Bachon ki Kahaniyan in Hindi बच्चों की कहानियाँ

हेलो दोस्तों आज फिर मै आपके लिए लाया हु बच्चों की कहानियाँ हिंदी में। आज लोग कहानियो को भूलते जा रहे है क्योकि whatsapp ,facebook की दौड में हम इन चीज़ो को खो रहे है। आप ये Bachon ki Kahaniyan in Hindi हर उम्र के बच्चो को लिए सही रहेंगी  । आईये पढ़ते है Bachon ki Kahaniyan जो की सिर्फ आपके बच्चो के लिए बहुत सी किताबो से ढूंढ ढूंढ कर लायी गयी है।

Bachon ki Kahaniyan in Hindi

Bachon ki Kahaniyan

Bachon ki Kahaniyan No 1: सच्चे मित्र

झील किनारे एक जंगल में हिरण, कछुआ और कठफोड़वा मित्र भाव से रहते थे। एक दिन एक शिकारी ने उनके पैरों के निशान देखकर उनके रास्ते में पड़ने वाले पेड़ पर एक फंदा लटका दिया और अपनी झोपड़ी में चला गया। थोड़ी ही देर में हिरण मस्ती में झूमता हुआ उधर से निकला और फंदे में फंस गया।

वह जोर से चिल्लाया – बचाओ। उसकी पुकार सुनकर कठफोड़वा के साथ कछुआ वहां आ गया। कठफोड़वा कछुए से बोला- मित्र तुम्हारे दांत मजबूत हैं। तुम इस फंदे को काटो। मैं शिकारी का रास्ता रोकता हूं।

जैसे ही कछुआ फंदा काटने में लग गया। उधर कठफोड़वा शिकारी की झोपड़ी की तरफ उड़ चला। उसने योजना बनाई कि जैसे ही शिकारी झोपड़ी से बाहर निकलेगा, वह उसे चोंच मारकर लहूलुहान कर देगा। उधर शिकारी ने भी जैसे ही हिरण की चीख सुनी तो समझ गया कि वह फंदे में फंस चुका है। वह तुरंत झोपड़ी से बाहर निकला और पेड़ की ओर लपका। लेकिन कठफोड़वे ने उसके सिर पर चोंच मारनी शुरू कर दी। शिकारी अपनी जान बचाकर फिर झोपड़ी में भागा और पिछवाड़े से निकलकर पेड़ की ओर बढ़ा।

लेकिन कठफोड़वा शिकारी से पहले ही पेड़ के पास पहुंच गया था। उसने देखा की कछुआ अपना काम कर चुका है, उसने हिरण और कछुए से कहा – मित्रों जल्दी से भागो। शिकारी आने ही वाला होगा।

यह सुनकर हिरण वहां से भाग निकला। लेकिन कछुआ शिकारी के हाथ लग गया। शिकारी ने कछुए को थैले में डाल लिया और बोला इसकी वजह से हिरण मेरे हाथ से निकल गया। आज इसको ही मारकर खाऊंगा।

हिरण ने सोचा उसका मित्र पकड़ा गया है। उसने मेरी जान बचाई थी, अब मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं उसकी मदद करूं। यह सोचकर वह शिकारी के रास्ते में आ गया।

शिकारी ने हिरण को देखा तो थैले को वहीं फेंककर हिरण के पीछे भागा। हिरण अपनी पुरानी खोह की ओर भाग छूटा। शिकारी उसके पीछे-पीछे था। भागते-भागते हिरण अपनी खोह में घुस गया। उसने सोचा एक बार शिकारी इस खोह में घुस गया तो उसका बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा।

थोड़ी ही देर में शिकारी खोह में पहुंचा। उसने सोचा अब हिरण भागकर कहां जाएगा। वह भी खोह के अंदर घुस गया। खोह के अंदर भूल-भुलैया जैसे रास्ते थे। शिकारी उन रास्तों में भटक गया।

हिरण दूसरे रास्ते से निकलकर थैले के पास जा पहुंचा और कछुए को आजाद कर दिया। उसके बाद वे तीनों मित्र वहां से सही-सलामत निकल गए।

 

Bachon ki Kahaniyan No 2: लोभी चिड़िया

बहुत समय पहले की बात है। एक चिड़िया ज्यादातर ऐसे राजमार्ग पर रहती थी, जहां से अनाज से लदी गा‍ड़ियां गुजरती थीं।

चावल, मूंग, अरहर के दाने इधर-उधर बिखरे पड़े रहते। वह जी भरकर दाना चुगती। एक दिन उसने सोचा- मुझे कुछ ऐसी तरकीब करनी चाहिए कि अन्य पक्षी इस रास्ते पर न आएं वरना मुझे दाना कम पड़ने लगेगा।

उसने दूसरी चिड़ियों से कहना शुरू कर दिया- राजमार्ग पर मत जाना, वह बड़ा खतरनाक है। उधर से जंगली हाथी-घोड़े व मारने वाले बैलों वाली गाड़ियां निकलती हैं। वहां से जल्दी से उड़कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचा भी नहीं जा सकता।

उसकी बात सुनकर पक्षी डर गए और उसका नाम अनुशासिका रख दिया।

एक दिन वह राजपथ पर चुग रही थी। जोर से आती गाड़ी का शब्द सुनकर उसने पीछे मुड़कर देखा- ‘अरे, अभी तो वह बहुत दूर है, थोड़ा और चुग लूं’, सोचकर दाना खाने में इतनी मग्न हो गई कि उसे पता ही नहीं लगा कि गाड़ी कब उसके नजदीक आ गई। वह उड़ न सकी और पहिए के नीचे कुचल जाने से मर गई।

थोड़ी देर में खलबली मच गई- अनुशासिका कहां गई, अनुशासिका कहां गई? ढूंढते-ढूंढते वह मिल ही गई।

अरे, यह तो मरी पड़ी है वह भी राजमार्ग पर! हमें तो यहां आने से रोकती थी और खुद दाना चुगने चली आती थी। सारे पक्षी कह उठे।

Bachon ki Kahaniyan No 3: साइकिल चोर

मीना अपने घर के बाहर दीपू का इंतज़ार कर रही है क्योंकि उन दोनों ने कुछ सामान लेने लाला की दुकान पर जाना है अपनी-अपनी साइकिलों पे।
मीना- दीपू तुम इतनी देर से क्यों आये हो? और…तुम्हारी साइकिल कहाँ है?

