सूखा या अकाल पर निबंध Akal Akaal ek Samasya Essay in hindi

हेलो दोस्तों आज फिर मै आपके लिए लाया हु akal ek samasya essay in hindi पर पुरा आर्टिकल।आजकल हमारे किसान भाइयों के सामने सूखा या अकाल जैसे परेशानी आने लगी है जिससे वो ख़ुदकुशी जैसे कदम उठा लेते है इसलिए हमारे लिए ये जानना बहुत जरुरी है की सूखा या अकाल क्या होता है आइये पढ़ते है सूखा या अकाल पर निबंध

सूखा या अकाल पर निबंध

प्रस्तावना :

किसी भी वस्तु का अभाव ‘अकाल’ या ‘दुर्भिक्ष’ कहलाता है। सामान्यतया खाने-पीने की वस्तुओं का अभाव तथा पशुओं के लिए चारे-पानी के अभाव को ही ‘अकाल’ का नाम दिया जाता है। हमारा देश ऐसे अकाल का शिकार सदियों से होता आया है और आज भी इतने विकास के बावजूद अनेक प्रान्तों जैसे बिहार, बंगाल आदि में स्थिति बहुत भयावह है। आज भी लोग भूखे-नंगे हैं तथा सड़कों पर सोते हैं।

अकाल के मुख्य कारण :

अकाल मूल रूप से दो कारणों से उत्पन्न होता है-1. कृत्रिम, 2. प्राकृतिक। कृत्रिम अकाल पैदा करने के लिए मुख्य रूप से बड़े-बड़े उद्योगपति, उत्पादक तथा सरकार उत्तरदायी होती है। इस अकाल को पैदा करने के लिए स्वार्थी तथा मुनाफाखोर व्यापारी अपने माल । को गोदाम में छिपाकर रखते हैं। उनका उद्देश्य यह होता है कि देश में किसी भी वस्तु की कमी को दर्शा दिया जाए और फिर कीमतों को बढ़ाकर कालाबाजारी के आधार पर अधिक मुनाफे पर बेचा जाए। इस अकाल के समय हर इंसान को अनाज तथा खाने-पीने का वस्तुओं की तंगी का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार के अकाल को अपनी मर्जी से बड़े-बड़े उत्पादक समाप्त भी कर सकते हैं।

प्राकृतिक अकाल का मूल कारण वर्षा का कम होना या आवश्यकता से अधिक होने से बोया हुआ बीज अधिक पानी के कारण सड़-गल जाना है या खाने योग्य नहीं रह जाना है। इसी प्रकार सूखा पड़ने पर या वर्षा बहुत कम होने पर या बेमौसम बरसात होने पर भी फसल खराब हो जाती है। कम वर्षा में कुएँ, तालाब इत्यादि का पानी भी सूख जाता है तथा बाढ़ आने पर अनेक बीमारियाँ फैल जाती हैं जिसके कारण हर तरफ हाहाकार मच जाती है ऐसा अकाल प्राकृतिक प्रकोप होता है और ईश्वर की दया होने पर ही समाप्त हो पाता है।

ब्रिटिश काल का अकाल :

एक बार ब्रिटिश सरकार ने भी अपने शासनकाल में बंगाल में कृत्रिम अकाल पैदा कर दिया था जिसके कारण सब तरफ हाहाकार मच गया था। अनगिनत लोग भूखे-प्यासे तड़प-तड़पकर मर गए थे। ऐसे समय औरतों ने अपना शरीर बेचकर भूख मिटाई थी। ऐसे समय में चारे-पानी के अभाव में पशु भी बेमौत मारे गए थे। अंग्रेजों के इस कार्य से सारा देश उनके खिलाफ खड़ा हो गया था।

अकाल के बुरे परिणाम :

