Essay on Self Confidence in Hindi आत्मविश्वास का महत्व

हेलो दोस्तों आज फिर मै आपके लिए लाया हु Essay on Self Confidence जिससे हम हिंदी में आत्मविश्वास का महत्व कहते है। आत्मविश्वास का बहुत महत्व होता है चाहे वो कोई भी काम हो। अगर आप किसी काम को पुरे आत्मविश्वास के साथ करते है तो वो काम बहुत अच्छे से होता है।
आईये जानते है Self Confidence के बारे में और भी बहुत से चीज़े।

आज हम आपको Essay on Self Confidence in Hindi आत्मविश्वास का महत्व के बारे में बताएँगे तो अगर आप अपने बच्चे के लिए आत्मविश्वास का महत्व पर निबंध ढूंढ रहे है तो यह आपके बच्चे के होमवर्क में बहुत मदद करेगा।

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मुर्दा वह नहीं जो मर गया, मुर्दा वह है जिसका आत्मविश्वास मर गया है।” किसी महान व्यक्ति द्वारा कही यह बात अक्षरक्षः सत्य है। आत्मविश्वास मानव चरित्र का वह गुण है, जिसके द्वारा उसके व्यक्तित्व में निखार आता है, उसकी कार्यक्षमता बढ़ती है तथा वह हर एक कार्य को कुशलतापूर्वक कर पाता है।

लेकिन यह गुण हर व्यक्ति में नहीं होता। यह गुण तो मनुष्य को घर-परिवार तथा सामाजिक संस्कारों से मिलता है तथा शिक्षण अभ्यास द्वारा इसमें निखार आता है।

जो व्यक्ति आत्मविश्वास का अलख जगाकर जीवन के मार्ग पर आगे बढ़ता है, उसके समक्ष आपदाओं के पर्वत स्वयं ढह जाते हैं।

मंजिल उसके एकदम करीब आ जाती है और वह उन्नति के शिखर पर पहुँच जाता है। आत्मविश्वास से भरा व्यक्ति कठिन से कठिन परिस्थितियों का मुकाबला भी हँसते हुए करता है। उसे पता होता है कि उसे अपने लक्ष्य में कामयाबी अवश्य मिलेगी, इसलिए वह पराजय के भय से विचलित नहीं होता। आत्मविश्वास के अंकुर से प्रयत्न का पौधा उगता है, तथा प्रयत्न के लहलहाते पौधे पर ही सफलता के मधुर फल लगते हैं।  इसलिए हमें अपने भीतर आत्मविश्वास जगाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए।

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आत्मविश्वास का ज्ञान होते ही मनुष्य में दुगुना बल अर जाता है। हनुमान् जब अपने साथियों के साथ सीता की खोज में निकले तो पहाड़, जंगल, मैदान छान मारे; परन्तु सीता का पता न लगा। आगे समुद्र आ गया। सब थककर चूर हो चुके थे । वहीं धम्म से बैठ गये। वे सोचने लगे कि अब क्या करें ? ।

उस समय जाम्बवान् ने ललकारा। उसने हनुमान् के आत्मविश्वास को जगाया। आत्मविश्वास का बोध होते ही हनुमान् की शक्ति के सामने समुद्र की शक्ति तुच्छ हो गई। अपनी बाँहों के बल पर हनुमान् समुद्र को तैरकर लंका में जा पहुँचे ।

आत्मविश्वासी चाहे लकड़हारा हो या लुहार, किसान हो या गड़रिया, वैज्ञानिक हो या नाविक—वह भरोसे का आदमी होता है। वह इज्जत के लायक आदमी होता है। वह आत्म- विश्वासी दृढ़ मनुष्य होता है । वह फौलाद का बना हुआ होता है ।

ऐसा मनुष्य अपनी पत्नी तथा बच्चों के लिए आवश्यकता पड़ने पर अपना सारा धन लुटा सकता है। अपने पड़ोसियों के लिए वह जी खोलकर खर्च कर सकता है। अपने देश और देश- वासियों के लिए वह सारे जीवन की कमाई कुर्बान कर सकता

आत्मविश्वासी विद्यार्थी को अपनी सफलता पर अटूट विश्वास होता है। वह कमजोर विद्यार्थी की उदारता से सहायता करता है। आत्मविश्वासी मजदूर नौसिखिये को काम का ढंग सिखाकर अपना मित्र बना लेता है। आत्मविश्वासी कारीगर बहुत से नये कुशल कारीगर तैयार कर देता है

आत्मविश्वास के बल पर एक व्यापारी थोड़ी पूंजो से व्यापार चलाकर बड़े से बड़ा उद्योग खड़ा करने में सफल हो जाता है। वह आत्मविश्वास के ही बल पर अनगिनत लोगों के लिए जीविका के साधन पैदा कर देता है। जीविका यानी रोजगार देने से बढ़कर सहायता दूसरी नहीं हो सकती।

आत्मविश्वास से अपनी सहायता आप करने की हिम्मत पैदा होती है। आत्मविश्वास के बल पर मनुष्य कठोर-से-कठोर धरती पर भी हल चला लेता है। आत्मविश्वासी कहता है-  ‘मुझे कठिन काम दीजिए। मैं उसे करूंगा।’

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अकर्मण्य व्यक्ति केवल भगवान् का नाम लेने में ही अपने जीवन की इतिश्री समझते हैं, जो पूर्णतया गलत है। यदि भाग्य के सहारे बैठे रहेंगे और परिश्रम से मुँह मोड़ लेंगे तो हम | जीवन में कदापि सफलता प्राप्त नहीं कर पाएँगे। विनोबाजी के अनुसार, “भाग्य और परिश्रम दोनों ही मनुष्य के भीतर हैं, बाहर कुछ नहीं।” इस विचार के अनुसार परिश्रम करनेवाले का ही भाग्य बन सकता है।

