सुबह की सैर पर निबंध – Essay on Morning Walk in Hindi प्रातः काल का भ्रमण

हेलो दोस्तों आज फिर में आपके लिए लाया हु Essay on Morning Walk in Hindi पर पुरा आर्टिकल लेकर आया हु। सुबह की सैर बहुत ही जरुरी होती है क्योकि आजकल बहुत ही तरह की बीमारियाँ फैल रही है जिनका मुकाबला सिर्फ और सिर्फ सुबह की सैर करके बचा जा सकता है। सुबह की सैर बहुत ही जरुरी है और इसके करने से आप बहुत से बीमारियों से दूर रह सकते है। 

आज हम आपके लिए लाये है बहुत सारे Essay on Morning Walk in Hindi में जो आपको अच्छा निबंध लिखने में बहुत मदद करंगे।

सुबह की सैर पर निबंध – Essay on Morning Walk in Hindi No 1

जीवन को सुखमय बनाने के लिये मन को प्रसन्न रखना परम आवश्यक है। मन उसी मनुष्य का प्रसन्न रहता है, जिसका स्वास्थ्य सुन्दर हो। स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिये जितना पौष्टिक पदार्थ आवश्यक है उतना ही शारीरिक श्रम भी। श्रम से मनुष्य की शक्ति और स्वास्थ्य दोनों ही बढ़ते हैं। शारीरिक श्रम की बहुत-सी क्रियायें हैं। कोई व्यायाम करता है तो कोई प्राणायाम, कोई दौड़ लगाता है तो कोई मुग्दर घुमाता है कोई यौगिक क्रियाओं में शीर्षासन ही करता है। जिसकी जिधर रुचि होती है, उसको उसी में अधिक आनन्द आता है। प्रात:कालीन भ्रमण भी शरीर को स्वस्थ और निरोग रखने के शारीरिक श्रमों में से एक है।

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प्रातकाल के भ्रमण से मनुष्यों को विभिन्न ऋतुओं की सुगन्धित वायु प्राप्त होती हैजिससे मनुष्य में एक नवस्फूर्ति और नवजीवन का संचार होता है। ऊषा की लालिमा मानव हृदय को रोग-रहित कर देती है। प्रातकाल का भ्रमण मनुष्य को बड़ा ही आनन्द देता है।

प्रातकाल के भ्रमण से मानव को विशेष आनन्द की प्राप्ति होती है। प्रकृति के मनोरम दृश्यों को देखकर वह फूला नहीं समाता। उसका हृदय कमल विकसित हो जाता है। प्रातकाल परिभ्रमण करने से हमारी शारीरिक शक्ति के साथ-साथ मानसिक शक्ति का भी विकास होता है। हमारे मन से विकार दूर हो जाते हैं। प्रातकाल मन प्रसन्न होने से मनुष्य का संध्या तक का समय बड़ी प्रसन्नता से व्यतीत होता है। सुबह की ठण्डी वायु सेवन करने से मनुष्य के मुख पर तेज आता है। उसकी पाचन शक्ति बढ़ जाती है। वृद्धावस्था में परिभ्रमण करना तो संजीवनी औषधि और अमृत का काम करता है।

प्रात:काल में वायु जब-जब हमारे नासिका और श्वासोच्छवास की क्रियाओं से शरीर में प्रवेश करती है, तो हमारा रक्त शुद्ध होता है, फेफड़ों की बल मिलता है, हमारा शरीर निरोग रहता है, वह अजीर्णता का शिकार नहीं बन पाता। मानव का बौद्धिक बल भी बढ़ता है। उसकी प्रज्ञा तीव्र और संकल्प दृढ़ होते हैं। वह उद्योगी और अव्यवसायी बन जाता है। उसमें अच्छे भावों की वृद्धि होती है, नंगे पैर हरीभरी घास पर घूमने से मनुष्य के मस्तिष्क सम्बन्धी विकार दूर हो जाते हैं।

भाषा : गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी एवं ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। भाषा शुद्ध परिष्कृतपरमार्जित एवं साहित्यिक है। तुलसी ने भाषा प्रयोग में संस्कृत के तत्सम एवं तद्भव शब्द का अधिक प्रयोग किया है। कहीं-कहीं तो उन्होंने संस्कृति के विभक्ति रूपों एवं क्रिया रूपों को भी अपनाया है।

रामचरितमानस के प्रत्येक काण्ड के प्रारम्भ में संस्कृत श्लोकों का प्रयोग कर यह सिद्ध कर दिया है कि उन्हें संस्कृत का अच्छा ज्ञान था। तुलसी मूलत: भक्त है कवि नहीं। उनके भाव काव्यमय बन गये हैं। रामचरित्र वर्णन करने के लिये काव्य सृजन किया है। उन्होंने अलंकारों का प्रयोग जान-बूझकर नहीं किया है किन्तु अर्थ की सफल अभिव्यक्ति के लिए भावों के सौन्दर्य की अग्नि वृद्धि के लिये रूप चित्रण प्रस्तुत करने के लिए अलंकारों का प्रयोग स्वत: हो गया है।