अकाल के केवल दुष्परिणाम ही होते हैं। इससे फायदा तो केवल पूंजीपतियों का ही होता है। इधर-उधर पड़ी लाशों को मांसाहारी पशु नोच-नोचकर खा जाते हैं। कुछ लोग भूखमरी से मर जाते हैं तो कुछ बिमारियों से, जबकि कुछ लोग तो अपनों की हत्याएँ करके स्वयं भी आत्महत्या कर लेते हैं। परिणामस्वरूप जगह-जगह लाशें सड़ने लगती हैं जिससे पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है और चारो ओर बीमारियाँ फैल जाती हैं।

akal ek samasya essay in hindi

जब क्षेत्र-विशेष में सामान्य से कम या बहुत कम वर्षा होती है तो उस क्षेत्र में अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। वैसे तो अकाल एक प्राकृतिक आपदा है परंतु इसके होने में मानवीय गतिविधियों का भी होता है। वन-विनाश और प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़-छाड़ का यह परिणाम है कि कहीं अकाल तो कहीं बाढ़ की परिस्थिति उत्पन्न होती रहती है। अकाल होने पर फ़सलें सूख जाती हैं तथा अन्न, फल, दूध तथा सब्जियों का अभाव हो जाता है। मनुष्यों तथा पशुओं के लिए पीने का साफ़ जल नहीं मिल पाता है। लोग भखमरी के शिकार बन जाते हैं। पशु चारे और पानी के अभाव । में मरने लगते हैं। क्षेत्र उजाड़-सा दिखाई देने लगता है। ऐसी विषम स्थिति में सरकार सहायता के लिए आगे आती है। अकालग्रस्त क्षेत्रों में भोजन की सामग्रियाँ, दवाइयाँ, जल, पशुओं का चारा आदि पहुँचाए जाते हैं। अकाल से निबटने में जन-सहयोग का भी बहुत महत्त्व होता है।

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दुर्भिक्ष या अकाल प्रायः अभाव की स्थिति को कहा जाता है। सामान्य रूप से मनुष्यों के लिए खाने-पीने की वस्तुओं का अभाव तथा पशुओं के लिए चारे-पानी | के अभाव को अकाल या दुर्भिक्ष कहा जाता है। दुर्भिक्ष के मूल रूप से दो कारण हुआ करते हैं एक बनावटी तथा दूसरा प्राकृतिक । बनावटी अकाल प्रायः सरकार, उत्पादकों व व्यापारियों द्वारा पैदा कर दिए जाते हैं, इसके अतिरिक्त जब अन्न, जल व चारे आदि का अभाव प्राकृतिक कारणों से होता है तो वह प्राकृतिक अकाल कहलाता है।

ब्रिटिश सरकार ने अपने शासन काल में एक बार बंगाल में बनावटी अकाल पैदा कर दिया था। उसने भारतीयों को सबक सिखाने के लिए भारतीय अनाज उत्पादकों और व्यापारियों को अपने साथ मिलाकर खाद्य पदार्थों का कृत्रिम अभाव पैदा कर दिया था जिसका परिणाम था कि बंगाल में हजारों लोग भूख से तड़प-तड़प कर मर गए थे। उस समय मुट्ठी भर अनाज के लिए माताओं ने अपनी सन्तान को तथा युवतियों ने अपने तन को सरेआम बेच दिया था।

उस समय चारे-पानी के अभाव में न जाने कितने पशु बेमौत मारे गए थे। बनावटी अकाल पैदा करने के लिए मुनाफाखोर व्यापारी अपने माल को गोदाम में छिपाकर कृत्रिम अभाव पैदा कर देते हैं। उनका उद्देश्य काले बाजार में माल को बेचकर अधिक मुनाफा कमाना होता है। यह बात दूसरी है कि इस प्रकार के अकाल के इतने भयंकर परिणाम न निकलते हो परन्तु सामान्य मनुष्य को तंगी का सामना तो करना ही पड़ता है।

दूसरा और सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है प्राकृतिक रूप से अकाल या दुर्भिक्ष का पड़ना; जैसे वर्षा का इतना अधिक समय-असमय होते रहना कि बोया हुआ बीज अधिक पानी के कारण सड़-गल जाए या पक्का अनाज बदरंग होकर खाने लायक न रह जाए। इसी प्रकार सूखा पड़ने अर्थात् वर्षा के बहुत कम होने या न होने से खेती नहीं हो पाती है तो भी मनुष्य व पशुओं के लिए अन्न व चारे तथा पानी की समस्या का उत्पन्न हो जाना भी दुर्भिक्ष कहलाता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य की प्यास बुझाने वाले स्रोत कुएँ आदि सूख जाते हैं। पशुओं की प्यास बुझाने वाले जोहड़-तालाब आदि सूख जाते हैं।