दीपू- मीना, मेरी साइकिल चोरी हो गयी।….रोज़ की तरह मैंने कल रात को भी अपनी साइकिल घर के बाहर खडी की थी लेकिन आज सुबह उठके देखा तो साइकिल वहां थी ही नहीं।

मीना- हो सकता है तुम्हारी साइकिल चाचाजी ले गयें हो।

दीपू- नहीं मीना, पिताजी घर पर ही हैं। जो हुआ सो हुआ क्या कर सकते हैं? चलो, लाला की दुकान से सामान लेने चलते हैं।

मीना, दीपू को अपनी साइकिल पर बिठा के लाला जी की दुकान पे पहुँची, वहां जाके उन्होंने देखा कि लाला अपने मुंशी को डांट रहा है, ‘मुंशी जी अब आप किसी काम के नहीं रहे ना आपसे दुकान संभलती है ना ही कुछ और। मेरी मानो तो नौकरी छोड़ के तीर्थ यात्रा पर निकल जाओ।’

दीपू- क्या हुआ लालाजी? आप मुंशी जी को क्यों डांट रहे हैं?
लालाजी- क्या बताऊँ दीपू बेटा? पिछले महीने मैंने इनको दो हज़ार रुपये दिए थे..उधार, साइकिल खरीदने के लिए…..ले आये थे ये साइकिल और कल चोरी भी करवा बैठे।

मुंशी जी- लालाजी मैंने तो साइकिल घर के आँगन में ही खडी की थी फिर पता नहीं चोरी कैसे हो गयी?

मीना- लालाजी…मुंशी जी…कल रात को दीपू की साइकिल भी चोरी हो गयी।…मुझे तो लगता है कि हमारे गाँव में कोई साइकिल चोर आया हुआ है। दीपू…मुंशी जी… आप दोनों को पुलिस में रिपोर्ट लिखानी चाहिए।

मुंशी जी- तुम ठीक कह रही हो मीना बेटी।

लालाजी-.तुम दोनों को अपनी साइकिल जंजीर से बांधकर रखनी चाहिए थी।

दीपू-काश! मैंने भी अपनी साइकिल जंजीर से बांधकर रखी होती। मीना मेरी मानो तो तुम अपनी साइकिल के लिए एक जंजीर खरीद ही लो।

मीना- एक नहीं दीपू….मैं दो जंजीरें खरीदूंगी।…मैं दूसरी जंजीर अपने भाई राजू की साइकिल के लिए खरीदूंगी।…..लालाजी, मैं जंजीर के पैसे कल आपको दे दूंगी।

लालाजी- मीना बिटिया, गाँव के सभी लोगों को बोल देना, वो भी अपनी-अपनी साइकिल की सुरक्षा के लिये जंजीर खरीदें…..मेरी दूकान से..ह्ह्ह ..ठीक है।

मीना लालाजी की दुकान से बाकी के सामान के साथ-साथ दो जंजीरें भी ले आयी और उसने रात को अपनी और राजू की साइकिल की साइकिल जंजीरों से बाँध कर घर के बाहर खडी की और अगली सुबह जब दीपू मीना के घर आया…..

दीपू- मीना, राजू क्या हुआ? तुम दोनों परेशान क्यों लग रहे हो?
राजू- किसी ने मेरी साइकिल के दोनों पहिये चुरा लिए।

मीना- हाँ दीपू….मेरी साइकिल की घंटी भी। गाँव में पक्का कोई चोर आया हुआ है।

दीपू, मीना और राजू लालाजी की दुकान के लिए घर से निकले। वो अभी थोड़ी दूर ही गए थे कि अचानक राजू ने कुछ देखा

दीपू- क्या हुआ राजू? तुम रुक क्यों गए?

राजू- दीपू, मीना ये देखो साइकिल के पहियों के निशान।पहियों के निशान आगे-पीछे नहीं बल्कि एक दम साथ-साथ हैं जैसे कि कोई साइकिल के दो पहिये धकेल के ले गया हो।

मीना- अरे हाँ! राजू ठीक कह रहा है।राजू,दीपू…हमें देखना होगा कि ये निशान कहाँ तक जा रहे हैं।

मीना, दीपू और राजू पहियों के निशान का पीछा करते-करते जंगल के पास पहुँच गए।

अनजान व्यक्ति- यहाँ क्या कर रहे हो तुम?

मीना- माफ कीजिये, हमने आपको पहचाना नहीं।

अनजान व्यक्ति- मैं….वो…मैं….यहाँ पास में रहता हूँ। तुम लोग जल्दी से वापस जाओ। ये जंगल बहुत खतरनाक है। बहुत खतरा है यहाँ।मेरी बात मानो और जाओ यहाँ से क्योंकि जंगल में शेर आया हुआ है।

मीना दीपू और राजू गाँव की तरफ वापस चले लेकिन थोड़ी दूर चलने के बाद मीना रुक गयी।

मीना बोली, ‘राजू…दीपू, कुछ गड़बड़ है। ये जंगल खतरनाक नहीं हो सकता। हमें किसी बड़े से इस बारे में बात करनी होगी।

दीपू- ठीक है मीना। मैं भाग के जाता हूँ और अपनी दादी जी से बात
करता हूँ।

मीना- ठीक है दीपू….मैं और राजू सुमी के घर जाते हैं….सुमी के पास एक किताब है जिसमें भारत के सभी जंगलों की सारी जानकारी लिखी हुयी है।
दीपू अपनी दादी के पास भाग कर गया जबकि मीना और राजू सुमी के घर गए। थोड़ी देर बाद तीनों फिर से मिले…..

मीना- दीपू मैं और राजू ने सुमी के घर पे जाके वो किताब पढी। उसमे साफ-साफ लिखा है कि हमारे जंगल में सिर्फ हिरन और खरगोश पाए जाते हैं।

दीपू- मेरी दादीजी भी यही कह रही थी।

मीना- इसका मतलब वो आदमी हमसे झूंठ बोल रहा था। दीपू, राजू…चलो…पुलिस के पास।

मीना,दीपू और राजू, मीना की माँ और पिताजी के साथ पुलिस स्टेशन गए और थाना अधीक्षक को सारी बात बताई। पुलिस ने तुरंत कार्यवाही करते हुए जंगल के उस हिस्से की तलाशी ली और उन्हें वहां से चार साइकिल और बहुत से पुर्जे बरामद हुए। उन्होंने चोर को भी गिरफ्तार कर लिया। ये वही आदमी था किसने मीना, दीपू और राजू को शेर की झूंठी खबर दी थी। बाद में पुलिस अधीक्षक ने पूरे गाँव के सामने मीना, दीपू और राजू को सम्मानित किया।

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Bachon ki Kahaniyan No 4: मछरो का बदला

मच्छर परिवार बहुत परेशान था। दिन पर दिन महंगाई बढ़ती जा रही थी और परिवार के सब प्राणी अब तक बेरोजगार थे। आखिर मांग-मांग कर कब तक गाड़ी खिचती। फिर कोई कब तक किसी को देता रहेगा।

मच्छरी ने अपने पति को सलाह दी कि ‘क्यों न कोई धंधा चालू कर दिया जाए, बैठे-बैठे कौन खिलाएगा। बच्चे भी बड़े हो रहे हैं। दस बच्चों को मिलाकर हम लोग बारह लोग हैं, धंधा करेंगे तो घर के सब लोग ही व्यापार संभाल लेंगे और नौकरों की भी जरूरत नहीं पड़ेगी।’

