Moral Stories in Hindi For Class 8 With Pictures – हिंदी में नैतिक कहानियां

अगर आप हिंदी में नैतिक कहानियां पढ़ना चाहते है और अपने बच्चो को भी ये Moral Stories सुना सकते हैं। आजकल हम इंटरनेट के युग में कहानियों का महत्व खो चुके है हम आपके लिए लाये है Moral Stories in Hindi जो आपके बच्चों के लिए लाये है बहुत अच्छी अच्छी कहानियाँ जो उनमे नयी सोच को जन्म देंगी

Moral Stories in Hindi For Class 8: 

Moral Stories No 1 : आदमी की शान

आदमी की शान

शहर का काजी जो भी नया नौकर रखता था उसके सामने यह शर्त रखता था कि यदि नौकरी छोड़कर जाएगा तो उसके नाक-कान काट लिए जाएंगे। यदि वह स्वयं उसे नौकरी से हटाएगा तो उसे हक होगा कि वह उसके नाक-कान काट ले।

वह कई लोगों के साथ पहले भी ऐसा कर चुका था। इधर शेखचिल्ली नौकरी की खोज में कई दिनों से इधरउधर भटक रहा था। तभी रास्ते में उसे उसके तीन मित्र मिलेउनके नाक-कान कटे देखकर उसने कारण पूछा तो उन्होंने सबकुछ बता दिया। मित्रों के मना करने पर भी उसने उस काजी के यहां नौकरी करने की ठान ली।

अगले दिन जब वह काजी के घर गया तो काजी ने उसे भी वही शर्त ! बता दी। शेखचिल्ली ने उसकी शर्त स्वीकार कर ली। तब काजी ने उसे काम समझाते हुए कहा कि तुम्हें बीस बीघा खेत जोतना होगाचूल्हा जलाने के लिए लकड़ियां लानी होंगी और रात्रि-भोजन के लिए शिकार मारकर लाना होगा।

ध्यान कि ये सारे तक हो जाने चाहिए। जब तुम घर लौटोगे रहे काम दोपहर तब बेगम तुम्हें रोटी और दही की मटकी देगी। रोटी तुम्हें ऐसे खानी है कि वह छोटी न हो और दही ऐसे पीना है कि मटकी का मुह न खुले। दसरे दिन से शेखचिल्ली हल और बैल लेकर खेत जोतने लगा।

उसके पीछेपीछे काजी की कुतिया भी चल पड़ी। खेत में जाकर उसने पेड़ के -गड्ढे खोद पासपास दिए। चूल्हा जलाने के लिए हल को तोड़कर लकड़ियां इकट्ठी कर लीं। शिकार के रूप में काजी की कुतिया को ही मार लाया। ये सारे काम करके वह दोपहर से पहले ही घर लौट आया।

उसे आयादेखकर काजी और बेगम दोनों ही आश्चर्यचकित रह गए। काजी ने जब जल्दी आने का कारण पूछा तो शेखचिल्ली ने सबकुछ बता दिया।
इस पर काजी क्रोधित होकर बोला, “चलनिकल मेरे घर से।” तब शेखचिल्ली बोला ठीक है, शर्त के मुताबिक लाइए अपने नाक-कान। ” काजी सहम गया। इतनी क्षति होने पर भी उसे खून का पूंट पीकर पड़ा रह जाना अब शर्त के अनुसार बेगम ने उसे रोटी और दही की मटकी दी।

शेखचिल्ली ने रोटी-मटकी ले ली। शर्त उसे याद थी। उसने रोटी को बीच से खाना शुरू कर दिया  और मटकी के नीचे छेद करके सारा दही भी पी गया। इस तरह न रोटी छोटी हुई और न मटकी का मुंह ही खुला।यह सब देखकर काजी बड़ा विचलित हुआ। उसने सोचा कि यह तो कोई पहुंचा शैतान लगता है।

नाक-कान लेकर ही जाएगा। फिर वह शेखचिल्ली के कदमों में गिरकर गिड़गिड़ाने लगा, “शेख चिल्ली मुझे माफ करतू यहां से निकल जा। नाक-कान की जगह तू जितना चाहे धन ले ले, क्योंकि नाक-कान के बिना आदमी की शान चली जाती है।” “और तुमने जिन लोगों के नाक-कान काटे क्या उनकी कोई शान नहीं थी?”