गोस्वामी तुलसीदास जी के काव्य में चौपाईदोहा, सोरम पदजैतश्री विलावली के द्वारा तोद्री सारंग, सूददी मतहार, चंचरीभैरव बसन्त और रामकली आदि विभिन्न छन्दों और रागों का प्रयोग किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने सर्वव्यापक निरंजन भक्ति प्रेम से ही वशीभूत होने वाले दशरथ नन्दन राम को अपना आराध्य माना है। राम को घनश्याम मानकर अपने को चातक सदृश समर्पित कर दिया।

एक भरोसो, एक दल, एक आस विश्वास
एक राम घनश्याम हितचातक तुलसीदास।

उन्होंने राम के प्रति ही अपनी भक्ति प्रदर्शित की है।

जौ जगदीश तौ अति भल्ये जौ महीस तौ भाग।
तुलसी चाहत जनम भरि रामचरन अनुराग।

वे दास्य जीवन की भक्ति को ही भवसागर से तरने के लिए आवश्यक मानते हैं। उनका दृष्टिकोण है। सेवक सेवा भाव बिनु भवन तरि उरगार दास्य भक्ति में इष्ट देव महत्ता की, उदारता, दयालुता भक्त शरणागत वत्सलता दीनताहीनता आदि का विशेष स्थान रहता है। तुलसी की भक्ति राममय है। गोस्वामी तुलसीदास ने विभिन्न दर्शनों का अध्ययन कर अपना भक्ति दर्शन प्रविष्ठित किया। गोस्वामी जी ने वैदिक संहिताओंउपनिषदों आगम ग्रन्थों, पुराण तथा अन्य अनेक शास्त्रों का अनुशीलन कर अपनी भक्ति का निर्धारण किया। तुलसी का दर्शन एक है वह है भक्ति दर्शन। तुलसी की दार्शनिक भावना वस्तुत: समन्वयात्मक ही है।

तुलसी के दर्शन को ब्रहम माया, जीव जगत मोक्ष एवं साधना सम्बन्धी विचारों का अनुशीलन करना आवश्यक है। तुलसी ने जीव, जगत और ब्रह्मा का जैसा सामंजस्य बैठाया है, वैसा अन्य दार्शनिकों में देखने को नहीं मिलता है। ईश्वर को अंश, जीव, अविनाशी मानकर जीव को महत्व प्रदान किया है। जड़ और चेतन का संबंध स्थापित करने में तुलसी पूर्ण सफल हुए हैं जगत का सृष्टिकर्ता स्वयं भगवान है। अततुलसीवाद से हटकर समन्यवादी विचारधारा के पोषक हैं।

गोस्वामी तुलसीदाजी ने मनुष्य को अपने को पहचानने पर जोर दिया है। इसके लिए हरि भक्ति पथ का निरूपण किया। भारतीय साधना से ज्ञान, कर्म और उपासना को समान महत्व दिया गया है। इन तीनों को अपने जीवन में उतार कर मनुष्य अपने जीवन को सफल बना सकता है। ज्ञान, कर्म और उपासना तीनों ही एक दूसरे सम्बद्ध है। व्यक्ति के स्वरूप का चरित्र उत्तम होना बहुत आवश्यक है। इससे व्यक्ति को आन्तरिक शक्ति मिलती है।

 

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी साहित्य के प्रमुख कवि हैं। उन जैसा कोई कवि न हुआ है न होगा। रामकाव्य के तो वे एकदम सम्राट थे। जैसा भाव सौन्दर्यगांभीर्य, भाषा शैली का उत्कर्ष दिखाई देता है, वैसा उनके काव्यों में नहीं। तुलसी लोक दृष्टा जागरूक विचारक और सामाजिक मनोविज्ञान के सच्चे पारखी थे। लोकहित जितना वर्णन उनके काव्य में मिलता है, उतना अन्य में कहाँ। उनकी दृष्टि में लोक मर्यादा के बिना जन कल्याण सम्भव नहीं।

आज समाज में तुलसी के साहित्य की आवश्यकता है। यही कारण है कि ‘रामचरितमानस’ का महत्व सर्वत्र दिखाई देता है। भारत में ही नहीं विदेशों में भी तुलसी के महत्व को प्रदर्शित कर रहे हैं। उन्हें सदैव स्मरण किया जाता रहेगा।

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प्रातः काल का भ्रमण पर निबंध – Essay on Morning Walk in Hindi no 2

 

सवेरे उठकर उन्मुक्त पवन में भ्रमण करना जीवन के लिए बहुत लाभकारी है। अंग्रेजी में एक कहावत है कि जल्दी सोने और जल्दी उठने से मनुष्य स्वस्थ तथा बुद्धिमान बनता है। वेदों, शास्त्रों तथा ग्रंथ साहिब में भी प्रात: उठना आवश्यक बतलाया गया है। प्रात:काल उषा काल ब्राह्ममुहूर्त बड़ा वेला आदि इस समय के नाम ही इसकी महिमा बतला रहे हैं। इस समय सतोगुण की प्रधानता होती है । चित्त शांत होता है। इस समय प्रकृति दोनों हाथों से स्वास्थ्य तथा सौंदर्य लुटाती है।