‘सलाह तो तुम्हारी उचित है परंतु कौन-सा धंधा करें, धंधे में पूंजी लगती है जो हमारे पास है नहीं – मच्छर बोला।

‘ऐसे बहुत से धंधे हैं जिसमें थोड़े-सी पूंजी में ही काम चल जाता है। क्यों न हम पान की दुकान खोल लें। पूंजी भी नहीं लगेगी। सुबह थोक सामान ले आएंगे और शाम को बिक्री में से उधारी चुका देंगे।’ – मच्छरी ने तरीका सुझाया।

‘मगर क्या गारंटी की दुकान चल ही जाएगी?’ – मच्छर बोला।

हम लोग पान के साथ तंबाकू, गुटका किमाम इत्यादि सब सामान रखेंगे, इन वस्तुओं की बहुत डिमांड है, बिक्री तो होगी ही।’ – मच्छरी बोली।’

‘बात तो सही कह रही हो। कल से दुकान प्रारंभ कर देते हैं।’ इतना कहकर वह बाजार से दुकान का सब सामान आवश्यकतानुसार ले आया। दुकान चालू कर दी गई। वह और उसकी पत्नी दुकान पर बैठते। बच्चे भी बैठने लगे। बढ़िया पान लगते, तंबाकू और गुटखों के पैकेट बनते और देखते ही देखते दुकान का सारा सामान बिक जाता। मजे से खर्च चलने लगा।

एक दिन मच्छर ने महसूस किया कि उसके बच्चे दिन भर खांसते रहते हैं और कमजोर होते जा रहे हैं। उसने कारण जानने कि कोशिश की तो मालूम पड़ा कि बच्चे जब भी दुकान पर बैठते हैं, लगातार तंबाकू और गुटखा खाते रहते हैं। मच्छर परेशान हो गया। बच्चों को समझाया कि बेटे यह तंबाकू बहुत हानिकारक होती है, अधिक खाने से जान भी जा सकती है। किंतु बच्चे नहीं माने।

ग्राहक आते खुद तो पान-तंबाकू खाते ही, मच्छर पुत्रों को भी प्रेरित करते। आखिरकार एक-एक कर मच्छर के दसों पुत्र स्वर्गवासी हो गए। मच्छर ने गुस्से के मारे दुकान बंद कर दी।

आखिर उसके बच्चों की मृत्यु के जबाबदार इंसान ही तो थे, क्योंकि उनकी प्रेरणा से ही भोले-भाले बच्चे तंबाकू खाना सीखे थे।

ऐसा सोचकर मच्छर ने खुले आम घोषणा कर दी कि आगे से मच्छर‌ अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए कोई काम नहीं करेंगे सिर्फ आदमियों का खून चूसेंगे। तब से आज तक मच्छर इंसानों का खून चूस रहा है।

 

Bachon ki Kahaniyan No 5: नन्ही चिड़िया की होली

एक दिन एक चिड़िया के मन में खयाल आया कि सारे लोग होली पर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, तो इस बार वह भी होली मनाएगी। चिड़िया ने पोखर में जाकर देखा तो पानी नहीं था।

गर्मियों की शुरुआत में ही सूखे पोखर को देखकर चिड़िया को लगा कि रंग बने तो ऐसे जिन्हें छुड़ाने में ज्यादा पानी नहीं लगे तो अच्छा।

अपना ही खयाल चिड़िया को जम गया कि वह वैसे रंग से होली नहीं खेलेगी, जिससे सब खेलते हैं। वह अपना रंग बनाएगी। पर मुश्किल थी। चिड़िया के सामने मुश्किल यह थी कि वह रंग कहां से लाएगी। तभी उसे याद आई टेसू के पेड़ की।

टेसू के पेड़ पर तो कितने ही रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं। क्यों न टेसू (पलाश) के इन फूलों का रंग ले लें। चिड़िया ने टेसू के पास जाकर अपनी बात कही। एक भरे-पूरे पेड़ को अपने फूल देने में क्या हर्जा होता। उसने चिड़िया को टप्प से दो फूल दे दिए।

अब चिड़िया की रंग की दिक्कत भी दूर हो गई। उसने टेसू के फूलों को थोड़े से पानी में भिगोकर रंग बनाया। दूसरे दिन जब रंग बन गया तो चिड़िया बहुत खुश हुई। उसके रंग में से अच्छी महक भी आ रही थी।

चिड़िया अब तैयार थी होली खेलने के लिए। अब चिड़िया चाहती थी कि वह जंगल से थोड़ी दूर रहने वाले किसान के बेटे पुन्नू को रंग लगाए।

पुन्नू को इसलिए क्योंकि वह चिड़िया के खाने के लिए कुछ अनाज के दाने बापू की नजर चुराकर बिखरा देता था। चिड़िया ने चोंच में थोड़ा-सा रंग भरा और ले जाकर पुन्नू पर डाल दिया।

पुन्नू को पता भी नहीं चला, बस उसे इत्ता भर लगा कि उसके ऊपर कुछ गिरा है। उसने ऊपर देखा कि एक चिड़िया चहक रही है। पर चिड़िया इससे बहुत खुश होकर गा रही थी- होली है, भई होली है।

Bachon ki Kahaniyan No 6: बीरबल की चतुराई

बहुत पुराने समय की कहानी है। एक बार अकबर बादशाह का दरबार लगा था। दरबार में सारे दरबारी, पंडित, मंत्री और सामान्यजन भी बैठे हुए थे। उस समय दरबार में हंसी-ठिठोली का माहौल छाया हुआ था। सब उसी में मशगूल थे। अकबर भी बहुत खुश नजर आ रहे थे।

लेकिन एक बात थी जो अकबर को हमेशा ही खटकती रहती थी, वह यह कि राजदरबार के सभी दरबारी बीरबल के फैसले से बहुत जलते थे। बीरबल के आगे उनके फैसले की एक न चलती थी।

इसलिए उन्हें बीरबल से बहुत ईर्ष्या थी, लेकिन वह बीरबल के सामने बोलने की हिम्मत जुटा नहीं पाते थे। बीरबल की दरबार में अनुपस्थिति होने पर अकबर हमेशा बीरबल की प्रशंसा के पुल बांधते रहते थे।

जब बीरबल दरबार में अनुपस्थित रहता था तब दरबारी बीरबल के प्रति द्वेष का भाव रखकर अकबर बादशाह को भड़काने का काम करते रहते थे। लेकिन अकबर को बीरबल की चतुराई पर बहुत भरोसा था। दरबार में चल रही हंसी-ठिठोली के बीच अकबर ने दरबारियों की परीक्षा लेने का मन ही मन विचार बनाया।

