रहे हैं।

भारत में अनेक संगठनों द्वारा एवं उच्चतम न्यायालय द्वारा अनेक महत्वपूर्ण फैसले लिये गये हैं। अनेक विदेशी संगठनों द्वारा भी इस ओर अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। इन सब प्रयासों के बावजूद भी समस्या वैसी की वैसी बनी हुई है, बल्कि परिस्थितियाँ और भयावह होती जा रही हैं। अतः इस ओर सार्थक एवं कड़े प्रयास अत्यन्त आवश्यक हैं। उपसंहार: बाल मजदूरी को रोकने हेतु संविधान बनने से लेकर आज तक समय-समय पर योजनाएं बनती रही हैं।

राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में इनके मानवाधिकारों की बहाली के लिए कई घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन वे सभी कागजी कार्यवाही के स्तर पर ही रह जाती हैं। प्रश्न यह उठता है कि विभिन्न संगठनों द्वारा, उच्चतम न्यायालय द्वारा किये गए प्रयास सफल होंगे या नहीं, फिर भी इस समस्या को कम करने में शिक्षा का प्रसार, उद्योग के संगठित क्षेत्र को प्रोत्साहन, सार्वजनिक दबाव, गरीबी एवं जनसंख्या नियन्त्रण एवं इस संबंध में निर्मित कानूनों को दृढ़ता से लागू करना सहायक हो सकता है।

“जिस देश के बच्चों का कोई भविष्य नहीं होता, उस देश का भी अपना कोई भविष्य नहीं होता।”

उपरोक्त पंक्तियों से स्पष्ट है कि बाल मजदूरी या बालश्रम किसी भी देश के लिए अभिशाप कही जा सकती है। यह एक सामाजिक बुराई है क्योंकि इससे न केवल बालकों का मानसिक व शारीरिक विकास बाधित होता है बल्कि समूचे देश की प्रगति भी एकांगी हो जाती है। केवल कानूनी प्रावधानों से इस सामाजिक समस्या से आंखें नहीं मूंदी जा सकती, क्योंकि यह अपने आप में कोई अलग मसला नहीं, अन्य समस्याओं से पैदा हुई समस्या है। बालश्रम एक अत्यन्त व्यापक समस्या है। यह समूचे समाज में अपनी जड़ें मजबूत किये हुये है। अन्ततः यह भयंकर महामारी के रूप में उभर रही है और निदान रहित होती जा रही है।

देश में बाल श्रमिकों की स्थिति दयनीय है। इन बच्चों के हिस्से में सूरज की रोशनी नहीं है। इनके दिन भी रातों की तरह स्याह हैं। वे बंद जगह में 15-16 घंटे काम करते हैं और फिर उन्हीं अंधेरी कोठरियों में सो जाते हैं। खाने को उन्हें बस सूखी रोटियां मिलती हैं। उनके लिए चंदा मामा नहीं हैं। पेड़, पौधे, तितलियों से भी उन्हें कोई वास्ता नहीं। उनका वास्ता तो बस मालिक से है। राक्षसों की तरह क्रूर मालिक, जो उन्हें मारता-पीटता है और गर्म सलाखों से दाग देता है। बच्चों के दिलो दिमाग पर इसी का आतंक है। यह भय तो अब बच्चों की नींद में भी उतर गया है।

जब दूसरे बच्चे सपने देख रहे होते हैं, ये जाग जाते हैं। इनकी अनथक परिश्रम करने की दिनचर्या शुरू हो जाती है, जो फिर देर रात तक जारी रहती है। जिस उम्र में बच्चे किस्से- कहानियां सुनते हैं, उसमें ये मालिक की गालियां सुनते हैं। इनकी सूनी आंखें और सहमे चेहरे देखकर ही अहसास हो जाता है कि इनका जीवन कितना कठोर है। इनके हिस्से में स्कूल, स्लेट, कलम, किताबें, लाड़-दुलार, खेलकूद कुछ नहीं है। इनका जीवन तो लगातार काम, गालियां और पिटाई खाना ही है।