चारों ओर हा-हाकार मच जाता है। वर्षा का अभाव घास-पत्तों तक को सुखाकर धरती को नंगी और बेजर जैसी बना दिया करता है। धरती धूल बनकर उड़ने लगती है। यहाँ वहाँ मरे पशुओं व मनुष्यों की लाशों को मांसाहारी पशु नोचने लगते है। अशक्त हुए लोग अपने किसी सगे-सम्बन्धी का अन्तिम संस्कार कर पाने में समर्थ नहीं रह पाते है। परिणामतः उनको लाशें घरों में पड़ी सड़ने लगती है। इसके कारण हमारा पर्यावरण भी दूषित होने लगता है। ऐसी स्थिति में यदि सरकारी सहायता भी न मिले तो सोचो क्या हाल हो!

Akal ek samasya essay in hindi

दुर्भिक्ष या अकाल प्रायः अभाव की स्थिति को कहा जाता है। सामान्य रूप से मनुष्यों के लिए खाने-पीने की वस्तुओं का अभाव तथा पशुओं के लिए चारे-पानी के अभाव को अकाल या दुर्भिक्ष कहा जाता है। दुर्भिक्ष के मूल रूप से दो कारण हुआ करते हैं-एक बनावटी तथा दूसरा प्राकृतिक। बनावटी अकाल प्रायः उत्पादकों व व्यापारियों द्वारा पैदा कर दिए जाते हैं, इसके अतिरिक्त जब अन्न, जल व चारे आदि का अभाव प्राकृतिक कारणों से होता है तो वह प्राकृतिक अकाल कहलाता है।

ब्रिटिश सरकार ने अपने शासन काल में एक बार बंगाल में बनावटी अकाल पैदा कर दिया था। उसने भारतीयों को सबक सिखाने के लिए भारतीय अनाज उत्पादकों और व्यापारियों को अपने साथ मिलाकर खाद्य पदार्थों का कृत्रिम अभाव पैदा कर दिया था जिसको परिणाम था कि बंगाल में हजारों लोग भूख से तड़प-तड़प कर पर गए थे। उस समय मुट्ठीभर अनाज के लिए माताओं ने अपनी सन्तान को तथा युवतियों ने अपने तन को सरेआम बेच दिया था। उस समय चारे-पानी के अभाव में न जाने कितने पशु बेमौत मारे गए थे। बनावटी अकाल पैदा करने के लिए मुनाफाखोर व्यापारी अपने माल को गोदामों में छिपाकर कृत्रिम अभाव पैदा कर देते हैं।

उनका उद्देश्य काले बाजार में माल  को बेचकर अधिक मुनाफा कमाना होता है। यह बात दूसरी है कि इस प्रकार के अकाल के इतने भयंकर परिणाम न निकलते हों परन्तु सामान्य मनुष्य को तंगी का सामना तो करना ही पड़ता है।

दूसरा और सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है प्राकृतिक रूप से अकाल या दुर्भिक्ष का पड़ना; जैसे वर्षा का इतना अधिक समय-असमय होते रहना कि बोया हुआ बीज अधिक पानी के कारण सड़-गल जाय या पक्का अनाज बदरंग होकर खाने लायक न रह जाए। इसी प्रकार सूखा पड़ने अर्थात् वर्षा के बहुत कम होने या न होने से खेती नहीं हो पाती है तो । भी मनुष्य व पशुओं के लिए अन्न व चारे तथा पानी की समस्या का उत्पन्न हो जाना भी दुर्भिक्ष कहलाता है।

ऐसी स्थिति में मनुष्य की प्यास बुझाने वाले स्रोत कुएं आदि सूख जाते हैं। पशुओं की प्यास बुझाने वाले जोहड़-तालाब आदि सूख जाते हैं। चारों ओर हा-हाकार मच जाता है। वर्षा का अभाव घास-पत्तों तक को सुखाकर धरती को नंगी और बंजर जैसी बना दिया करता है। धरती धूल बनकर उड़ने लगती है। यहां-वहां मरे पशुओं व मनुष्यों। की लाशों को मांसाहारी पशु नोचने लगते हैं। अशक्त हुए लोग अपने किसी सगे- सम्बन्धी का अन्तिम संस्कार कर पाने में समर्थ नहीं रह पाते हैं। परिणामतः उनकी लाशें घरों में पड़ी सड़ने लगती हैं। इसके कारण हमारा पर्यावरण भी दूषित होने लगता है। ऐसी  स्थिति में यदि सरकारी सहायता भी न मिले तो सोचिए क्या हाल हो।