जिसे लूटना हो उसे प्रात: भ्रमण अवश्य करना चाहिए। प्रात:काल , सूर्योदय से पूर्व शय्या त्यागकर खुली हवा में भ्रमण करने से शरीर का अंग अंग खुलता है। इस समय उपवनवनखेत या नदी तट की सैर मन को अपार आनंद प्रदान करती है।

प्रातकाल सूर्य की सुनहरी किरणें मानो स्वर्गीय संदेश लेकर धरती पर आती हैं। उनसे समस्त सृष्टि में नई चेतना का संचार होता है। इस समय वन-उपवन में पुष्प विकसित होते हैं, तड़ागों में कमल मुसकराते हैं, पेड़ों पर पक्षी चहचहाते हैं। धीमी-धीमी, शीतल सुगंधमय पवन के झोंके हृदय में हिलोर उठाते हैं।

पूर्व दिशा में लाली छा जाती है । कौंसदूब और पत्तों पर ओस की बूंदें मोतियों की तरह झलकती हैं। ऐसे दृश्य को देखकर मनुष्य के मन में कोमल भावनाओं तथा सरस कल्पनाओं की लहरें उठने लगती हैं।

प्रात:काल पेड़ों, पौधों, बेलों से ऑक्सीजन छूटती है। यह गैस हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है-यह प्राणवायु है। इससे हमारे फेफड़े बलवान बनते हैं, हमारे अंदर की गंदी हवा बाहर निकलती है, शुद्ध हवा फेफड़ों में प्रवेश करके हृदय से आए दूषित रक्त को शुद्ध कर देती है। प्रात:काल प्रकृति की अद्भुत शोभा को देखकर ईश्वर का स्मरण हो आता है ।

उस अनंत शक्ति के सम्मुख हमारा मस्तक स्वयं नत हो जाता है। इससे हमारा हृदय पवित्र होता है, उसमें बुरी भावनाओं का प्रवेश नहीं होता। प्रात: भ्रमण से मस्तिष्क (दिमाग) तरोताजा हो जाता है। और सारा दिन अंगों में स्फूर्ति भरी रहती है। हमारे ऋषि-मुनि प्रात: भ्रमण के कारण ही दीर्घायु हुआ करते थे। अत: हमें प्रतिदिन प्रात: भ्रमण करना चाहिए।

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प्रातः काल का भ्रमण पर निबंध – Essay on Morning Walk in Hindi No 2

 

सुबह की सैर अत्यंत आनंददायक कृत्य है। यह कार्यारंभ का सर्वश्रेष्ठ आयोजन है। यह प्रकृति से साक्षात्कार का एक सुंदर तरीका है। यह दिन भर तरोताजा रहने के लिए किया जाने वाला उत्तम उपाय है। यह स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत अच्छा कार्य है। यह लोगों को चुस्त और तंदुरुस्त रखता है।

सुबह हवा में ताजगी होती है। प्रकृति नई गड़ाई लेती प्रतीत होती है। संसार रात भर के विश्राम के बाद नई ताजगी और उमंग से युक्त होता है। प्रातकालीन किरणों में अद्भुत ऊर्जा होती है। बागों में कलियाँ खिलकर फूल का रूप धारण कर लेती हैं।

घास पर ओस के ठंडे कण दिखाई देते हैं। प्रकृति के अनुपम रूप की शोभा देखते ही बनती है। हज़ारों लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए निकल पड़ते हैं। किसान अपने खेतों की मेड़ों पर चहलकदमी करते हैं। कुछ लोग तालाब या बाग-बगीचे का चक्कर लगाते हैं। शहरों में भी अनेक पार्क हैं। यहाँ बच्चे, युवा और वृद्ध एक साथ सैर का आनंद उठाते हैं।

पर आलसी लोगों की बात अलग है। उन्हें सूर्योदय के समय जगने की आदत नहीं है। वे रात में देर से सोते हैं और आठ नौ बजे तक ही उठ पाते हैं। उन्हें प्रातकाल की सैर के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं। जब उन्हें तरह-तरह की बीमारियाँ घेर लेती हैं, जब उन्हें मानसिक तनाव और परेशानियों का सामना करना पड़ता है, तब उनकी नींद टूटती है। लेकिन जब जागो तभी सवेरा..अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा इसलिए सुबह उठो, मुंह-हाथ धो और सैर पर निकल पड़ो। जरा सा चले नहीं कि आलस्य मिटा। थोड़ी ही देर में शरीर स्फूर्तिवान हो उठा।