उन्होंने सभी दरबारियों से शांत होने को कहा, और बोले- ‘ध्यान से सुनो, तुम सभी को मेरे एक सवाल का जवाब देना है। जो इस सवाल का जवाब सही देगा और उसे साबित कर दिखाएगा उसे मैं बीरबल की जगह अपना मंत्री नियुक्त कर दूंगा।’

अकबर ने कहा- ‘देखो तुम सबके लिए बहुत बढ़िया अवसर हाथ आया है। इससे तुम अपने मन के सभी अरमान पूरे कर सकते हो।’

यह सुनकर सभी दरबारी बहुत खुश हुए। अकबर ने फिर अपना सवालिया बाण छोड़ा और कहा, ‘देखो, तुम्हें यह साबित करना है कि मनुष्य द्वारा निर्मित चीज ज्यादा अच्छी होती है या कुदरत के द्वारा निर्मित।’

अकबर के मुंह से सवाल सुनते ही सभी दरबारी सोच में पड़ गए। अकबर ने उन्हें पूरे एक हफ्ते का समय दिया और कहा अगले शुक्रवार को जब दरबार लगेगा तो तुम्हें खुद को सबसे श्रेष्ठ साबित करना है। सब दरबारी अपने-अपने घर को हो लिए। सभी इसी सोच में डूबे थे कि इसबात को कैसे साबित किया जाए। लेकिन किसी में इतनी चतुराई भी तो नहीं थी जितनी कि बीरबल में।

सारे दरबारियों में से किसी को भी इस सवाल का हल नहीं मिल पाया। तय समय के अनुसार फिर शुक्रवार के दिन राजदरबार लगा। सभी लोग अपने-अपने आसन पर विराजमान हो गए। हालांकि बीरबल सबसे पहले पहुंच गए थे।

अब राजा ने एक-एक कर सभी से सवाल का जवाब मांगा, पर सभी दरबारी, मंत्री, पंडित अपनी गर्दन झुकाकर खड़े हो गए।

अब अकबर से रहा न गया। उन्होंने बीरबल से पूछा। बीरबल ने बड़ा ही चतुराई भरा जवाब दिया, ‘जहांपनाह! इसमें कौन-सी बड़ी बात है। इसका जवाब बहुत ही आसान है। अभी लीजिए’ कह कर वह अपने कुर्सी से उठकर बाहर चले गए।

यह देख दरबारियों में खुसर-फुसर शुरू हो गई। एक कहने लगा- ‘अरे यह क्या? बीरबल तो अकबर को जवाब देने के बजाय दरबार से उठकर बाहर चले गए।’ अकबर आराम से अपने सिंहासन पर विराजमान हो गए और बीरबल की प्रतीक्षा करने लगे।

तभी एक कारागीर हाथों में पत्थरों से निर्मित एक फूलों का बड़ा-सा गुलदस्ता लेकर आया और राजा को गुलदस्ता देकर जाने लगा। राजा ने गुलदस्ता हाथ में लिया और उसकी सुंदरता देखकर गुलदस्ते की बहुत तारीफ की। और अपने खजाने के मंत्री को आदेश दिया कि ‘इस कारीगर को एक हजार स्वर्ण मुद्राएं इनाम के तौर पर दी जाएं।’

इनाम लेकर कारीगर खुशी-खुशी बाहर चला गया तभी अकबर के बगीचे का माली आया और एक बड़ा-सा गुलदस्ता को राजा को भेंट किया। इतना सुंदर गुलदस्ता देखकर राजा उसकी भी तारीफ किए बिना न रह सका। अकबर ने फिर अपने मंत्री को आदेश दिया और कहा- ‘माली को सौ चांदी की मुद्राएं इनाम के तौर पर दी जाए।’

बस फिर क्या था, राजा का इतना आदेश हुआ कि बीरबल चतुराई भरा मुंह बनाकर दरबार में दाखिल हुए। पहले तो अकबर बीरबल पर बहुत नाराज हुए और कहने लगे, ‘शायद सभी दरबारी ठीक ही कहते हैं! मैंने ही तुम्हें जरूरत से ज्यादा तवज्जों दी है। इसीलिए तुम यूं बीच में ही राज दरबार छोड़कर चले गए और मेरे सवाल का जवाब भी नहीं दिया।’

अकबर का इतना कहना ही हुआ कि बीरबल ने अकबर को प्रणाम करते हुए कहा – ‘जहांपनाह, आप कुछ भूल रहे हैं। अभी-अभी जो दो कारीगर यहां उपस्थिति देकर गए हैं। उन्हें आपके पास भेजने के लिए ही मैं बाहर गया था। आपने यह कैसा न्याय किया, दो कारीगरों के साथ। एक को हजार स्वर्ण मुद्राएं और दूसरे को सिर्फ सौ चांदी की मुद्राएं।’

अकबर ने जवाब दिया- ‘असली फूलों का गुलदस्ता तो दो दिनों में ही मुरझा जाएगा और यह पत्थर से निर्मित गुलदस्ता कभी भी खराब नहीं होगा इसीलिए।’

अकबर का इतना कहना ही था कि बीरबल ने अपना चतुराई भरा बाण छोड़ा और बोले- ‘तो फिर आप भी मान गए ना कि मनुष्य द्वारा निर्मित वस्तु कुदरत के द्वारा निर्मित वस्तु से ज्यादा अच्छी है।’

अब जहांपनाह की बोलती ही बंद हो गई। वे बीरबल की चतुराई देखकर मन ही मन मुस्काएं और फिर से अपने सिंहासन पर बैठ गए।

सिंहासन पर बैठकर अकबर ने फिर एक बार बीरबल की खुले दिल से तारीफ की और सब दरबारी अपना मुंह लटका कर अपने-अपने कुर्सी पर बैठ गए। एक बार फिर बीरबल अपनी चतुराई दिखाने में कामयाब हो गए।

Bachon ki Kahaniyan No 7: कौआ उड़ रहा है

जन्म के समय उनका राशि का नाम ‘र’ से निकला था इसीलिए रुद्र नाम रखा गया है। वैसे तो भगवान रुद्र के समान वे क्रोधी नहीं हैं परंतु दिमाग के बड़े तेज हैं स्मरण‌ शक्ति अद्भुत, कहानियां सुनने के शौकीन।

कितनी भी सुनाओ, एक कहानी और की फरमाइश कभी पूरी नहीं होती है, दादी परेशान दादा परेशान। दादी के पीछे लगे रहते। रात को सोने के पहले शुरू हो जाते। दादी एक कहानी सुनाती तो कहते एक और, दूसरी सुनाती तो कहते दादी एक और। दादी कहती- और कितनी सुनेगा?

तो जबाब मिलता बस दादी दस कहानियां सुना दो फिर सो जाऊंगा। जैसे तैसे दादी दस कहानियां पूरी करतीं तो रुद्रभाई कहते दादी एक और… अब दादी क्या करें?