सूखा या अकाल पर निबंध

जनसाधारण की भाषा में कहें तो सूखा एक लंबी अवधि, एक ऋतु, एक वर्ष या कई वर्षों । तक किसी क्षेत्र विशेष में वर्षा कम होने या जल के अभाव में पैदा हुई अकाल की स्थिति। को कहा जाता है।

सूखे के तीन प्रकार होते हैं-मौसमी, जलीय एवं कृषि क्षेत्र में पड़ने वाला सूखा। किसी क्षेत्र विशेष में लंबे समय तक वर्षा की कमी मौसमी सूखे के अंतर्गत आती है। भारतीय संदर्भ की बात कहें तो दक्षिण-पश्चिमी मानसून मौसमी सूखे को निर्धारित करता है। यहाँ 19 प्रतिशत वर्षा सामान्य मानसून की श्रेणी में आता है, जबकि इससे कम या ज्यादा मानसून क्रमश: अत्यधिक वर्षा और असामान्य एवं अपर्याप्त वर्षा की श्रेणी में आता है। जलीय सूखा अर्थात् भू-जल स्तर में गिरावट (हाइड्रोलॉजिकल), नदी-नालों के सूखने की ओर इंगित करता है। जिसके कारण दैनिक एवं औद्योगिक उपयोग हेतु जल उपलब्ध नहीं हो पाता है। इसी प्रकार एग्रीकल्चरल यानि कृषि सूखा तब माना जाता है जब कम वर्षा या पानी के स्रोत सूख जाने के कारण मूल क्षेत्र में नमी बिल्कुल खत्म हो जाती है और ऐसी स्थिति में मिट्टी सूखकर भुरभुरी हो जाती है और खेतों में दरारें विकराल रूप ले लेती हैं। इसी कारण से कुपोषण, दरिद्रता, भुखमरी से वहाँ की आबादी मृत्यु का ग्रास बन जाती है।

यदि सूखे के कारणों पर विचार किया जाए, तो हम पाएंगे कि भारत विश्व का सातवां बड़ा देश है, जहाँ 3,28,782 वर्ग किमी के क्षेत्र में 100 करोड़ से अधिक की आबादी निवास करती है। भारत की लगभग 28 प्रतिशत आबादी शहरों में, तो लगभग 72 प्रतिशत आबादी गाँवों में निवास करती है। अनुमानित आधार पर यदि देखें, तो पाएंगे कि भारत की ग्रामीण आबादी लगभग 5,55,137 गाँवों में बसी हुई है, जिनमें से 2,31,000 गाँव आज समस्याग्रस्त गाँव घोषित कर दिए गए हैं। गौरतलब है कि इन समस्याग्रस्त गाँवों के चारों ओर लगभग 1.6 किलोमीटर तक सतही जल कहीं भी उपलब्ध नहीं है, और यदि कहीं है भी तो उसे उपयोग में नहीं लाया जा सकता है।

जल का कोई निश्चित एवं स्थायी स्रोत न होने के कारण आज भी अधिकांश खेती वर्षा पर ही निर्भर है, किंतु इसे भी विडंबना ही कहेंगे कि भारत में कहीं भी समान रूप में वर्षा नहीं होती और इसी असमानता के कारण भारत लगातार बाढ़ और। सखे की समस्या को झेल रहा है। भारत में सूखे के कारकों पर यदि विचार करें तो हम पाएंगे। कि सचित जल प्रबंधन की नीति का अभाव, जनसांख्यिकीय विन्यास, कम वर्षा, उद्योगों। द्वारा जल का भारी मात्रा में उपयोग करना और अंधाधुध वनों की कटाई इसके प्रमुख कारकों सूखे के कारणों पर विचार करने के बाद यदि हम सूखे से पड़ने वाले दुष्प्रभावों के विषय । में बात करें तो पाएंगे कि सूखा पानी का अभाव करके भावी फसल को बर्बाद कर देता है। फसल की बर्बादी भोजन एवं अन्य खाद्य पदार्थों की कमी पैदा करती है, जिससे कुपोषण पैदा होता है। इसके अलावा पानी का अभाव सफाई-व्यवस्था को कमजोर बना देता है। जिससे महामारियों के फैलने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