परिश्रमहीन व्यक्ति भाग्यहीन व्यक्ति होता है। कुछ लोग यह समझते हैं कि ‘वही होगा जो मंजूरे खुदा होगा’। और अकर्मण्य बन जाते हैं। ऐसे लोग भाग्यवाद में विश्वास करते हैं और प्रयत्न से कोसों दूर रह जाते हैं।

केवल आलसी लोग ही हमेशा ‘दैव-दैव’ करते रहते हैं, और कर्मशील लोग ‘दैव-दैव  आलसी पुकारा’ कहकर उनका उपहास करते हैं।
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता पुरुषार्थ से ही पाई जा सकती है। अकर्मण्य व्यक्ति  देश, जाति, समाज और परिवार के लिए एक कलंक है। ऐसे व्यक्ति समाज पर एक भार बन जाते हैं।
जो व्यक्ति दूसरों का मुँह ताकता रहता है, वह पराधीन है-दास है। स्वावलंबी व्यक्ति अपने भरोसे बड़े-से-बड़ा काम कर गुजरता है।

विश्व का इतिहास ऐसे ही स्वावलंबी पुरुषों की जीवनगाथा है, जिन्होंने कर्म में निरंतर  तत्पर रहकर जीवन में महान् सफलताओं को प्राप्त किया। सिकंदर महान् विजय का स्वप्न लेकर यूनान से बाहर निकला और कई देशों को जीतता गया। यह क्या था? पुरुषार्थ, मेहनत, प्रयत्न और प्रयास। यदि वह भी अकर्मण्य लोगों की तरह हाथ-पर-हाथ रखकर बैठ जाता तो सिकंदर महान् कैसे कहलाता ? हम सबने रॉबर्ट ब्रूस का नाम सुन रखा है।

वह छः बार  शत्रु से युद्ध में हार चुका था। पराजित बूस एक पर्वतीय गुफा में छिपा बैठा था। वह निराश  हो गया था। इतने में उसने क्या देखा कि एक मकड़ी अपना जाल बुन रही है। वह मकड़ी  कई बार नीचे गिरी, मकड़ी ने साहस नहीं छोड़ा-‘दैव-दैव’ न पुकारा। अपने पुरुषार्थ का  सहारा लिया और अंत में सफल हो गई।

मकड़ी के जीवन की एक यह छोटी-सी घटना रॉबर्ट के जीवन की एक महान् घटना बन गई। उन्होंने फिर एक बार पुरुषार्थ का सहारा लिया और शत्रु को परास्त कर दिया।

जो पुरुष उद्यमी होते हैं, स्वावलंबी होते हैं, वे शेर के समान होते हैं। लक्ष्मी उन्हीं का साथ देती है। जो भाग्य में होगा मिल जाएगा’-यह तो डरपोक लोग मानते हैं। जो परिश्रम करेगा उसका ही भाग्य बनेगा।

महान् व्यक्ति स्वावलंबन के बल पर ही उन कठिन कार्यों को पूरा कर दिखाते हैं, जो अन्य लोगों को कठिन और असाध्य दिखाई देते हैं। लाला लाजपत राय, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री और श्रीमती इंदिरा गांधी के जीवन पराक्रम की गाथाओं से भरे पड़े हैं। नेहरूजी का नारा था ‘आराम हराम है ‘ इसी तथ्य की प्रेरणा देता है।

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आत्मविश्वास का महत्व

बात उस समय की है, जब भारत स्वतंत्र नहीं हुआ था। एक बालक था। उसके अंदर देश-भक्ति कूट-कूटकर भरी थी। वह उन लोगों की बराबर मदद करता था, जो आजादी के दीवाने थे और गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए जी-जान से जुटे थे।

उसकी मां ने अपने बेटे को देश-भक्ति के रंग में रंगे देखा तो उसे बड़ी खुशी हुई, साथ ही उसके मन में यह डर भी हुआ कि कहीं वह पुलिस के हाथ में पड़ जाने पर घबरा न जाए और उन लोगों के नाम-पते न बता दे, जो छिपकर काम कर रहे थे। एक दिन मां ने लड़के को अपना डर बताया तो उसने बड़ी दृढ़ता से कहा-“मां, तुम बेफिक्र रहो। मैं घबराऊंगा नहीं।”

बालक फिर भी बालक था। मां को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ, बोली-“मैं तेरा इम्तहान लूंगी।” इसके बाद मां ने एक दीया जलाया और कहा-“इस पर अपनी उंगली रख दे।” लड़का एक क्षण भी नहीं झिझका। उसने फौरन अपनी उंगली बत्ती की लौ के ऊपर कर दी। उंगली जलती रही, पर उस लड़के के मुंह से उफू तक नहीं निकली।

वह बराबर मुस्कराता रहा। बालक का हौसला देखकर मां का जी भर आया। उसने उसे सीने से लगा लिया और दिल खोलकर आशीर्वाद दिया। लड़का अपने काम में दूने उत्साह से जुट गया।

यही लड़का अशफाकुल्ला आगे चलकर भारत का महान क्रांतिकारी बना। हंसते हुए वह गाता था- ‘हे मातृभूमिकि, तेरी सेवा किया करूंगा। फांसी मिले मुझे या हो जन्म-कैद मेरी बंशी बजा-बजाकर तेरा भजन करूंगा।’ जब काकोरी षड्यंत्र के अपराध में अशफाकुल्ला को फांसी की सजा मिली और उसके गले में रस्सी का फंदा डाला गया, तब वे ऐसे प्रसन्न थे मानो उनके जीवन की सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई हो। |

 

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