पैंसठ पार हो चुकीं दादी की स्मृति का खजाना खाली हॊ चुका होता।

बचपन में जितनी कहानियां सुनी पढ़ी थीं, एक-एक कर सब सुना चुकी थी, अब नई कहानियां कहां से पैदा करें और फिर क्या है दादी आशु कहानीकार हो जातीं, जैसे- ‘एक पहाड़ था, उसको बहुत जोर से भूख लगी। घर में खाने को कुछ नहीं था तो उसने नदी से कहा- नदी बहन‌, नदी बहन, थोड़ा आटा उधार दे दो। नदी ने आटा उधार दे दिया, किंतु एक शर्त रख दी कि उनका खाना भी पहाड़ बनाएगा। पहाड़ भाई अपना खाना भी मुश्किल से बना पाते थे इत्यादि………. ।’

ऐसे ही कहानी पूरी हो जाती। रुद्र भाई कहते अब एक और तो दादी फिर शुरू हो जातीं, आखिर आशु कहानीकार जो ठहरीं।
‘एक उल्लू था एक दिन उसकी बोलती बंद हो गई। वह एक डॉक्टर के यहां चेक कराने गया।

डॉक्टर ने कहा की तुम्हारे गले में फेरनजाइटिस हो गया है। दवा खाने के बाद जब उसे लाभ नहीं हुआ तो फिर वह डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर बोला- अब तुम्हें लेरनजाइटिस हो गया है। उल्लू फिर से दवा खाता है किंतु इस बार भी उसे कोई लाभ नहीं होता है तो वह फिर डॉक्टर के पास जाकर उसे डांट पिलाता है।

डॉक्टर कहता- सॉरी! जब इन दवाइयों का कोई असर नहीं हुआ है, तो जरूर टांसलाईटिस हुआ होगा। ऐसे करते-करते कहानी समाप्त होने को आती है, इसके पहले ही दादीजी सो जातीं हैं। रुद्र भाई को मजबूरी में सो जाना पड़ता है। आखिर थक-हार कर दूसरे दिन दादी रुद्र को सलाह देती हैं कि अब दादा जी से कहानियां सुनो, उन्हें बहुत-सी कहानियां आतीं हैं।

अब दादाजी की डयूटी लग जाती कहानियों की। यूं तो सत्तर पार हो चुके दादाजी का दिमागी कोटा किसी मालगोदाम की तरह भरापूरा रहा है। एक बार में पच्चीस-तीस कहानियां तक सुना डालते किंतु इसके बाद क्या करें, दादाजी सोने लगते परंतु रुद्र भैया को क्या कहें, एक और दादाजी बस…. फिर नहीं कहूंगा की रट लगाते।

परेशान दादाजी बोले ठीक है तो सुनो ‘एक कौआ था, उसको प्यास लगी, पानी की तलाश में वह आकाश में निकल पड़ा कि कहीं पानी दिखे तो नीचे जाकर प्यास‌ बुझाएं। कौआ उड़ता रहा कौआ उड़ता रहा, कौआ उड़ता रहा

‘आगे क्या हुआ दादाजी?’ – रुद्र ने पूछा।

‘कौआ उड़ रहा है, अभी उसको पानी कहीं नहीं दिखा है।’

‘मगर कब तक उड़ता रहेगा?’

‘जब तक पानी नहीं मिलेगा।’

‘मगर कब पानी मिलेगा?’

‘देखो अब कब मिलता है, इस साल पानी कम गिरा है न‌, धरती पर पानी बहुत कम है तो कौए को दिख भी नहीं रहा है।’

‘अरे यार दादाजी तो मैं सोता हूं जब पानी मिल जाए तो मुझे बता देना।’

‘ठीक है।’

दूसरे दिन रुद्र ने उठते ही पूछा- ‘दादाजी, कौए को पानी मिला?’

‘नहीं मिला बेटा, अभी तक नहीं मिला।’

‘अरे यार’

रात को सोने के पहले- वो दादाजी कहानी, ‘कौए का क्या हुआ… ‘ रुद्र भैया ने गुहार लगाई।

‘अभी तो उड़ रहा है रुद्र भाई पानी नहीं मिला है।’

अब रुद्र भैया कहानी नहीं सुनते यह जरूर पूछते हैं कौए का क्या हुआ दादाजी।

‘अभी उड़ रहा है’ – दादाजी का यही जबाब होता।

आजकल‌ रुद्र भाई अपने पापा-मम्मी के साथ दूसरे शहर में हैं। हर दिन उनका फोन आता है- ‘दादाजी कौए का क्या हुआ?

‘अभी तो उड़ रहा है भाई’ – दादाजी वही जबाब होता।

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Bachon ki Kahaniyan No 8: गोपाल और मिट्ठू

बंदरों के तमाशे तो तुमने बहुत देखे होंगे। मदारी के इशारों पर बंदर कैसी-कैसी नकलें करता है, उसकी शरारतें भी तुमने देखी होंगी। तुमने उसे घरों से कपड़े उठाकर भागते देखा होगा। पर आज हम तुम्हें एक ऐसा हाल सुनाते हैं, जिससे मालूम होगा कि बंदर लड़कों से दोस्ती भी कर सकता है।

कुछ दिन हुए लखनऊ में एक सर्कस कंपनी आई थी। उसके पास शेर, भालू, चीता और कई तरह के और भी जानवर थे। इनके सिवा एक बंदर मिट्‍ठू भी था।

लड़कों के झुंड-के-झुंड रोज इन जानवरों को देखने आया करते थे। मिट्‍ठू ही उन्हें सबसे अच्‍छा लगता। उन्हीं लड़कों में गोपाल भी था। वह रोज आता और मिट्‍ठू के पास घंटों चुपचाप बैठा रहता। उसे शेर, भालू, चीते आदि से कोई प्रेम न था।

वह मिट्‍ठू के लिए घर से चने, मटर, केले लाता और खिलाता। मिट्‍ठू भी उससे इतना हिल गया था कि बगैर उसके खिलाए कुछ न खाता। इस तरह दोनों में बड़ी दोस्ती हो गई।

एक दिन गोपाल ने सुना कि सर्कस कंपनी वहां से दूर शहर जा रही है। यह सुनकर उसे बड़ा रंज हुआ। वह रोता हुआ अपनी मां के पास गया और बोला, ‘अम्मा, मुझे एक अठन्नी दो, मैं जाकर मिट्‍ठू को खरीद लाऊं। वह न जाने कहां चला जाएगा। फिर मैं उसे कैसे देखूंगा? वह भी मुझे न देखेगा तो रोएगा।’

मां ने समझाया, ‘बेटा, बंदर किसी को प्यार नहीं करता। वह तो बड़ा शैतान होता है। यहां आकर सबको काटेगा, मुफ्‍त में उलाहने सुनने पड़ेंगे। लेकिन लड़के पर मां के समझाने का कोई असर न हुआ। वह रोने लगा। आखिर मां ने मजबूर होकर उसे अठन्नी निकालकर दे दी।

अठन्नी पाकर गोपाल मारे खुशी के फूल उठा। उसने अठन्नी को मिट्‍टी से मलकर खूब चमकाया, फिर मिट्‍ठू को खरीदने चला। लेकिन मिट्‍ठू वहां दिखाई न दिया। गोपाल का दिल भर आया – मिट्‍ठू कहीं भाग तो नहीं गया?