“ भैया, मैं बेहद शर्मिदा हूं।”

“अच्छा, एक काम करा कि मुझे सालभर की तनख्वाह दो और वचन दो कि भविष्य में अन्य किसी के साथ ऐसा बर्ताव नहीं करोगे।”

कथा-सार

दूसरों के कष्ट में व्यक्ति संवेदना तो व्यक्त करता है, लेकिन पीड़ा का अनुभव नहीं करता। पीड़ा तो तभी होती है जब खुद पर गुजरती है।

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Moral Stories No 2 : सियार और सिंह

 

एक दिन एक भूखे सियार का एक सिंह से सामना हो गया। सिंह को देखकर सियार की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई। उसने किसी तरह डरते-डरते कहा”हे जंगल के राजा! मुझे अपनी शरण में ले लो। मैं आपकी हर आज्ञा मागूंगा।” सिह को उस पर दया आ गईवह बोला, “ठीक है, चलो मेरे साथ रहो।

अगर तुम मेरा कहना मानते रहे तो खाने-पीने की पूरी मौज रहेगी” “आपका हुक्म सिर माथे पर।” सियार ने शीश नवाकर कहा “अब मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम्हें रोज पहाड़ की चोटी पर जाकर देखना होगा कि नीचे घाटी में कोई जानवर घूमफिर रहा है या नहीं।

यदि कोई जानवर नजर आए तो मुझे आकर बताओगे और कहोगे, ‘दमको पूरी शक्ति से हे सिंहराज’ उसके बाद जब में जानवर को मारकर भरपेट भोजन कर यूंगा। तब बचा हुआ भाग तुम खाओगे” “जैसी आपकी आज्ञा।” सियार बोला। ”

अगले दिन सियार पहाड़ की चोटी की ओर चल दिया। उसकी निगाह एक हाथी पर जा पड़ी। वह सिंह के पास दौड़कर आया और दंडवत होकर बोला, “मैंने एक हाथी देखा है। दमको पूरी शक्ति से हे सिंहराज!”  सिंह ने हाथी का शिकार किया और भरपेट खाया।

फिर उसके बाद सियार ने भी खाया। इसी तरह से दिन बीतते चले गए। सियार काफी मोटा-तगड़ा हो गया, किंतु उसकी विनम्रता घटती गई। एक दिन वह सोचने लगा, ‘मैं जूठन से क्यों अपना पेट भरू, मैं भी तो चौपाया जीव हूं। मैं खुद भी हाथियों और भैसों का शिकार कर सकता हूं।

आखिर सिंह को अपना सारा बल जादू के इस मंत्र ‘दमको पूरी शक्ति से हे सिंहराज।’ से ही तो मिलता है। उसने सिंह से प्रार्थना की, हुजूर! आपकी जूठन खाते हुए मुझे काफी समय बीत गया है।

अब में खुद शिकार करक हाथी खाना चाहता हूं।” सिंह कुछ देर तक सोचता रहा और फिर बोला, “यह तेरे बस का काम नहीं है। में जा शिकार करता हूं उसे खाकर ही तू मस्त रह। ‘नहीं स्वामी! कृपया एक बार मुझे मौका तो दीजिए। इस बार मैं यहां रुकूगा और आप पहाड़ की चोटी पर जाएंगे और जब आपको कोई हाथी दिखाई दे तब आकर मुझसे कहिए ‘दमको पूरी शक्ति से हे सियार!’ मैं जरूर उसका शिकार कर ढूंगा।”