5-6 साल की उम्र से लेकर 14-15 साल तक की उम्र के बच्चे गरीब होने का खमियाजा भुगत रहे हैं। इन्हें दलाल दूरदराज के गांवों से सब्जबाग दिखाकर कारखानों तक ले जाते हैं। कई जगह मां-बाप द्वारा लिया कर्जा चुकाने के लिए बच्चे मजदूर बनते हैं। बच्चे अपहृत करके भी लाये जाते हैं। बच्चों के काम करे बिना गरीब परिवारों का गुजारा नहीं होता। पांच साल के होते-होते ये बच्चे कमाऊ पूत बन जाते हैं। इनके लिए गांव में रोजगार नहीं बचे। घरेलू व कुटीर उद्योग नष्ट हो गये हैं। बच्चों के सामने अमानवीय स्थितियों में काम करने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं रह गया।

गांव से हर साल हजारों बेरोजगार बच्चे काम की तलाश में निकलते हैं। आजादी के बाद हमने जिस तरह की विकास नीति अपनायी है, उसने गांव के आर्थिक, सामाजिक, ढांचे को तहस- नहस कर दिया है। बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के नाम पर लोग विस्थापित हुए हैं। इन्हें न मुआवजा मिला, न जमीन। परिवार के परिवार मजदूरी करने को विवश हो गये। एक सर्वेक्षण से यह तथ्य उभर कर सामने आया है कि जहां पर्यावरण का अत्यधिक विनाश हुआ है, वहां बाल मजदूरों की संख्या भी बढ़ी है। दूसरी तरफ जिन क्षेत्रों में पर्यावरण विनाश कम हुआ है, वहाँ बाल मजदूरों की संख्या में भी कमी आई है।

बालश्रम की समस्या केवल भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में जैसे लेटिन अमेरिका, एशिया, अफ्रीका आदि देशों में भी व्याप्त है किन्तु भारत में इसका प्रतिशत अधिक है। भारत में बाल श्रमिकों के बारे में कोई सही सरकारी आँकडे उपलब्ध नहीं हैं किन्त एक अनुमान के अनुसार इनकी संख्या 40 लाख से ऊपर है। विगत चार वर्षों में बाल श्रमिकों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। यूनिसेफ की ताजा विज्ञप्ति के मुताबिक भारत में दस करोड़ बाल मजदूरों में से डेढ़ करोड़ बच्चे बंधुआ मजदूरी की बेड़ियों में जकड़े हुये हैं। हमारे यहाँ शहरीकरण की प्रवृत्ति बेसहारा बच्चों की संख्या में वृद्धि का एक प्रमुख कारण है। गाँव में गरीबी है, इसलिये पेट की भूख मिटाने के लिये बच्चे शहरों की तरफ पलायन करते हैं। इस पलायन के मूल में है हमारी व्यवस्था। यह पलायन देश में सामाजिक असमानता, भ्रष्टाचार और भुखमरी के कारण ही रहा है।

बाल श्रमिकों पर प्रतिबंध लगाने से इस समस्या का हल क्या संभव है? देश में दर्जनों कानून और श्रम मंत्रालय भी इसे रोक नहीं सके। प्रशासन की नाक के नीचे सड़क के इस पार और उस पार बाल मजदूर अपनी बेबस आंखों से नन्हें हाथों के जरिये, काम कर रहे हैं। फिर क्या लाभ, इन कानूनों का और एक अलग बनाये महकमे का।

विदेशों में बाल श्रमिकों पर पाबंदी की मांग कर रहे कुछ स्वयंसेवी संगठनों ने इस मुद्दे को धंधा बना लिया है। समाचार पत्रों में खबर बनने की लालसा से कभी प्रदर्शन तो कभी धरना आयोजित कर वे अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। देश में बालश्रम की समस्या को दूर करने के उद्देश्य से दर्जनों स्वयंसेवी संगठन जुटे हुए हैं। किंतु कोई मन से नहीं। स्वयंसेवी संगठनों के लोग बच्चों को पांच सितारा होटलों में विदेशी मीडिया के समक्ष पेश कर अपने धंधे को और चमका लेते हैं, किंतु वह मजदूर बच्चा उसी चौराहे पर फिर से खड़ा नजर आता है, जहां के हर रास्ते गुलामी की अंधी गली की तरफ ही जाते हैं। देश में बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई के कारण बच्चों को ‘नर्क’ में ढकेला जा रहा है। मां-बाप बच्चों को पढ़ा नहीं सकते। शिक्षा प्राप्त करना अब सस्ता नहीं रह गया। अगर पढ़-लिख लें तब भी लड़कों को नौकरी कहां मिलती है। इस कारण अपना बोझ सर से उतारने और कुछ आमदनी हो जाने के लोभ से बच्चे को उधर ढकेल दिया जाता है।