कुछ रहस्य है सुबह जागने में जो शरीर की अनेक व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं। पेट साफ रहता है तो चित्त में भी प्रसन्नता आती है। सैर से भूख भी अच्छी लगती है। फेफड़ों में ताजी हवा का प्रवेश होता है। शरीर का अच्छा-खासा व्यायाम हो जाता है। दिन भर मन प्रसन्न रहता है, हर काम में आनंद आता है। काम करने में थकावट कम होती है। व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ़ती है तो उसकी आमदनी में भी बढ़ोतरी होती है। सुबह की सैर को निकले तो प्रकृति के नएनए रूप के दर्शन हुए। चिड़ियों ने कलरव करते हुए लोगों का स्वागत किया। गर्मियों में ठंडी हवा के झोंकों से तन-मन पुलकित हो उठा।

आसमान में उगते सूर्य को नमस्कार करके लोगों ने शक्ति के अजस्त्र श्रत को धन्यवाद दिया। बाल अरुण को देखकर मन में उत्साह का संचार हुआ। बागों में पहुँचे तो फूलों पर भंडराती तितलियों के दर्शन हुए। कोयल ने मधुर तान छेड़ी तो कर्णप्रिय ध्वनि से मन गद्गद् होने लगाकतारों में पेड़-पौधों को देखकर किसे हर्ष न हुआ होगा। हरी-भरी मखमली दूब पर पांव रखकर किसने सुख न पाया होगा। फूलों की खुशबू से किसकी साँसों में ताजगी न आई होगी।

थोड़ा चलेथोड़ी दौड़ लगा ली। कुछ ने खुली जगह पर हल्की कसरत कर ली। पहलवानों ने मुगदर उठा लिया। बच्चों के हाथों में बड़ी सी गेंद थी। अतिवृद्ध लाठियों के सहारे पग बढ़ा रहे थे। खिलाड़ी पोशाकें पहने अपनी फिटनेस बढ़ाने में व्यस्त थे।

कुछ स्थूलकाय लोगों ने अपना मोटापा घटाने की ठान ली थी। गृहणियों ने सोचा, दिन भर घर में ही रहना है, कुछ देर सैर कर ली जाए। कुछ तो एक कदम आगे बढ़कर योगाभ्यास में संलग्न हो गए। प्रातकाल का हर कोई अपने-अपने ढंग से लाभ उठाने लगा।

सुबह की सैर जनसमुदाय के लिए वरदान है। यह सदा तंदुरुस्त रहने का रामबाण उपाय है। प्रातकाल सैर पर निकलना सभी उम्र के लोगों के लिए आवश्यक है। इसके बाद किसी अन्य प्रकार के व्यायाम की आवश्यकता नहीं रह जाती है। यह मनुष्य को प्रकृत्ति प्रेमी बनाने में बहुत योगदान देता है। इससे शरीर ही नहीं, शरीर में स्थित आत्मा भी प्रसन्न होती है।

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सुबह की सैर पर निबंध – Essay on Morning Walk in Hindi No 3

तड़के सुबह बिस्तर छोड़ना कोई सरल काम नहीं है। सामान्यत: मैं रात ग्यारह बजे सोने जाता हूं। ‘जल्दी सोना जल्दी उठना वाली कहावत अब पुरानी हो चली है। मेरे पिताजी एक कठोर अधिकारी हैं। वह मुझे सुबह जल्दी उठाकर गणित पढ़ाते हैं। एक दिन मैंने उन्हें सुबह की सैर के गुण गिनवाये। तो उन्होंने मुझे सुबह की सैर पर चलने के लिये तैयार होने को कहा। हमारा मुहल्ला अपने बगीचों के लिये लोकप्रिय है। मैं इतने लोगों को बगीचे में देखकर आश्चर्य चकित रह गया। ठण्डी हवा बह रही थी। पेड़ों की हरीहरी पत्तियाँ हवा की लय में कुछ गुनगुना रही थीं। पंछियों ने अपने घोसले छोड़ दिये थे और दाने की तलाश में निकल पड़े थे।

सूर्योदय का दृश्य अत्यन्त मनोहर था। आग के मुलायम गोले की पहली किरणों को धरती पर पहुँचते हुये देखना बहुत सुहावना अनुभव था। धीरे-धीरे वो नारंगी रंग की गेंद अपना स्वरूप बदल रही थी।

बगीचे के एक हिस्से में बच्चे एक छोटी गेंद से खेल रहे थे। कुछ युवक एक ओर दौड़ लगा रहे थे। कुछ लोग व्ययाम करने में व्यस्त थे। दूसरे हिस्से में ‘योग’ के शिक्षक योग की प्रक्रियायें समझा रहे थे। सीखने के इच्छुक लोग अपने शिक्षक के निदेर्गों का सावधानी से पालन कर रहे थे। उसने उन्हें जोर से हँसने के लिये कहा। वह सब मिलकर इतनी जोर से हँसे कि मैं भी अपनी हंसी नहीं रोक पाया।