मालिक को अठन्नी दिखाकर गोपाल बोला, ‘अबकी बार आऊंगा तो मिट्‍ठू को तुम्हें दे दूंगा।’

गोपाल निराश होकर चला आया और मिट्ठू को इधर-उधर ढूंढने लगा। वह उसे ढूंढने में इतना मगन था कि उसे किसी बात की खबर न थी। उसे बिल्कुल न मालूम हुआ कि वह चीते के कठघरे के पास आ गया था। चीता भीतर चुपचाप लेटा था।

गोपाल को कठघरे के पास देखकर उसने पंजा बाहर निकाला और उसे पकड़ने की कोशिश करने लगा। गोपाल तो दूसरी तरफ ताक रहा था। उसे क्या खबर थी कि चीते का तेज पंजा उसके हाथ के पास पहुंच गया है। करीब इतना था कि चीता उसका हाथ पकड़कर खींच ले कि मिट्‍ठू न मालूम कहां से आकर उसके पंजे पर कूद पड़ा और पंजे को दांतों से काटने लगा।

चीते ने दूसरा पंजा निकाला और उसे ऐसा घायल कर दिया कि वह वहीं गिर पड़ा और जोर-जोर से चीखने लगा। मिट्‍ठू की यह हालत देखकर गोपाल भी रोने लगा।

दोनों का रोना सुनकर लोग दौड़ पड़े, पर देखा कि मिट्ठू बेहोश पड़ा है और गोपाल रो रहा है। मिट्‍ठी का घाव तुरंत धोया गया और मरहम लगवाया गया। थोड़ी देर में उसे होश आ गया। वह गोपाल की ओर प्यार की आंखों से देखने लगा, जैसे कह रहा हो कि अब क्यों रोते हो? मैं तो अच्छा हो गया।

कई दिन मिट्‍ठू की मरहम-पट्‍टी होती रही और आखिर वह बिल्कुल अच्छा हो गया। गोपाल अब रोज आता और उसे रोटियां खिलाता। आखिर कंपनी के चलने का दिन आया। गोपाल बहुत दुखी था। वह मिट्‍ठू के कठघरे के पास खड़ा आंसू-भरी आंख से देख रहा था कि मालिक ने आकर कहा, ‘अगर मिट्ठू तुमको मिल जाए तो तुम क्या करोगे?’

गोपाल ने कहा, ‘मैं उसे अपने साथ ले जाऊंगा, उसके साथ-साथ खेलूंगा, उसे अपनी थाली में खिलाऊंगा, और क्या।’

मालिक ने कहा, ‘अच्छी बात है, मैं बिना तुमसे अठन्नी लिए ही इसे तुम्हें देता हूं। गोपाल को जैसे कोई राज मिल गया। उसने मिट्‍ठू को गोद में उठा लिया, पर मिट्‍ठू नीचे कूद पड़ा और उसके पीछे-पीछे चलने लगा। दोनों खेलते-कूदते घर पहुंच गए।

 

Bachon ki Kahaniyan No 9: तीन मछलियां

एक बड़ा जलाशय था। जलाशय में पानी गहरा होता है, इसलिए उसमें काई तथा मछलियों का प्रिय भोजन जलीय सूक्ष्म पौधे उगते हैं। ऐसे स्थान मछलियों को बहुत रास आते हैं। उस जलाशय में भी बहुत-सी मछलियां आकर रहती थी। अंडे देने के लिए तो सभी मछलियां उस जलाशय में आती थी। वह जलाशय आसानी से नजर नहीं आता था।

उसी में तीन मछलियों का झुंड रहता था। उनके स्वभाव भिन्न थे। पिया नामक मछली संकट आने के लक्षण मिलते ही संकट टालने का उपाय करने में विश्वास रखती थी। रिया कहती थी कि संकट आने पर ही उससे बचने का यत्न करो। चिया का सोचना था कि संकट को टालने या उससे बचने की बात बेकार हैं करने कराने से कुछ नहीं होता जो किस्मत में लिखा है, वह होकर रहेगा।

एक दिन शाम को मछुआरे नदी में मछलियां पकड़ कर घर जा रहे थे। बहुत कम मछलियां उनके जालों में फंसी थी। अतः उनके चेहरे उदास थे। तभी उन्हें झाडियों के ऊपर मछलीखोर पक्षियों का झुंड जाता दिखाई दिया। सबकी चोंच में मछलियां दबी थी। वे चौंके।

एक ने अनुमान लगाया दोस्तों! लगता हैं झाडियों के पीछे नदी से जुड़ा जलाशय हैं, जहां इतनी सारी मछलियां पल रही हैं।

मछुआरे पुलकित होकर झाडियों में से होकर जलाशय के तट पर आ निकले और ललचाई नजर से मछलियों को देखने लगे।

एक मछुआरा बोला अहा! इस जलाशय में तो मछलियां भरी पड़ी हैं। आज तक हमें इसका पता ही नहीं लगा।

यहां हमें ढेर सारी मछलियां मिलेंगी। दूसरा बोला।

तीसरे ने कहा आज तो शाम घिरने वाली हैं। कल सुबह ही आकर यहां जाल डालेंगे।

इस प्रकार मछुआरे दूसरे दिन का कार्यक्रम तय करके चले गए। तीनों मछलियों ने मछुआरे की बात सुन ली थी।

पिया मछली ने कहा साथियों! तुमने मछुआरे की बात सुन ली। अब हमारा यहां रहना खतरे से खाली नहीं हैं। खतरे की सूचना हमें मिल गई हैं। समय रहते अपनी जान बचाने का उपाय करना चाहिए। मैं तो अभी ही इस जलाशय को छोडकर नहर के रास्ते नदी में जा रही हूं। उसके बाद मछुआरे सुबह आएं, जाल फेंके, मेरी बला से। तब तक मैं तो बहुत दूर अठखेलियां कर रही होऊंगी।

रिया मछली बोली तुम्हें जाना हैं तो जाओ, मैं तो नहीं आ रही। अभी खतरा आया कहां हैं, जो इतना घबराने की जरुरत हैं। हो सकता है संकट आए ही न। उन मछुआरों का यहां आने का कार्यक्रम रद्द हो सकता है, हो सकता हैं रात को उनके जाल चूहे कुतर जाएं, हो सकता है, उनकी बस्ती में आग लग जाए। भूचाल आकर उनके गांव को नष्ट कर सकता हैं या रात को मूसलाधार वर्षा आ सकती हैं और बाढ़ में उनका गांव बह सकता है। इसलिए उनका आना निश्चित नहीं है। जब वह आएंगे, तब की तब सोचेंगे। हो सकता है मैं उनके जाल में ही न फंसूं।

चिया ने भाग्यवादी बात कही भागने से कुछ नहीं होने का। मछुआरों को आना है तो वह आएंगे। हमें जाल में फंसना है तो हम फंसेंगे। किस्मत में मरना ही लिखा है तो क्या किया जा सकता है?