फैक्टरी मालिक या अन्य व्यवसायी यह सोचते हैं कि कम उम्र के बच्चों में काम करने की ललक ज्यादा होने के कारण जल्दी कार्य हो जाएगा और बच्चों की जरूरतें कम होने से जो भी दिया जाएगा, सब चल जाएगा। इस धारणा से वे बच्चों को प्राथमिकता देने लगे हैं। कम पैसे में दो वयस्क के बराबर काम हो जाता है और ऊपर से यूनियनबाजी का कोई चक्कर नहीं। पर इस तुच्छ लाभ से तो बच्चों का भविष्य गर्त में जा रहा है। अशिक्षित ही रह जाने से उनका सर्वांगीण विकास नहीं होगा। इससे वह लोकतंत्र की मर्यादा को कहां तक समझेंगे। जब वे अविकसित मानसिकता के साथ वयस्क होंगे तो समाज व राजनीति से वे छले जाएंगे। क्या यही उनकी नियति है। बचपन में मां-बाप व मालिक से ठगा और जवानी में समाज ने। सच में बालश्रम एक सामाजिक कोढ़ है।

अधिकांश विकासशील देशों में नगरीय रोजगार की धीमी गति के कारण बाल श्रमिकों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। गांवों में लघु व कुटीर उद्योगों का लोप होने एवं कृषि व्यवस्था भगवान भरोसे चलने से शहर पर बोझ बढ़ा है। ग्रामीण अप्रवासियों की संख्या शहरों में दोगुनी बढ़ी है। न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति की खातिर और बढ़ती भूमिहीनता के कारण बच्चों से किसी भी प्रकार का काम कराया जा रहा है। अब अच्छा या बुरा कहां देखा जा रहा है।

कैसी विडंबना है कि आज बच्चों की मुस्कान पर लिखी साहित्यिक टिप्पणियां बेमानी साबित हो रही हैं। कहीं नहीं दिख रही है बच्चों की प्राकृतिक चहचहाट। इस उम्र में बच्चों को ‘अ’ से अनार और ‘आ’ से आम कहना चाहिए तो आज वे अपने कोमल हाथों से सुहागिनों की निशानी रंग-बिरंगी चूड़ियां बनाने को अभिशप्त हैं। शिक्षा का प्रसार और ‘बड़ा’ बनाने के लिये बेचारे स्लेट- पेंसिल तो नहीं पकड़ पाये पर उसका निर्माण करने हेतु सिलिकोसिस नामक घातक बीमारी को जरूर ग्रहण कर रहे हैं।

झरनों के संगीत और माँ के लाड़-प्यार तथा कुछ बनने की उमंग से बिल्कुल बेखबर ये बच्चे विकास के तमाम दावों पर प्रश्नचिन्ह प्रतीत होते हैं। बच्चों की एक बड़ी संख्या खेती में भी लगी है। सबसे अधिक बाल मजदूर उत्तर प्रदेश में हैं। इसके बाद आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाम में भी बाल मजदुर अधिक संख्या में हैं।

दियासलाई एवं आतिशबाजी उद्योग में काम करने का भी बच्चों पर घातक असर होता है। यहां फॉस्फोरस से चेहरा विकृत होना, सल्फर से सांस की तकलीफ और आंखों के रोग तथा क्लोरेट्स से खांसी हो जाती है। ये ट्रासोब्रोजाइटिस, हिपरप्लेसिया, फोटोफोबिया, लेक्रिमेशन व दमा जैसे रोगों से घिर जाते हैं। गले में जलन, चर्मरोग, बेहोशी व एनीमिया भी इन्हें नहीं बख्शता। इस उद्योग में दुर्घटनाओं की भरपूर गुंजाइश होती है। कुछ समय पूर्व पटाखा फैक्ट्रियों में विस्फोट से कई बच्चे मारे गये हैं।