बगीचे के एक अन्य हिस्से में झण्डा फहरा रहा था। कुछ वद्ध एवं युवा लोगों ने झण्डे को सलामी दी व देशभक्ति गीत गाया। उन सबने सफेद रंग की कमीजें एवं खाकी निकौं पहनी हुयी थी। वह सब भारतीय जनसंघ पार्टी से सम्बन्धित थे। वह ‘युद्धकला सीख रहे थे।

मेरे पिताजी ने मुझे पूरे बगीचे के दो चक्कर लगाने को कहा। एक चक्कर लगाना तो सरल था पर मैं दूसरा चक्कर नहीं लगा पाया था। कुछ दूर दौड़ने के पश्चात् ही मैंने पिताजी से जाकर कहा कि गणित पढ़ने के लिये बहुत कम समय रह गया है।

मैं दो राक्षसों के बीच में था दौड़ना व गणित पढ़ना। गणित पढ़ना अधिक सरल लगा। पिताजी ने मेरी बात मान ली। व हम घर लौट आये।

Essay on Morning Walk in Hindi

भ्रमण अर्थात् घूमना, इधर-उधर विचरण करना। प्रातःकालीन भ्रमण सबसे उत्तम, सरल तथा उपयोगी व्यायाम है। गर्मियों में पाँच से छः बजे तक तथा सर्दियों में छत से सात बजे तक का समय प्रातःकालीन सैर के लिए सर्वोत्तम होता है। सैर करने के लिए सबसे अच्छा स्थान कोई पहाड़ी पर या बाग है। इससे जहाँ एक ओर आप प्रकृति की अनुपम छटा का आनंद ले सकेंगे | वहीं दूसरी ओर पूरे शरीर का व्यायाम भी हो जाएगा। प्रातःकाल का वातावरण | बहुत सुन्दर तथा शान्त होता है। उस समय न तो कोई प्रदूषण होता है। और न ही कोई शोर-शराबा ।

पक्षी अपने-अपने घोंसलों में फड़फड़ा रहे होते हैं, मंद-मंद सुगंधित वायु बह रही होती है। सूर्य भगवान उदय की तैयारी | में होते हैं और आकश एकदम स्वच्छ होता है। मीठी नींद का मोह छोड़ना पड़ता है तब आलस्य आपसे स्वयं पराजित हो जाता है। इससे सारा दिन शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है।

तेज-तेज चलने से रक्त का संचार तेज होता है तथा शरीर के प्रत्येक अंग की कसरत हो जाती है, इससे चेहरे पर रौनक आती है, हरी-भरी घास पर नंगे पाँव चलने से आँखों की ज्योति बढ़ती है। तथा सारी बिमारियाँ दूर हो जाती हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि प्रातःकालीन सैर स्वास्थ्य निर्माण करने का सबसे सस्ता एवं स्वादिष्ट नुस्खा है।

इसको करने से न तो डॉक्टर की मोटी फीस भरनी पड़ती है और न ही कड़वी दवाईयाँ निगलनी पड़ती है। चलिए आज से हम सभी यह प्रण करें कि अपनी सुविधानुसार हम प्रातःकालीन भ्रमण के लिए अवश्य जाएंगे।

Essay on Morning Walk in Hindi

सवेरे उठकर उन्मुक्त पवन में भ्रमण करना जीवन के लिए बहुत लाभकारी है। अंग्रेजी में एक कहावत है कि जल्दी सोने और जल्दी उठने से मनुष्य स्वस्थ तथा बुद्धिमान बनता है। वेदों, शास्त्रों तथा ग्रंथ साहिब में भी प्रातः उठना आवश्यक बतलाया गया है।

प्रात:काल, उषाकाल, ब्राह्ममुहूर्त, बड़ा वेला आदि इस समय के नाम ही इसकी महिमा बतला रहे हैं। इस समय सतोगुण की प्रधानता होती है। चित्त शांत होता है। इस समय प्रकृति दोनों हाथों से स्वास्थ्य तथा सौंदर्य लुटाती है। जिसे लूटना हो उसे प्रातः भ्रमण अवश्य करना चाहिए।

प्रात:काल, सूर्योदय से पूर्व शय्या त्यागकर खुली हवा में भ्रमण करने से शरीर का अंग- अंग खुलता है। इस समय उपवन, वन, खेत या नदी तट की सैर मन को अपार आनंद प्रदान करती है।

प्रात:काल सूर्य की सुनहरी किरणें मानो स्वर्गीय संदेश लेकर धरती पर आती हैं। उनसे समस्त सृष्टि में नई चेतना का संचार होता है। इस समय वन-उपवन में पुष्प विकसित होते हैं, तड़ागों में कमल मुसकराते हैं, पेड़ों पर पक्षी चहचहाते हैं। धीमी-धीमी, शीतल, सुगंधमय पवन के झोंके हृदय में हिलोर उठाते हैं।

पूर्व दिशा में लाली छा जाती है। काँस, दूब और पत्तों पर ओस की बूंदें मोतियों की तरह झलकती हैं। ऐसे दृश्य को देखकर मनुष्य के मन में कोमल भावनाओं तथा सरस कल्पनाओं की लहरें उठने लगती हैं।