इस प्रकार पिया तो उसी समय वहां से चली गई। रिया और चिया जलाशय में ही रही। भोर हुई तो मछुआरे अपने जाल को लेकर आए और लगे जलाशय में जाल फेंकने और मछलियां पकड़ने। रिया ने संकट को आए देखा तो लगी जान बचाने के उपाय सोचने। उसका दिमाग तेजी से काम करने लगा। आस-पास छिपने के लिए कोई खोखली जगह भी नहीं थी। तभी उसे याद आया कि उस जलाशय में काफी दिनों से एक मरे हुए ऊदबिलाव की लाश तैरती रही हैं। वह उसके बचाव के काम आ सकती है।

जल्दी ही उसे वह लाश मिल गई। लाश सड़ने लगी थी। रिया लाश के पेट में घुस गई और सड़ती लाश की सड़ाध अपने ऊपर लपेटकर बाहर निकली। कुछ ही देर में मछुआरे के जाल में रिया फंस गई। मछुआरे ने अपना जाल खींचा और मछलियों को किनारे पर जाल से उलट दिया। बाकी मछलियां तो तड़पने लगीं, परन्तु रिया दम साधकर मरी हुई मछली की तरह पड़ी रही। मछुआरे को सडांध का भभका लगा तो मछलियों को देखने लगा। उसने निर्जीव पड़ी रिया को उठाया और सूंघा आक! यह तो कई दिनों की मरी मछली हैं। सड़ चुकी है। ऐसे बड़बड़ाकर बुरा-सा मुंह बनाकर उस मछुआरे ने रिया को जलाशय में फेंक दिया।

रिया अपनी बुद्धि का प्रयोग कर संकट से बच निकलने में सफल हो गई थी। पानी में गिरते ही उसने गोता लगाया और सुरक्षित गहराई में पहुंचकर जान की खैर मनाई।

चिया भी दूसरे मछुआरे के जाल में फंस गई थी और एक टोकरे में डाल दी गई थी। भाग्य के भरोसे बैठी रहने वाली चिया ने उसी टोकरी में अन्य मछलियों की तरह तड़प-तड़पकर प्राण त्याग दिए।

Bachon ki Kahaniyan No 10: अक्ल बिना नकल

एक देश में अकाल पड़ा। पानी की कमी से सारी फसलें मारी गईं। देशवासी अपने लिए एक वक्त की रोटी भी नहीं जुटा पाते थे। ऐसे समय कौवों को रोटी के टुकड़े मिलने बंद हो गए। वे जंगल की ओर उड़ चले।

उनमें से एक कौवा-कौवी ने पेड़ पर अपना बसेरा कर लिया। उस पेड़ के नीचे एक तालाब था जिसमें जलकौवा रहता था। वह सारे दिन पानी में खड़े रहकर कभी मछलियां पकड़ता, कभी पानी की सतह पर पंख फैलाकर लहरों के साथ नाचता नजर आता।

पेड़ पर बैठे कौए ने सोचा- मैं तो भूख से भटक रहा हूं और यह चार-चार मछलियां एकसाथ गटक कर आनंद में है। यदि इससे दोस्ती कर लूं तो मुझे मछलियां खाने को जरूर मिलेंगी।

वह उड़कर तालाब के किनारे गया और शहद-सी मीठी बोली में कहने लगा- मित्र, तुम तो बहुत चुस्त-दुरुस्त हो। एक ही झटके में मछली को अपनी चोंच में फंसा लेते हो, मुझे भी यह कला सिखा दो।

तुम सीखकर क्या करोगे? तुम्हें मछलियां ही तो खानी हैं। मैं तुम्हारे लिए पकड़ दिया करूंगा।

उस दिन के बाद से जलकौवा ढेर सारी मछलियां पकड़ता, कुछ खुद खाता और कुछ अपने मित्र के लिए किनारे पर रख देता। कौवा उन्हें चोंच में दबाकर पेड़ पर जा बैठता और कौवी के साथ स्वाद ले लेकर खाता।

कुछ दिनों के बाद उसने सोचा- मछली पकड़ने में है ही क्या! मैं भी पकड़ सकता हूं। जलकौवे की कृपा पर पलना ज्यादा ठीक नहीं।

ऐसा मन में ठानकर वह पानी में उतरने लगा।

अरे दोस्त! यह क्या कर रहे हो? तुम पानी में मत जाओ। तुम थल कौवा हो, जल कौवा नहीं। तुम जल में मछली पकड़ने के दांवपेंच नहीं जानते, मुसीबत में पड़ जाओगे।

यह तुम नहीं, तुम्हारा अभिमान बोल रहा है। मैं अभी मछली पकड़कर दिखाता हूं। कौवे ने अकड़ कर कहा।

कौवा छपाक से पानी में घुस गया, पर ऊपर न निकल सका। तालाब में काई जमी हुई थी। काई में छेद करने का उसे अनुभव न था। उस बेचारे ने उसमें छेद करने की को‍शिश भी की, ऊपर से थोड़ी-सी चोंच दिखाई दे रही थी, पर निकलने के लिए बड़ा-सा छेद होना था। नतीजतन उसका अंदर ही अंदर दम घुटने लगा और वह मर गया।

कौवी कौवे को ढूंढती हुई जलकौवे के पास आई और अपने पति के बारे में पूछने लगी।

बहन, कौवा मेरी नकल करता हुआ पानी में मछली पकड़ने उतर पड़ा और प्राणों से हाथ धो बैठा। उसने यह नहीं सोचा कि मैं जलवासी हूं और जमीन पर भी चल सकता हूं, पर वह केवल थलवासी है। मैंने उसे बहुत समझाया, पर उसने एक न सुनी।

 

Bachon ki Kahaniyan No 11: ईमानदारी की जीत

चारों ओर सुंदर वन में उदासी छाई हुई थी। वन को अज्ञात बीमारी ने घेर लिया था। वन के लगभग सभी जानवर इस बीमारी के कारण अपने परिवार का कोई न कोई सदस्य गवां चुके थे। बीमारी से मुकाबला करने के लिए सुंदर वन के राजा शेर सिंह ने एक बैठक बुलाई।

बैठक का नेतृत्व खुद शेर सिंह ने किया। बैठक में गज्जू हाथी, लंबू जिराफ, अकड़ू सांप, चिंपू बंदर, गिलू गिलहरी, कीनू खरगोश सहित सभी जंगलवासियों ने हिस्सा लिया। जब सभी जानवर इकठ्ठे हो गए, तो शेर सिंह एक ऊंचे पत्थर पर बैठ गया और जंगलवासियों को संबोधित करते हुए कहने लगा, ‘भाइयों, वन में बीमारी फैलने के कारण हम अपने कई साथियों को गवाँ चुके हैं। इसलिए हमें इस बीमारी से बचने के लिए वन में एक अस्पताल खोलना चाहिए, ताकि जंगल में ही बीमार जानवरों का इलाज किया जा सके।’