सिंह ने काफी समझाया, किंतु सियार नहीं माना। आखिरकार सिंह राजी हो गया। कुछ देर बाद सिंह वापस आया“मुझे अभी-अभी एक हाथी इधर आता दिखाई दिया है। दमको पूरी शक्ति से हे सियार”

सियार फुर्ती से चल दिया और हाथी के सामने जा पहुंचा। ‘अभी उसकी गरदन | दबाकर उसका काम तमाम करता हूं।’ यह सोचकर उसने हाथा पर छलांग लगा दी, किंतु वह चूक गया। फलस्वरूप मदमस्त हाथी उसे केंदता हुआ आगे बढ़ गया। इस तरह वह मूर्ख सियार अपने प्राणों से हाथ धो बैठा।

कथा-सार

कुछ करने से पहले अपनी ताकत का अनुमान लगा लेना चाहिएकोई भी ऐसा काम नहीं करना चाहिए जो प्रकृति के विरुद्ध हो। जैसे सियार का यह सोचना कि वह हाथी को मार डालेगा। इसमें अपनी ही हानि है। जिसका काम उसी को साजे, और करे तो मूरख बा।

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Moral Stories No 3: अनमोल चिड़िया

चारों ओर पहाड़ों से घिरा हुआ एक वन था। उस वन में पीपल का एक वृक्ष भी था। उस वृक्ष पर एक विचित्र चिड़िया रहती थी जो स्वर्णिम विष्ठा (बीट) करती थी, अर्थात् विष्ठा के रूप में वह स्वर्ण निष्कासित करती थी। उसकी विष्ठा धरती पर गिरते ही स्वर्ण में बदल जाया करती थी।

एक बूढ़े व्याध ने जब अपनी आंखों से इस आश्चर्य को देखा तो उसे अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ।


वह सोचने लगा कि यह कैसे संभव हो सकता है कि एक जंगली चिड़िया की विष्ठा धरती पर गिरते ही स्वर्ग में परिवर्तित हो जाए। लेकिन उसके सामने तो प्रत्यक्ष और प्रमाण दोनों ही मौजूद थे, इसलिए उसे विश्वास करना ही पड़ा व्याध सोचने लगा कि अगर यह चिड़िया मेरे जाल में फंस जाए तो मैं मालामाल हो जाऊंगा। इस चिड़िया को खूब खिलाऊंगा ताकि यह ज्यादा-से-ज्यादा स्वर्णिम विष्ठा करेयह विचारकर व्याघ ने पीपल के उस वृक्ष पर अपना जाल डाल दिया और चिड़िया के फसने की प्रतीक्षा करने लगा।

चिड़िया ने वृक्ष पर पड़े जाल को नहीं देखा और उसमें फंस गईव्याध चिड़िया को अपने अधिकार में लेकर खुशी-खुशी घर की ओर चल दिया। परंतु अचानक ही उसके बढ़ते कदम रुक गए। वह सोचने चिड़िया विचित्र और स्वर्ण विष्ठा लगा..यह करने वाली अवश्य है, लेकिन यह किसी भूतप्रेत अथवा पिशाच का रूप हुई तो कहीं मैं धनवान होने के बजाय किसी संकट में न फंस जाऊं।

काफी देर सोच-विचार करने के बाद व्याध ने यह निष्कर्ष निकाला कि इस चिड़िया को घर न ले जाकर राजा को दे दें और पुरस्कार प्राप्त कर लू। उसके दिमाग (8 में यह विचार आते ही वह राजमहल की ओर चल दिया।

राजमहल में पहुंचकर वह राजा से बोला, “महाराजयह एक विचित्र चिड़िया है। इसकी विष्ठा धरती पर गिरते ही सोने की हो जाती है। इसलिए मैंने सोचा कि इसे अपने अधिकार में लेकर आपको दे दें, ताकि इसकी स्वर्णिम विष्ठा से राजकोष में बढोतरी हो।”