प्रात:काल पेड़ों, पौधों, बेलों से ऑक्सीजन छूटती है। यह गैस हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है-यह प्राणवायु है। इससे हमारे फेफड़े बलवान बनते हैं, हमारे अंदर की गंदी हवा बाहर निकलती है, शुद्ध हवा फेफड़ों में प्रवेश करके हृदय से आए दूषित रक्त को शुद्ध कर देती है।

प्रात:काल प्रकृति की अद्भुत शोभा को देखकर ईश्वर का स्मरण हो आता है। उस अनंत शक्ति के सम्मुख हमारा मस्तक स्वयं नत हो जाता है। इससे हमारा हृदय पवित्र होता है, उसमें बुरी भावनाओं का प्रवेश नहीं होता। प्रातः भ्रमण से मस्तिष्क (दिमाग) तरोताजा हो जाता है। और सारा दिन अंगों में स्फूर्ति भरी रहती है। हमारे ऋषि-मुनि प्रातः भ्रमण के कारण ही दीर्घायु हुआ करते थे। अतः हमें प्रतिदिन प्रातः भ्रमण करना चाहिए।

Essay on Morning Walk in Hindi

एक दिन मैं अपने बड़े भैया के साथ प्रातः पाँच बजे यमुना-स्नान के लिए चला।। तिलकनगर से हमने अंतरराज्यीय बस अड्डे के लिए बस पकड़ी। सड़क पर ट्रैफिक कम था, अतः हमारी बस तेजी से बस अड्डे की ओर दौड़ने लगी। जखीरे के बाद सब्जीमंडी, बर्फखाना होकर हमारी बस बस अड्डे पर पहुँच गई। बस से उतरकर हम यमुना की ओर चले।। आगे एक बाग आया। भैया ने बताया कि यह कुदसिया बाग है।

इस बाग की शोभा का क्या वर्णन करूँ! चारों ओर ऊँचे-ऊँचे छायादार पेड़ हैं। स्थान-स्थान पर पौधे लगे हुए हैं, जिनपर रंग-बिरंगे फूल खिले हुए हैं। लॉन में मखमल जैसी घास बिछी है। शीतल-मंद-सुगंध पवन चल रही है। पवन से लताएँ डोल रही हैं। फूलों पर भौंरे गूंज रहे हैं और तितलियाँ मँडरा रही हैं। संपूर्ण वातावरण सुगंध से पूरित है।

भैया ने बताया कि शीतल पवन के झोंके यमुना की ओर से आ रहे हैं और यहाँ पास ही में कुदसिया घाट है।  कुदसिया बाग को पार करते ही एक बड़ी चौड़ी सड़क आ गई। भैया ने बताया कि यह बेला रोड है। इसे पार करके हम कुछ सीढियाँ उतरे। वहाँ से सामने ही कुदसिया घाट दिखाई दे रहा था।

यमुना में जल तो अधिक न था, किंतु स्वच्छ था। तट पर अनेक आश्रम और छोटे- छोटे मंदिर बने हुए हैं। एक ओर अखाड़ा था, जहाँ पहलवान कुश्ती लड़ रहे थे। प्रत्येक आश्रम से नीचे की ओर पक्की सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। इनसे होकर लोग यमुना जल में उतर रहे थे। कोई वस्त्र उतार रहा था, कोई पहन रहा था, कोई तेल की मालिश कर रहा था, कोई दंड-बैठक निकाल रहा था।

कहीं बड़ी-बूढियाँ ‘राम-राम, जय-जय कृष्ण’ कह रही थीं, कहीं बच्चे किलकारियाँ मार रहे थे। उधर जनाना घाट था, जहाँ नन्ही बालिकाएँ नानी-दादी के साथ जा रही थीं। कुछ पुरातनाएँ पूँघट काढ़े और कुछ आधुनिकाएँ नए फैशन में सजी- धजी जा रही थीं।

उधर सूर्य भगवान् अपनी रश्मियों से जल-तरंगों को सजा रहे थे। उस सुंदर जलधारा में कोई स्नान कर रहा था। कोई पूजा कर रहा था। मैं मंत्रमुग्ध होकर एकटक उस प्रभु की लीला को देखने लगा। इतने में दूर से नाव आती दिखाई दी और सुनहरी भूमि को चीरती आगे जाने लगी। उस एकांत तथा मौन वातावरण में जल भी चुपचाप उस नाव के आघात को सहन करता रहा।

यदि चंचल हो उठता तो प्रकृति का चित्र बिगड़ जाता। यही सोचकर जल भी मगन रहा- उस ध्यान में मस्त व्यक्ति की तरह जो एक ओर बैठकर संध्या-पूजन कर रहा हो। नदी तट पर कुछ पंडे छाता ताने बैठे थे। स्नानार्थी अपने वस्त्र व धन आदि उन्हें सौंपकर निश्चित होकर स्नान करते और तैरते हैं या जलक्रीड़ा करते हैं। स्नान के बाद बाहर आकर वे अपने वस्त्र पहनते हैं। तब पंडे उनके मस्तक पर चंदन का टीका लगाते हैं। लोग पंडों को पैसे देते हैं और फिर घर की ओर चल पड़ते हैं।