ताला बनाने के दौरान बच्चे विभिन्न आकारों के तालों को काटने  इलेक्ट्रोप्लेटिंग, बफिंग मशीन पर पालिशिंग, टुकड़ों को जोड़कर ताले का निर्माण और पैकेजिंग आदि का काम करते हैं। ये सभी काम स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं। कई बार तालों को काटते समय बच्चों की अंगुलियाँ तक कट जाती हैं। इलेक्ट्रोप्लेटिंग के काम में बच्चों को एसिड व एल्कलाइन के घोल तथा खतरनाक गैसों के प्रयोग से आंखों में जलन और सांस लेने में तकलीफ हो जाती है। हाइड्रोप्लेटिंग के काम से आंतों का कैंसर हो जाता है। बच्चों को नंगे हाथों से इनके घोल से घंटों काम करना पड़ता है। यहां 8 से लेकर 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चे काम करते हैं।

दूसरे कई उद्योगों की भी यही स्थिति है। कालीन बनाने में बच्चों को सांस लेने में दिक्कत शरीर, दर्द, जोड़ों में दर्द, दिखाई कम देना और भूख न लगने जैसी शिकायतें पैदा हो जाती हैं। चीनी मिट्टी उद्योग में काम करने से एस्मेटिक ब्रांजाटिस हो जाता है, जो बाद में तपेदिक में बदल जाता है। रन पालिश के काम में भी छूत रोग और तपेदिक हो जाने का खतरा रहता है। इन उद्योगों में स्वास्थ्य की सुरक्षा के कोई उपाय नहीं किये जाते। ज्यादातर उद्योग तो स्वास्थ्य रक्षा उपकरणों का इस्तेमाल भी नहीं करते।

भारत जनसंख्या की दृष्टि से बाल मजदूरों का सबसे बड़ा पालक है। भारत का साक्षरता प्रतिशत वर्ष 1961 से 1981 के बीच 40.8 रहा है। जनसंख्या के बहाव के साथ-साथ असाक्षर व्यक्ति इस दौरान 33.3 करोड़ से 43.8 करोड़ हो गये थे। अतः करीब पचास लाख असाक्षर व्यक्ति प्रतिवर्ष इन बीस वर्षों में बढ़े। अन्य एशियाई देशों ने प्राथमिक शिक्षा के लिए अनुकूल तत्परता दिखाई है।

बहुत से विकासशील देशों की स्थिति भी भारत से अच्छी है। श्रीलंका जैसे गरीब देश में सत्तर प्रतिशत बच्चे स्कूली शिक्षा पूरी कर रहे हैं। इंडोनेशिया का जहां 1930 तक साक्षरता प्रतिशत 6.4 था, अब वहां 74 प्रतिशत लोग साक्षर हैं। इसी तरह अफ्रीकी देश जिनकी प्रति व्यक्ति आय भारत से कम है वहां 50 से 75 प्रतिशत लोग साक्षर हैं।

इन देशों में, बोत्स्वाना, कैमरून, गुयाना, जाम्बिया, घाना, मेडागास्कर तथा जिम्बाब्वे आदि प्रमुख हैं। अब यदि आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो हमारी स्थिति दयनीय ही है। हमने अपने यहां मुक्त शिक्षा का प्रावधान किया है लेकिन इसके बावजूद वांछित सफलता नहीं मिल पा रही है।

बाल मजदूरी की दयनीय स्थिति को देखकर हर संवेदनशील व्यक्ति का हृदय रो उठेगा। पण्डित जवाहर लाल नेहरु की जन्मतिथि 14 नवम्बर को ‘बाल दिवस’ के रूप में देश भर में मनायी जाती है। इस दिन देश के नौनिहालों के उज्जवल भविष्य की लम्बी-चौड़ी बातें की जाती हैं। इस अवसर पर विभिन्न राजनेताओं की बातें सुनकार ऐसा लगता है कि मानों हमारे देश के बच्चे दुनिया के सबसे खुशहाल बच्चे हैं। सरकारी संस्थाएं और अधिकारी, आंकड़े दिखाकर यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि हमारे देश के बच्चों का भविष्य सुरक्षित है, परन्तु हकीकत कुछ और ही है।