राजा चिडिया उस को पाकर बहुत खुश हुआ और उसने व्याध को बहुत-सा धन पुरस्कार के रूप में प्रदान किया। राजा ने अपने सेवकों को बुलाकर कहा, “यह चिड़िया अनमोल है। इसकी देखभाल में कोई कमी न रहने पाए।”

सेवकों ने राजा का आदेश मानकर उस चिड़िया को एक सुंदर से पिंजरे में कद कर दिया और उसके खाने-पीने का सामान भी उसमें रख दिया। उस विचित्र चिडिया के विषय में जब मंत्री को पता चला तो उसने राजा के पास जाकर निवेदन  किया“महाराजवह व्याध इस जंगली चिड़िया को अनमोल और सोने की विष्ठा करने वाली बताकर आपको मूर्ख बना गया। अगर यह सोने की विष्ठा करने वाली होती तो वह व्याध स्वय इसे पालकर धनवान न बन जाता।”


राजा का मंत्री की बातों में सच्चाई नजर आई और उसने अपने सेवकों को बुलवाकर उस चिड़िया को बंधनमुक्त करने का आदेश दे दिया।

बंधनमुक्त होते ही चिड़िया अपने निवास पर पहुंचकर कहने लगी, “पहले तो व्याघ के जाल में फंसने वाली पूर्व में ही थी। दूसरा मूर्ख व्याघ था जिसने हाथ में आया भाग्य राजा को सौंप दिया। पहले व्याघ के और फिर के  मंत्री कहने में आने वाला राजा और बिना जांच किए मुझे बंधनमुक्त कराने वाला मंत्री भी मू था। लगता है इस धरती पर मूखे-ही-मूर्ख भरे पड़े हैं।” फिर वह चिड़िया खुशी से पीपल के उस वृक्ष पर एक डाल से दूसरी डाल पर फुदकती हुई उड़ान भरने लगी।

कथा-सार।

वह में आते – व्यक्ति मूखर्षों की श्रेणी हैं जो बिना जांचेपरखे लोगों की बातों । में आकर अपने भाग्य को अपने हाथों से गंवा देते हैं, जैसा कि इस कथा में | पहले व्याघ ने और फिर मंत्री के कहने में आकर राजा ने किया।

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Moral Stories No 4: नटखट चुन्नु

 

नटखट चुन्नू नन्हा-सा चूजा था। वह सारे दिन इधर-उधर फुदकता रहता था। उसकी मां अक्सर उसे समझाती थी कि अकेले इधर-उधर मत घूमा करो कभी | भी किसी मुसीबत में पड़ सकते हो, पर चुन्नू कहां मानने वाला था।

एक दिन चुन्नू अपनी मा के साथ दाना चुग रहा था। दाना चुगते-चुगते वह अपनी मां से नजर बचाकर थोड़ी दूर निकल गया।वहां उसे मटर के कुछ दाने बिखरे दिखाई दिए। वह अपनी छोटी-सी चोंच से छीलकर मटर के दाने खाने लगा। तभी मटर का एक दाना अचानक उसके गल में अटक गयाऐसा होने पर चुन्नू बड़ा परेशान हुआ। उसने उस दाने को निगलने या उगलने की बड़ी कोशिश की, लेकिन सफल न हो सका।

अब चुन्नू रोने लगा। कुछ देर में उसकी मा भी उसे खोजते-खोजते वहां । आ पहुंची। जब उसे पता चला कि चुन्नू के गले में मटर का दाना फंस गया है तो व। भी बहुत परेशान हुई। उसने अपनी चोंच से उस दाने को निकालने की कोशिश भी  की, लेकिन चोंच बडी होने के कारण सफलता नहीं मिली।

तब मुर्गी को अपने मित्र बगुले की याद आई। वह दौड़ी-दौड़ी बगुले के पास गई और उसे अपनी विपदा सुनाई। बगुला तुरंत मुर्गी के साथ आया और उसने अपनी लंबी से चोंच चुन्नू के गले में फसे मटर के दाने को निकाल दिया।