इसके अलावा, पानी की कमी सूखा-पीड़ित राज्य के पशुधन का भी सर्वनाश कर देती है। खेती के क्षेत्र में ऐसी स्थिति बेरोजगारी की स्थिति पैदा करती है और बेरोजगारी से अन्य सामाजिक समस्याओं का जन्म। होता है। सूखे का एक अन्य महत्वपूर्ण दुष्प्रभाव उन क्षेत्रों पर पड़ता है, जिनमें सूखा-पीड़ित राज्यों की जनसंख्या पलायन कर जाती है। इससे दूसरे क्षेत्रों पर भारी दबाव पड़ता है और नई-नई चीजों और बुनियादी सुविधाओं की मांग बढ़ती चली जाती है। ऐसे सूखों की भरपाई करना अत्यंत कठिन कार्य होता है और ऐसे सूखों का प्रभाव कई वर्षों तक बना रहता है।

हालांकि सूखे की भविष्यवाणी करने में विज्ञान ने काफी प्रगति कर ली है। साथ ही कंम्प्यूटर एवं उपग्रह के पदार्पण ने भविष्यवाणी को और अधिक आसान बना दिया है, लेकिन इसके बावजूद सरकार अपने कार्यों और नीतियों को व्यवहार के धरातल पर उतारने में असफल । रहती है। बहरहाल, अनुसंधानकर्ताओं ने सूखे की स्थिति पर काबू पाने के लिए छह महत्वपूर्ण उपायों की ओर इंगित किया है। इस दिशा में पहल करते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि ।

कौन-कौन सी ऐसी फसलें हैं, जो कम से कम समय में उगाई जा सकती हैं और जिनसे । स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है। दूसरा, सभी अकाल पीडित क्षेत्रों में ऐसे । जलाशयों का निर्माण करना चाहिए, जो मानसून के जल का संचय कर सकें। तीसरा, कृषि तथा सिंचाई के लिए आधुनिक, उन्नत और वैज्ञानिक तौर तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए। इन उपायों को अपनाकर सूखे की समस्या से कुछ हद तक छुटकारा पाया जा सकता है।

सूखा या अकाल पर निबंध

जब किसी क्षेत्र में अधिक वर्षा या एकदम सूखा पड़ने के कारण फसल बर्बाद हो जाती है। अथवा सूख जाती है, तब वहाँ रहने वाले सभी प्राणियों और यहाँ तक कि पेड़-पौधों और -वनस्पतियों तक के लिए जीवन के सहायक तत्वों का अभाव हो जाता है। यह स्थिति इतनी भयंकर होती है कि इस अभाव को दूर करने के सभी प्रयास कम अथवा व्यर्थ सिद्ध हो जाते हैं। अभाव की यह स्थिति ही दुर्भिक्ष या अकाल कहलाती है। अन्य शब्दों में कहें तो मनुष्यों, पशुओं आदि के लिए अन्न, चारे और पानी के नितांत अभाव को ही दुर्भिक्ष या अकाल कहा जाता है।

 

दुर्भिक्ष के कारण क्या और कौन-से हो सकते हैं, उन में से कुछ का उल्लेख सांकेतिक रूप से ऊपर किया जा चुका है। उदाहरणस्वरूप, जब अत्यधिक या आवश्यकता से अधिक वर्षा किसौ क्षेत्र में इस सीमा तक हो कि या तो फसलें बह जाएं अथवा खेतों में पानी भर जाने  के कारण सड़-गल कर बेकार हो जाएं, तब अन्न और चारे का पूरी तरह अभाव हो जाता | है और अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसी प्रकार, कई बार क्षेत्र में लंबे समय तक वर्षा नहीं होती और कुछ भी पैदा नहीं हो पाता।

अकाल, चारे और पानी के अभाव की यह स्थति जब भयंकर रूप धारण कर लेती है, तो इसे अकाल की संज्ञा दे दी जाती है। कई पार इन प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ मानव की भूख और तृष्णाएँ भी अकाल की स्थितियाँ उत्पन्न कर देती हैं।