उच्चतम न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में खतरनाक उद्योगों में बाल श्रमिकों की प्रथा पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाते हुये इनमें कार्यरत बच्चों की शिक्षा हेतु बाल श्रमिक पुनर्वास एवं कल्याण कोष बनाने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने इन बाल श्रमिकों की शिक्षा के लिए एक कल्याण कोष बनाने का निर्देश भी दिया है। इसमें बाल श्रमिक के नियोक्ताओं को 20 हजार रुपये और सम्बंधित राज्य को पाँच हजार रुपये प्रति बाल श्रमिक योगदान करने का निर्देश दिया गया है।

कोर्ट ने यह रोक घातक माने जाने वाले उद्योगों में लगायी है। गैर-घातक उद्योगों में बाल श्रमिकों की स्थिति में सुधार के लिए भी कोर्ट ने व्यापक निर्देश जारी किये हैं। कोर्ट ने यह फैसला शिवकाशी के माचिस उद्योगों के संदर्भ में दायर एक याचिका पर सुनाया है। निश्चित रूप से इस फैसले का देश भर में व्यापक असर होगा क्योंकि विभिन्न उद्योगों में अभी भी बाल श्रमिक कार्यरत हैं। भारत में बच्चों का आर्थिक शोषण बड़े पैमाने पर किया जाता है और ऐसा लगता है कि हाल के कुछ वर्षों में इसमें बढ़ोतरी हो गई है।

1981 में हुई भारत की जनगणना ने यह अनुमान लगाया था कि करीब 1 करोड़ 30 लाख बच्चे (14 वर्ष से कम उम्र वाले) अधिकांशतः खेतिहर गतिविधियों में लगे हुए हैं। 1993 में नेशनल सैम्पल सर्वे ने अनुमान लगाया कि 5 से 15 वर्ष की आयु के 1 करोड़ 70 लाख बाल मजदूर कार्यरत हैं। आपरेशन रिसर्च ग्रुप ने 1983 में इस संख्या को 4 करोड़ 40 लाख बताया। इनमें से अधिकांश बच्चे कृषि तथा उद्योगों में दमघोंट परिस्थितियों में रह कर काम करते हैं, जो अक्सर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं। गैर- सरकारी संगठनों द्वारा लगाए गए अनुमान के अनुसार दासता की स्थितियों में रह कर काम करने वाले बच्चों की मौजूदा संख्या 5 करोड़ 50 लाख है। अगर बाल मजदूरों की जाति में उन तमाम बच्चों को जोड़ दिया जाये जो कभी स्कूल नहीं जाते और छोटे-मोटे घरेलू कामों में उलझे हए हैं तो संख्या दुगनी से ज्यादा हो जाएगी।

अगर बाल मजदूरी की जड़ को तलाशा जाए तो स्पष्ट होता है कि जातियों और वर्गों पर आधारित हमारी सामाजिक व्यवस्था ही इस प्रकार की है। निम्न जाति और वर्गों के परिवारों में जन्म लेने वाले बच्चों को शुरु से ही मजदूरी विरासत में मिलती है। ऐसे निरीह बच्चों के माता- पिता यह मानकर चलते हैं कि हमारे बच्चे पढ़-लिख तो सकते नहीं, तो क्यूं न दो-चार पैसे कमाएं।

यह कटु सत्य है कि विगत सरकारों के द्वारा जाति के आधार पर विशेष सुविधा मुहैया कराकर गरीबी उन्मूलन का प्रयास पूरी तरह से विफल रहा है। गरीब का राजनीतिकरण भले हआ है लेकिन गरीबी को कम करने की घोषणा महज राजनीतिक हथकंडे के अलावा कछ नहीं है। बच्चे अपनी मर्जी से मजदूरी करने के लिए इच्छुक नहीं होते हैं। यह सच है कि यह एक सामाजिक बुराई है और इसे समाप्त करने के लिए समाज और परिवार के विभिन्न पहलुओं को समझना भी जरूरी होगा। बाल विकास की समस्या मूल रूप से महिलाओं के विकास से भी जुड़ी है। बाल मजदूरी को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए महिलाओं के विकास को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय के निर्णय के संदर्भ में जजों ने निर्देश दिया है कि संविधान की धारा 45 के अनुसार देश के सभी बच्चों को 14 साल की आयु तक अनिवार्य शिक्षा देने का प्रावधान | है। साथ ही यह शिक्षा निःशुल्क दी जानी चाहिए। इसलिए बाल श्रमिक निरीक्षक की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की है कि संविधान के इस निर्देश का पालन हो रहा है या नहीं। निरीक्षकों के अलावा जिलाधिकारियों को भी योजना के कार्यान्वयन पर निगाह रखनी चाहिए।