मटर का दाना निकलने से चुन्नू की जान-में-जान आईउसने अपनी मां से। माफी मांगी और कहा, “मां, अब मैं कभी भी शरारत नहीं करूगा और आपका कहा मानूगा।

मुर्गी उसे प्यार से पुचकारते हुए अपने साथ ले गई। उसे पता था कि अब चुन्नू सचमुच शरारत नहीं करेगा।

कथा-सार

यह ठीक है कि बचपन शरारत करने के लिए ही होता है, लेकिन ऐसी भी क्या शरारत कि जान पर आ बने। माता-पिता तथा बड़े-बुजुर्गों की बातों को सुनकर टालना नहीं चाहिए। वे जो कुछ भी कहते हैं वह हमारी भलाई के लिए ही होता है। चूजे को भी यह बात समझ में आ गई थी, परंतु कुछ कष्ट सहने के बाद ही।

Moral Stories No 5 : हजरत अली की दयालुता

हजरत अली के पास एक नौकर था। एक दिन वह किसी बात पर नाराज हो गया और नौकरी छोड़कर चला गया। उसके बाद हजरत मस्जिद में नमाज पढ़ने गए तो नौकर चुपचाप वहाँ पहुँचा और तलवार से उन पर वार किया। हजरत को गहरी चोट आई। खून बहने लगा। कुछ लोगों ने उन्हें उठाया और उनका उपचार करने लगे। कुछ ने नौकर को पकड़ लिया और हजरत के सामने पेश किया।

इतने में हजरत को प्यास लगी। उन्होंने पानी माँगा। कोई शरबत ले आया। गिलास हजरत की ओर बढ़ाया तो उन्होंने नौकर की ओर इशारा करके कहा, ‘मुझे नहीं, पहले उसे पिलाओ। बेचारा कितना थक गया है। कितना हाँफ रहा है।’

लोगों ने नौकर की ओर गिलास बढ़ाया तो उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। हजरत ने बड़े प्यार से कहा, ‘अरे रोओ मत। गलती हम सबसे हो जाती है। शरबत पी लो।’ नौकर उनके पैरों में गिर गया और अपनी करनी पर पछतावा किया। हजरत ने उसे पुचकारा और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘जो अपनी गलती को मान लेता है और फिर न करने का संकल्प कर लेता है वह बहुत ऊँचा उठता है।’

Moral Stories No 6 : अक्लमंद कौन

सूफी संतों में एक बड़े संत थे अबू मुहम्मद जफर सादिक। एक दिन उन्होंने एक आदमी से पूछा, ‘अक्लमंद आदमी की क्या पहचान है?’ उसने कहा, ‘जो नेकी और बदी के बीच तमीज कर सके।’

संत बोले, ‘यह काम तो जानकर भी कर सकते हैं और करते हैं। जो उनकी सेवा करते हैं, उन्हें वे नहीं काटते। जो उन्हें तकलीफ पहुँचाते हैं, उन्हें वे नहीं बख्शते।’

तब आप ही बताइये कि अक्लमंद कौन है? उस आदमी ने पूछ। संत ने उत्तर दिया, ‘अक्लमंद वह है जो दो बातों में पहचान सके कि ज्यादा अच्छी बात कौन सी है, और दो बातों में पहचान कर सके कि ज्यादा बुरी कौन सी है। अक्लमंद वह है, जो यह पहचान होने पर ज्यादा अच्छी बात करे और अगर बुरी बात करने की लाचारी पैदा हो जाए तो कम बुरी बात को करों।’