अक्सर देखा जाता है कि स्वार्थी और मुनाफाखोर व्यापारी मानव की मूलभूत आवश्यकताओं और संवेदनाओं की परवाह न करते हुए अपने पास अनाजों तथा अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की जमाखोरी कर लेते हैं। इस प्रकार की जमाखोरी और कालाबाजारी के चलते आम और अभावग्रस्त व्यक्ति आवश्यक उपभोक्ता वस्तुएँ खरीद नहीं पाता। फलस्वरूप वह स्वयं, उसका परिवार आश्रित पशु तक भूखों मरने लगते हैं।

ऐसा माना.  जाता है कि स्वतंत्रता से पहले बंगाल में जो अकाल पड़ा था, वह विदेशी शासन की नीतियों और स्वार्थी व्यापारियों की मिलीभगत का ही परिणाम था।

सी प्रकार, उत्तर प्रदेश को भी कुछ वर्ष पहले अकाल के बहुत ही भयंकर दौर से गुजरना। पड़ा था। इस क्षेत्र में सिंचाई के लिए नहरों, नलकूपों आदि का सर्वथा अभाव है। खेतों में थोड़ी-बहुत जो भी पैदावार होती है, वह पूरी तरह प्रकृति की कृपा, अर्थात् वर्षा पर आश्रित । है। उत्तर प्रदेश में लगभग पिछले कई वर्षों से नाममात्र की भी वर्षा नहीं हो रही थी, जबकि उससे मात्र पच्चीस-तीस मील दूर स्थित क्षेत्रों में भरपूर वर्षा हो रही थी।

अत: लगभग दो साल तक वहाँ की सहायता से किसी प्रकार काम चलता रहा। लोग जैसे-तैसे अपना और अपने पशुओं का निर्वाह करते रहे। परंतु इसी दौरान एक-एक कर पानी के सभी जोहड़ और – तालाब सूखते और पपडियाते जा रहे थे। यहाँ तक कि कुओं का पानी भी तल चाटने लगा। इसके विपरीत तीस-पैंतीस मील दूर के इलाकों में इतनी अधिक वर्षा हो रही थी कि वहाँ बाढ़ की-सी स्थिति उत्पन्न होने लगी थी। रास्ते टूट-टूटकर पानी से भरते गए। पानी भी इतना कि महीनों तक उसके सूखने की संभावना नहीं थी। यह बड़ी ही विषम परिस्थिति थी।

एक तरफ सूखे के कारण अन्न, जल और चारे का पूर्ण अभाव था, तो दूसरी ओर इतनी वर्षा कि उसके कारण किसी भी प्रकार की सहायता का पहुँचना भी असंभव। ऐसे हालात में अकाल पीड़ित क्षेत्र के समर्थ किंतु स्वार्थी लोगों ने मुनाफा कमाने की नीयत से, तो कुछ समर्थ लोगों ने अपने परिवारों की चिंता से सभी प्रकार की आवश्यक वस्तुएँ तथा खाद्य पदार्थ । आदि दबा लिए। इसका परिणाम भयंकर अकाल के रूप में हुआ।

बड़ा ही वीभत्स दृश्य था। मनुष्यों की हालत भी पूरी तरह खस्ता और पतली होती जा रही थी। सभी परिवार अपने अपने घर छोड़कर दूसरे क्षेत्रों की ओर जाने लगे। भूख-प्यास से निढाल बच्चे-बूढ़े राह में ही गिर गिर पड़ते थे। विवश परिवारजनों की आँखें हर समय आँसुओं से भरी रहती थी। विवश होकर कई स्त्रियों द्वारा अपना शरीर बेचने की बात भी सुनी । गई। कई महिलाओं ने मजबूर होकर अपने नन्हें बच्चों को भी बेच डाला। वास्तव में अकाल से उत्पन्न दशा का वर्णन शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं है।

अकाल की परिस्थितियों में लोगों को अपना धन-संपत्ति ही नहीं, बल्कि अपने प्रियजन भी गँवाने पड़ते हैं और शायद वे अपने दर्द को जीवन भर नहीं भुला पाते। अकाल के भयंकर  परिणामों के दृष्टिगत हमें ईश्वर से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि अकाल का प्रकोप किसी क्षेत्र पर न पड़े।

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