उच्चतम न्यायालय के निर्णय के पूर्व भी बाल मजदूरी को खत्म करने के लिए अनेक कानून बनाये गए हैं। भारतीय संविधान के अनुच्देद 24 के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से कारखानों, फैक्ट्रियों व खानों में जोखिम भरे काम कराना अपराध है। इस अनुच्छेद का उद्देश्य बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा करना है। बाल अधिनियम 1933, बाल रोजगार अधिनियम 1938. भारतीय फैक्ट्री अधिनियम 1940, औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, खान अधिनियम 1952, ये सारे अधिनियम बाल कल्याण के लिए बाल मजदूरी की सेवाओं, कार्य दशाओं, कार्य के घंटे, मजदूरी दर आदि को नियमित करते हैं।

1986 में बाल श्रमिक कानून अधिक प्रभावी माना गया। इसके अंतर्गत बाल मजदूरों का शोषण करने वालों के विरुद्ध कठोर दंड की व्यवस्था रखी गई है। इन अधिनियमों के अनुसार, बीडी निर्माण, कालीन बुनाई. सीमेंट उत्पादन, माचिस या विस्फोट सामग्री उत्पादन, कपड़ों की बनाई और रंगाई और कसाई खाना आदि कामों में 14 वर्ष से कम आय के बच्चों को श्रम पर नहीं लगाया जा सकता।

विगत समय पूर्व श्रम एवं कल्याण संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अपने अध्ययन में पाया कि केंद्र या राज्य सरकारों के पास बाल श्रम से संबंधित प्रामाणिक आंकड़े ही नहीं हैं। राज्य सरकारों ने बाल श्रम कानून को ठीक से लागू नहीं किया। राज्य सरकारें खामियों का फायदा उठाती हैं और केंद्र उन पर दोष मढ़ते रहता है।

स्थिति यह है कि 1986 में कानून पारित होने के बाद 4950 लोगों के खिलाफ कार्यवाई तो हुई, मगर अपराधी एक को भी नहीं ठहराया जा सका। बाल श्रम को लेकर सरकार अमरीका, ब्रिटेन और जर्मनी के दबाव में सक्रिय हई। इन देशों ने बाल श्रम का मददा बनाकर भारत में बने कालीनों का आयात रोकने की धमकी दी। कालीन के निर्यात से भारत को करीब दो हजार करोड़ की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। कालीन उद्योग में काम करने वाले बच्चों में 90 प्रतिशत की उम्र छह से बारह वर्ष के बीच है।

बच्चों के पसीने और मेहनत के जरिये अमरीका द्वारा आयातित वस्तुओं में बाल श्रम का उपयोग’ नामक रिपोर्ट में कालीन उद्योग में कार्यरत बच्चों की हालत पर चिन्ता जतायी गयी है। इसके अनुसार भारत के कालीन उद्योग में तीन लाख बच्चे काम करते हैं। पाकिस्तान में यह संख्या पांच लाख और नेपाल में दो लाख है। इसी तरह रत्न पालिश उद्योग के बारे में भी कहा गया है। 1993 में भारत ने एक अरब के जेवरात निर्यात किये थे। भारतीय कालीनों का सबसे बड़ा खरीददार अमरीका ही है।

एक तरफ अमरीका भारत के बाल श्रम पर चिंता प्रकट करता है, तो दूसरी तरफ ऊंट दौड़ के लिए सउदी अरब ले जाने वाले बच्चों के मामले में चुप रहता है। दरअसल इन देशों का मकसद भारत की अर्थनीति को चोट पहुंचाना है। यही वजह है कि इस मामले में जर्मनी का रगमार्क फांउडेशन अचानक महत्वपूर्ण हो गया है। निर्यात किये जाने वाले कालीनों के लिए रगमार्क का प्रमाण पत्र जरूरी हो गया। यह लिख कर देता था ‘यह कालीन बच्चों के श्रम से नहीं बना है।’ इस काम में रगमार्क ने खूब धांधली की।