Moral Stories No 7 : पहले आत्मा फिर दुनियाँ

एक समय की बात है कि 12 मित्र लम्बे, सफर के लिए निकले। वे अपने निर्दिष्ट स्थान पर पहुंचने से पहले 8-10 किलोमीटर आगे पीछे रह गए थे। अंत में वे सबके सब एक निश्चय पड़ाव पर एकत्रित हुए। कहीं उनमें से कोई मित्र खो न जाए या पीछे न रह जाए, इसलिए उन्होंने अपने आपको गिनना शुरू किया और सभी ने 11 ही गिने।

सभी 12 मित्रों का कहना था कि जब हमने यात्रा प्रारंभ की तब हम 12 थे, किन्तु अब तो हमारे में से एक गुम हो गया है। वास्तव में बात यह थी कि गिनने वाला व्यक्ति 12वां होता था और वह अपने को गिनता ही नहीं था।

इसी प्रकार जब मनुष्य अपने को छोड़कर बाकी दुनिया का हिसाब करता है तो उसे सारी दुनिया और दुनिया के दूसरे व्यक्ति अधूरे ही दीखते हैं।

मनुष्य अपनी आत्मा को भूल जाता है। इसीलिए वेदान्त का यह अमर-वाक्य है-पहले अपनी आत्मा को पहचानो, फिर दुनिया को पहचानो

Moral Stories No 8 : लला की भक्ति

एक बार सम्राट अकबर ने अपने नवरत्न संगीत सम्राट तानसेन से कहा-‘तानसेन! तुम अपने गुरु स्वामी हरिदास का बहुत गुणगान करते हो, किसी दिन हमें भी उनसे मिलाओं।’ तानसेन ने उत्तर दिया-‘जहाँपनाह गुरु जी तो अत्यन्त साधारण तरीके से कुटिया बना कर रहते हैं, आप उनसे भेंट करके क्या करेंगे?’

अकबर ने अधिक हठ किया तो एक दिन दोनों स्वामी जी के पास पहुँच गए। स्वामी जी उस समय अपनी कुटिया के बाहर बैठे भजन-पूजन में तल्लीन थे। वे दोनों वहीं सामने बैठ गए। कुछ समय बाद जब स्वामी जी पूजा से उठे तो बादशाह अकबर से उनकी बात हुई। बादशाह ने कहा–’स्वामी जी तानसेन के मुख से आपकी चर्चा सुनकर आपके दर्शनों की इच्छा हुई। अतः आपसे मिलने चला आया। यह एक तुच्छ भेंट लाया हूँ, कृपया स्वीकार करें।’ इसके साथ ही अकबर ने इत्र की एक शीशी स्वामी जी को भेंट करनी चाही। स्वामी जी ने उत्तर दिया हम तो साधु हैं। इन सब चीजों से क्या लेना? हम तो लला (भगवान राम) की भक्ति करते हैं, यह कहते हुए स्वामी जी ने वह शीशी वहीं जमीन पर उलट दी।

अकबर को क्रोध भी आया और आश्चर्य भी हुआ, लेकिन वह शांत रहा और कुछ देर बाद तानसेन के साथ वापस आया। लौटते समय तानसेन ने समीप ही स्थित लला के मंदिर के दर्शन की इच्छा प्रकट की और दोनों मंदिर की ओर चल दिए। जैसे ही उन्होंने मंदिर के प्रांगण में कदम रखा उसी इत्र की महक से सारा वातावरण महका हुआ था। लला की मूर्ति के कपड़ों से तो इत्र की बूंद टपक रही थी, जैसे किसी ने अभी-अभी इत्र चढ़ाया हो। बादशाह स्वामी हरिदासजी के प्रति नतमस्तक हो गए।