प्रात:काल का समय बहुत सुहावना समय होता है। उस समय वातावरण शुद्ध तथा वायु सुगंधित होती है। इसपर यदि किसी नदी तट पर चले जाओ तो उस समय का दृश्य सचमुच चित्ताकर्षक होता है।

उस समय प्रकृति-नटी अपने रंगमंच को सजा रही होती है। नदी तट पर जलकणों से मिश्रित जो वायु आकर स्पर्श करती है, तब ऐसा लगता है कि किसी लंबी मूच्छ को हटाने के लिए जल के छींटे आ रहे हों। नदी तट पर खड़े होकर जल को देखें-जो दूर तक, न जाने कहाँ तक चला गया है-तो हृदय में विशालता के भाव उठने लगते हैं। नदी न जाने किस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए बिना रुके अग्रसर हो रही है-कदाचित् समुद्र में मिल जाने को।

मनुष्य उस समय यह सीख सकता है कि वह भी ब्रह्म को पाने के लिए सदा नदी की तरह चुपचाप अग्रसर होता रहे।

Essay on Morning Walk in Hindi

जीवन को सुखमय बनाने के लिये मन को प्रसन्न रखना परम आवश्यक है। मन उसी मनुष्य का प्रसन्न रहता है, जिसका स्वास्थ्य सुन्दर हो । स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिये जितना पौष्टिक पदार्थ आवश्यक है उतना ही शारीरिक श्रम भी। श्रम से मनुष्य की शक्ति और स्वास्थ्य दोनों ही बढ़ते हैं। शारीरिक श्रम की बहुत-सी क्रियायें हैं। कोई व्यायाम करता है तो कोई प्राणायाम, कोई दौड़ लगाता है तो कोई मुग्दर घुमाता है कोई यौगिक क्रियाओं में शीर्षासन ही करता है।

जिसकी जिधर रुचि होती है, उसको उसी में अधिक आनन्द आता है। प्रात:कालीन भ्रमण भी शरीर को स्वस्थ और निरोग रखने के शारीरिक श्रमों में से एक है। प्रात:काल के भ्रमण से मनुष्यों को विभिन्न ऋतुओं की सुगन्धित वायु प्राप्त होती है, जिससे मनुष्य में एक नव-स्फूर्ति और नवजीवन का संचार होता है।

ऊषा की लालिमा मानव हृदय को रोग-रहित कर देती है। प्रात:काल का भ्रमण मनुष्य को बड़ा ही आनन्द देता है।

प्रात:काल के भ्रमण से मानव को विशेष आनन्द की प्राप्ति होती है। प्रकृति के मनोरम दृश्यों को देखकर वह फूला नहीं समाता। उसका हृदय कमल विकसित हो जाता है। प्रात:काल परिभ्रमण करने से हमारी शारीरिक शक्ति के साथ-साथ मानसिक शक्ति का भी विकास होता है।

हमारे मन से विकार दूर हो जाते हैं। प्रात:काल मन प्रसन्न होने से मनुष्य का संध्या तक का समय बड़ी प्रसन्नता से व्यतीत होता है। सुबह की ठण्डी वायु सेवन करने से मनुष्य के मुख पर तेज आता है। उसकी पाचन शक्ति बढ़ जाती है। | वृद्धावस्था में परिभ्रमण करना तो संजीवनी औषधि और अमृत का काम करता है।

प्रात:काल में वायु जब-जब हमारे नासिका और श्वासोच्छ्वास की क्रियाओं से शरीर में प्रवेश करती है, तो हमारा रक्त शुद्ध होता है, फेफड़ों की बल मिलता है, हमारा शरीर निरोग रहता है, वह अजीर्णता का शिकार नहीं बन पाता। मानव का बौद्धिक बल भी बढ़ता है। उसकी प्रज्ञा तीव्र और संकल्प दृढ़ होते हैं। वह उद्योगी और अव्यवसायी बन जाता है। उसमें अच्छे भावों की वृद्धि होती है, नंगे पैर हरी भरी घास पर घूमने से मनुष्य | के मस्तिष्क सम्बन्धी विकार दूर हो जाते हैं। मस्तिष्क की दुर्बलता सफलता में

भाषा-गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी एवं ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। भाषा शुद्ध परिष्कृत, परमार्जित एवं साहित्यिक है। तुलसी ने भाषा प्रयोग में संस्कृत के तत्सम एवं तद्भव शब्द का अधिक प्रयोग किया है। कहीं-कहीं तो उन्होंने संस्कृति के विभक्ति रूपों एवं क्रिया रूपों को भी अपनाया है। रामचरितमानस के प्रत्येक काण्ड के प्रारम्भ में संस्कृत श्लोकों का प्रयोग कर यह सिद्ध कर दिया है कि उन्हें संस्कृत का अच्छा ज्ञान था।