भारत सरकार के सामने दिक्कत यह है कि एक तो वह नयी आर्थिक नीति के चलते विदेशी पूंजी की मोहताज हो गयी है, दूसरे वह अपने कानूनों का पालन न करवा पाने के कारण अपराध बोध से भी ग्रस्त है। इसलिए आनन-फानन में सरकार को कुछ सक्रियता दिखाना जरूरी लगा। सो एक बार फिर सरकार बाल श्रम की स्थिति सुधारने में जुट गयी।

बच्चों से मजदूरी करवाने वाली 42 इकाइयां बंद कर दी गयीं। अन्य 34 इकाइयों को काली सूची में डाल दिया। सरकार ने कालीन इकाइयों का पंजीकरण भी शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश में अब तक 79 हजार इकाइयां पंजीकृत हो चुकी है। सरकार का दावा है कि इन प्रयासों से कालीन उद्योग में बच्चों की संख्या 3.6 प्रतिशत से घटकर 2.7 प्रतिशत ही रह गयी है।

बाल श्रम उन्मूलन के लिए केंद्र सरकार ने 850 करोड़ रूपये की विशाल परियोजना शुरू की है। इसके तहत कई कल्याणकारी कार्यक्रम चलाये जाएंगे। स्कूल में दोपहर के भोजन की भी व्यवस्था होगी। वर्तमान में 34 करोड़ खर्च करने का प्रावधान है। इसके लिए 13 राज्यों के 322 जिलों में बाल श्रमिकों के क्षेत्र की पहचान होगी। इनमें शिवकाशी, मिर्जापुर, भदोही, जयपुर, मंदसौर, संबलपुर, ठाणे, अलीगढ़, फिरोजाबाद, गढ़वा, मुरादाबाद और जामनगर आदि शामिल अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की मदद से अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम उन्मूलन (इपेक) तथा बाल श्रमिक कार्य एवं सहायता कार्यक्रम (कलैस्प) 1993 से चल रहे हैं। इपेक के तहत 15 राज्यों में 49 परियोजनाओं में 17680 बच्चे जडे हैं। यनीसेफ ने भी 1991-95 के दौरान बाल श्रमिक कार्यक्र से संबद्ध मास्टर प्लान के संचालन के लिए पांच लाख डालर मंजूर किये हैं।

श्रम विभाग में अलग से महिला एवं बाल प्रकोष्ठ बनाने के प्रस्ताव को योजना आयोग ने मंजूरी दे दी है। इस काम में स्वयं सेवी संस्थाओं को भी जोड़ने की योजना है। सरकार इन संस्थाओं को 75 प्रतिशत वित्तीय सहायता देकर दस परियोजनाओं का क्रियान्वयन करवा रही है। बाल श्रम के मामले में इन गैर सरकारी संस्थाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है। इस समय ऐसे 124 संगठन सक्रिय हैं। इनमें सबसे ज्यादा तमिलनाडु राज्य में हैं। इसके बाद उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, बिहार, आध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, उड़ीसा और महाराष्ट्र का स्थान है। इन संगठनों का कुल बजट 23 करोड़ 26 लाख रुपये का है। इसके लिए इन्हें सरकारी व अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अनुदान पर निर्भर रहना पड़ता है।

ये संगठन 163 प्रोजेक्ट में काम कर रहे हैं और अब तक 738 प्रशिक्षण कार्यक्रम चला चुके हैं। इनमें 30318 प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षित किया गया। इनकी कोशिश 31,596 परिवारों के एक लाख सात हजार दो सौ छब्बीस बाल श्रमिकों तक पहुंचने की है। लगभग 52 प्रतिशत संगठन 500 बच्चों तक सीमित हैं। दो प्रतिशत संगठनों के काम के दायरे में एक हजार से पांच हजार बच्चे आते हैं। इस तरह इन संगठनों की पहुंच देश के कुल बाल श्रमिकों की एक प्रतिशत से भी कम आबादी तक है। इसके अलावा ध्यान ज्यादातर महानगरों तक ही केंद्रित है।