Moral Stories No 9 : चतुर्थ वर्ण की भगिनी

ताम्रपात्रों और शिलालेखों में जो राजाओं की प्रशस्तियाँ लिखी मिलती हैं, उनमें प्रशस्ति लिखने वाले कवि अपनी- अपनी बुद्धि से अपने आश्रयदाता के वंश का बहुत ऊँचा वर्णन करते हैं। यदि वंश में कुछ न्यूनतम हो तो उसको तो छिपाते ही हैं, परन्तु और उसी समय के वंशों से उसको उत्कृष्ट दिखाने का भी यत्न करते हैं। अपने वंश के उत्कर्ष को दिखाने के लिए दूसरो के वंश की निंदा भी किया करते हैं। परन्तु एक कवि की अनूठी वर्णना राग-द्वेष की, बिना निंदा की और बहुत ही मनोरम है।

रामा अन्नभेव का एक दानपत्र शक संवत् 1300 का वनपल्ली (गोदावरी जिला, मद्रास) में मिला है। ये राजा शूद्र जाति के रेड्डी थें प्रशस्ति के निर्माता भिलोचनार्थ अपने आश्रयदाता के वर्ण का यों वर्णन करता है: तम चतुर्थो वर्णः शोरेः पद पदमसम्मवोजयति। यस्य सहज भ्रवन्ती भिमिः प्रवाहै: पुनानिभुवनानि।। भगवान विष्णु के चरण-कमल से उत्पन्न चतुर्थ वर्ण की जय हो, जिसकी सहोदर भगिनी गंगा अपने तीन प्रवाहों से तीन लोकों को पवित्र करती है।

चमत्कार यह है कि जो लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों को भगवान के मुख, बाहु, गुरुा और चरण से क्रमशः उत्पन्न हुआ मानते हैं और चतुर्थ वर्ण को नीचे समझते हैं, वे भी मानते हैं कि लोक पावनी गंगाजी भी उसी भगवान के चरण अंगुष्ठ से निकली है। कवि गंगा को शूद्र वर्ण की बहन बनाकर चुपचाप बिना दूसरों की निन्दा किए दूसरों ही के शब्दों में अपने आश्रयदाता के वंश का उत्कर्ष दिखा गया।

Moral Stories No 10 : वानर और इन्द्र

शिवाजी महाराज के विरुद्ध जब मुगल सम्राट औरंगजेन की तरफ से लड़ाई के वास्ते शाइस्ता खाँ आया, तब ऐसा सुना जाता है, कि उसने यह श्लोक लिखकर शिवाजी के पास भेजा वानर! त्वं वने शायी पर्वतस्ते सदाक्षयः। वज्रपाणिरहं साक्षात् शास्तास्वयमुपागतः। अर्थात् हे वानर! तुम वन में रहते हो और पर्वत ही तुम्हारा आश्रय है। पर्वतों के पक्षों को काट डालने वाला साक्षात् वज्रपाणी इन्द्र ही, शासन करने वाला (शास्ता, शाइस्ता खाँ) बनकर मैं तुम पर चढ़ आया हूँ। शिवाजी ने इसका जो उत्तर दिया उसका तात्पर्य यह है कि पर्वत में रहने वाले, और वन के आश्रित वानर हनुमान ने बालकपन ही में इन्द्र को पराजित किया था और इन्द्र का दमन करने वाले रावण को खूब नाच नचाया था।

Moral Stories No 11 : इबादत कुबूल कर ली

जब कभी मिर्जा गालिब को शराब पीने को नहीं मिलती थी तो मुसल्ला (जिस पर बैठकर इबादत की जाती है) उठाकर मस्जिद में जा बैठते थे। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। मिर्जा ने मुसल्ला उठाया और मस्जिद में जा बैठे। उधर कुछ रईसजादे मिर्जा के दौलतखाने पर पहुँचे और श्रीमति मिर्जा से मिर्जा की बाबत पूछा।

श्रीमति मिर्जा ने मस्जिद की ओर को इशारा कर दिया। वे समझ गए और मस्जिद के बाहर से मिर्जा को शराब की बोतल दिखाई। मिर्जा उठे मुसल्ला झाड़ा और कहने लगे–’खुदा तूने मेरी इबादत मंजूर कर ली। अब मैं यहां बैठकर क्या करूँगा।’

 

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