तुलसी मूलत: भक्त है कवि नहीं। उनके भाव काव्यमय बन गये हैं। रामचरित्र वर्णन करने के लिये काव्य सृजन किया है। उन्होंने अलंकारों का प्रयोग जान-बूझकर नहीं किया है किन्तु अर्थ की सफल अभिव्यक्ति के लिए भावों के सौन्दर्य की अग्नि वृद्धि के लिये रूप चित्रण प्रस्तुत करने के लिए अलंकारों का प्रयोग स्वत: हो गया है।

गोस्वामी तुलसीदास जी के काव्य में चौपाई, दोहा, सोरठा पद, जैतश्री विलावली के द्वारा तोद्री सारंग, सूदी मतहार, चंचरी, भैरव बसन्त और रामकली आदि विभिन्न छन्दों और रागों का प्रयोग किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने सर्वव्यापक निरंजन भक्ति प्रेम से ही वशीभूत होने वाले दशरथ नन्दन राम को अपना आराध्य माना है।

राम को घनश्याम मानकर अपने को चातक सदृश समर्पित कर दिया।

एक भरोसो, एक दल, एक आस विश्वास एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास । उन्होंने राम के प्रति ही अपनी भक्ति प्रदर्शित की है। जौ जगदीश तौ अति भल्ये जी महीस तौ भाग। तुलसी चाहत जनम भरि रामचरन अनुराग। वे दास्य जीवन की भक्ति को ही भवसागर से तरने के लिए आवश्यक मानते हैं। उनका दृष्टिकोण है। सेवक सेवा भाव बिनु भवन तरिअ उरगारि

दास्य भक्ति में इष्ट देव महत्ता की, उदारता, दयालुता भक्त शरणागत वत्सलता दीनता, हीनता आदि का विशेष स्थान रहता है। तुलसी की भक्ति राममय है। गोस्वामी तुलसीदास ने विभिन्न दर्शनों का अध्ययन कर अपना भक्ति दर्शन प्रविष्ठित किया।

गोस्वामी जी ने वैदिक संहिताओं, उपनिषदों आगम ग्रन्थों, पुराण तथा अन्य अनेक शास्त्रों का अनुशीलन कर अपनी भक्ति का निर्धारण किया। तुलसी का दर्शन एक है वह है भक्ति दर्शन। तुलसी की दार्शनिक भावना वस्तुतः समन्वयात्मक ही है। तुलसी के दर्शन को ब्रह्म माया, जीव जगत मोक्ष एवं साधना सम्बन्धी विचारों का अनुशीलन करना आवश्यक है।

तुलसी ने जीव, जगत और ब्रह्मा का जैसा सामंजस्य बैठाया है, वैसा अन्य दार्शनिकों में देखने को नहीं मिलता है। ईश्वर को अंश, जीव, अविनाशी मानकर जीव को महत्व प्रदान किया है। जड़ और चेतन का संबंध स्थापित करने में तुलसी पूर्ण सफल हुए हैं जगत का सृष्टिकर्ता स्वयं भगवान है। अत: तुलसीवाद से हटकर समन्यवादी विचारधारा के पोषक हैं। गोस्वामी तुलसीदाजी ने मनुष्य को अपने को पहचानने पर जोर दिया है।

इसके लिए हरि भक्ति पथ का निरूपण किया। भारतीय साधना से ज्ञान, कर्म और उपासना को समान महत्व दिया गया है। इन तीनों को अपने जीवन में उतार कर मनुष्य अपने जीवन को सफल बना सकता है। ज्ञान, कर्म और उपासना तीनों ही एक दूसरे सम्बद्ध है। व्यक्ति के स्वरूप का चरित्र उत्तम होना बहुत आवश्यक है। इससे व्यक्ति को आन्तरिक शक्ति मिलती है।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी साहित्य के प्रमुख | कवि हैं। उन जैसा कोई कवि न हुआ है न होगा। रामकाव्य के तो वे एकदम सम्राट थे। जैसा भाव सौन्दर्य, गांभीर्य, भाषा शैली का उत्कर्ष दिखाई देता है, वैसा उनके काव्यों में नहीं । तुलसी लोक दृष्टा जागरूक विचारक और सामाजिक मनोविज्ञान के सच्चे पारखी थे। लोकहित जितना वर्णन उनके काव्य में मिलता है, उतना अन्य में कहाँ। उनकी दृष्टि में लोक मर्यादा के बिना जन कल्याण सम्भव नहीं।

आज समाज में तुलसी के साहित्य की आवश्यकता है।

यही कारण है कि ‘रामचरितमानस’ का महत्व सर्वत्र दिखाई देता है। भारत में ही नहीं विदेशों में भी तुलसी के महत्व को प्रदर्शित कर रहे हैं। उन्हें सदैव स्मरण किया जाता रहेगा।

 

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