इस समस्या से लड़ने में गैर सरकारी संगठनों ने बहुत सराहनीय काम किया है जिनमें ‘कम्पेन अगेंस्ट चाइल्ड लेबर (सी. ए. सी. एल.) सही मायने में प्रशंसा की पात्र है। इसकी नींव 14 नवम्बर, 1992 को रखी गयी थी। यह प्रारंभ में तीन गैर सरकारी संगठनों का सम्मिलित स्वरूप था जिसमें ‘एक्शन फार द राइट्स ऑफ द चाइल्ड’, पूना, ‘यूथ फार यूनिटी एंड वोलेंटरी एक्शन’, मुंबई तथा ‘तेरे दे होमें’. इंटरनेशनल के नाम आते हैं। इसकी स्थापना के एक वर्ष बाद करीब तीन सौ समान सोच वाले अन्य संगठन कहीं न कहीं से इससे संबद्ध हो गए। सभी का उद्देश्य इन असहाय बच्चों का सही दिशा निर्देशन तथा इनके बिखरते जीवन को सही आकार देना है। क्राई (चाइल्ड रिलीफ एंड यू) तथा साउथ एशियन कोलेशन ऑन चाइल्ड सरवाइट्यूड’ (एस. ए. सी. सी. एस.) कुछ ऐसे ही संगठनों में से हैं। ये संगठन उन लाखों बच्चों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनके शोषण की इन्तहां हो गई हैं।

चूंकि समस्या काफी भीषण है, इसलिये इससे एकदम से निजात पाना कठिन है। जनसंख्या वृद्धि की समस्या भी बाल मजदूरी के लिये अच्छा खासा आधार बनाती है। गरीबी अलग से समस्या की आग के फैलाव में घी का काम कर रही है। अतः इसके कुछ वैकल्पिक उपायों की तरफ हमें ध्यान देना चाहिए। अब जरूरी है कि हम इसके व्यावसायिक पहलुओं पर भी विचार करें। हमें बाल मजदूरी को व्यावसायिक प्रशिक्षण की श्रेणी में शामिल करना चाहिए। इससे ये बच्चे अपनी युवा अवस्था को भी पहचानने में सफल होंगे।

अब बात आती है हमारी संवैधानिक जिम्मेदारियों की। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि हमारी न्यायिक प्रक्रिया अब इस मामले में थोड़ी सजग हुई है। अनुच्छेद 39 (सी) के अनुसार आर्थिक जरूरतों की वजह से बलपूर्वक किसी व्यक्ति को उसकी सामर्थ्य से परे के काम में धकेला नहीं जा सकता। इनका, प्रभाव अब शब्दों के रूप में ही जीवित है। सरकार को अपनी जिम्मेदारियों को भी बखूबी समझना होगा। अगर इस समस्या से मुक्ति पानी है तो इन अनुच्छेदों को प्रभावी ढंग से लागू करना पड़ेगा। सरकार को गुरूपदस्वामी समिति के सुझावों को भी ईमानदारी से लागू करना चाहिए, जो अभी भी फाइलों में ही दबे हैं। राष्ट्रीय बाल मजदूर कार्यक्रम के तहत 126 विशेष स्कूल खोलने की योजना है। इनको पहले नौ चुनिंदा जिलों में खोला जाएगा। इनमें करीब सात हजार बच्चों को जगह मिलने की उम्मीद है। यही एक सही और सराहनीय कदम है।

संघर्ष तो निश्चित रूप से कठिन है परन्तु इसे असम्भव भी तो नहीं मान सकते हैं। अगर हौंसले ही नहीं रहे तो फिर उम्मीद किस बात की कर सकते हैं? अतः सभी सरकारी और गैर सरकारी संगठनों को प्रभावी ढंग से अपने बढ़े हुए कदम और आगे बढ़ाने होंगे। समस्या केवल बाल मजदूरी की नहीं है, हमें उन लाखों-करोड़ों बचपनों को संवारना है जिनके भविष्य में इस देश का और संपूर्ण विश्व का विकास छिपा है। उम्मीद है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद बाल मजदूरी का यह भीषण रोग बहुत हद तक नियंत्रित हो जाएगा।

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