इस पर जंगलवासियों ने एतराज जताते हुए पूछा कि अस्पताल के लिए पैसा कहां से आएगा और अस्पताल में काम करने के लिए डॉक्टरों की जरूरत भी तो पड़ेगी? इस पर शेर सिंह ने कहा, यह पैसा हम सभी मिलकर इकठ्ठा करेंगे।

यह सुनकर कीनू खरगोश खड़ा हो गया और बोला, ‘महाराज! मेरे दो मित्र चंपकवन के अस्पताल में डॉक्टर हैं। मैं उन्हें अपने अस्पताल में ले आऊंगा।’

इस फैसले का सभी जंगलवासियों ने समर्थन किया। अगले दिन से ही गज्जू हाथी व लंबू जिराफ ने अस्पताल के लिए पैसा इकठ्ठा करना शुरू कर दिया।

जंगलवासियों की मेहनत रंग लाई और जल्दी ही वन में अस्पताल बन गया। कीनू खरगोश ने अपने दोनों डॉक्टर मित्रों वीनू खरगोश और चीनू खरगोश को अपने अस्पताल में बुला लिया।

राजा शेर सिंह ने तय किया कि अस्पताल का आधा खर्च वे स्वयं वहन करेंगे और आधा जंगलवासियों से इकठ्ठा किया जाएगा।

इस प्रकार वन में अस्पताल चलने लगा। धीरे-धीरे वन में फैली बीमारी पर काबू पा लिया गया। दोनों डॉक्टर अस्पताल में आने वाले मरीजों की पूरी सेवा करते और मरीज भी ठीक हो कर डाक्टरों को दुआएं देते हुए जाते। कुछ समय तक सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा। परंतु कुछ समय के बाद चीनू खरगोश के मन में लालच बढ़ने लगा। उसने वीनू खरगोश को अपने पास बुलाया और कहने लगा यदि वे दोनों मिल कर अस्पताल की दवाइयां दूसरे वन में बेचें तथा रात में जाकर दूसरे वन के मरीजों को देखें तो अच्छी कमाई कर सकते हैं और इस बात का किसी को पता भी नहीं लगेगा।

वीनू खरगोश पूरी तरह से ईमानदार था, इसलिए उसे चीनू का प्रस्ताव पसंद नहीं आया और उसने चीनू को भी ऐसा न करने का सुझाव दिया। लेकिन चीनू कब मानने वाला था। उसके ऊपर तो लालच का भूत सवार था। उसने वीनू के सामने तो ईमानदारी से काम करने का नाटक किया। परंतु चोरी-छिपे बेइमानी पर उतर आया।

वह जंगलवासियों की मेहनत से खरीदी गई दवाइयों को दूसरे जंगल में ले जाकर बेचने लगा तथा शाम को वहां के मरीजों का इलाज करके कमाई करने लगा। धीरे-धीरे उसका लालच बढ़ता गया। अब वह अस्पताल के कम, दूसरे वन के मरीजों को ज्यादा देखता।

इसके विपरीत, डॉक्टर वीनू अधिक ईमानदारी से काम करता। मरीज भी चीनू की अपेक्षा डॉक्टर वीनू के पास जाना अधिक पसंद करते। एक दिन सभी जानवर मिलकर राजा शेर सिंह के पास चीनू की शिकायत लेकर पहुंचे। उन्होंने चीनू खरगोश की कारगुजारियों से राजा को अवगत कराया और उसे दंड देने की मांग की।

शेर सिंह ने उनकी बात ध्यान से सुनी और कहा कि सच्चाई अपनी आंखों से देखे बिना वे कोई निर्णय नहीं लेंगे। इसलिए वे पहले चीनू डॉक्टर की जांच कराएंगे, फिर अपना निर्णय देंगे। जांच का काम चालाक लोमड़ी को सौंपा गया, क्योंकि चीनू खरगोश लोमड़ी को नहीं जानता था।

लोमड़ी अगले ही दिन से चीनू के ऊपर नजर रखने लगी। कुछ दिन उस पर नजर रखने के बाद लोमड़ी ने उसे रंगे हाथों पकड़ने की योजना बनाई। उसने इस योजना की सूचना शेर सिंह को भी दी, ताकि वे समय पर पहुंच कर सच्चाई अपनी आंखों से देख सकें।

लोमड़ी डॉक्टर चीनू के कमरे में गई और कहा कि वह पास के जंगल से आई है। वहां के राजा काफी बीमार हैं, यदि वे तुम्हारी दवाई से ठीक हो गए, तो तुम्हें मालामाल कर देंगे। यह सुनकर चीनू को लालच आ गया। उसने अपना सारा सामान समेटा और लोमड़ी के साथ दूसरे वन के राजा को देखने के लिए चल पड़ा। शेर सिंह जो पास ही छिपकर सारी बातें सुन रहा था, दौड़कर दूसरे जंगल में घुस गया और निर्धारित स्थान पर जाकर लेट गया।

थोड़ी देर बाद लोमड़ी डॉक्टर चीनू को लेकर वहां पहुंची, जहां शेर सिंह मुंह ढंककर सो रहा था। जैसे ही चीनू ने राजा के मुंह से हाथ हटाया, वह शेर सिंह को वहां पाकर सकपका गया और डर से कांपने लगा। उसके हाथ से सारा सामान छूट गया, क्योंकि उसकी बेइमानी का सारा भेद खुल चुका था। तब तक सभी जानवर वहां आ गए थे। चीनू खरगोश हाथ जोड़कर अपनी कारगुजारियों की माफी मांगने लगा।

राजा शेर सिंह ने आदेश दिया कि चीनू की बेइमानी से कमाई हुई सारी संपत्ति अस्पताल में मिला ली जाए और उसे धक्के मारकर जंगल से बाहर निकाल दिया जाए। शेर सिंह के आदेशानुसार चीनू खरगोश को जंगल से बाहर निकाल दिया गया। इस कार्रवाई को देखकर जंगलवासियों ने जान लिया कि ईमानदारी की हमेशा जीत होती है।

Bachon ki Kahaniyan No 12: किस से कहूँ?

मीना,चिंटू और सुमी स्कूल जा रहे हैं। मीना ये जानने को उत्सुक है कि अगले हफ्ते होने वाली प्रतियोगिता का विषय क्या होगा? और उस प्रतियोगिता के लिए किस-किस विद्यार्थी का चयन हुआ होगा?

मीना,चिंटू और सुमी स्कूल पहुंचे। सूचना पट पर कागज लगा हुआ था। मीना,सुमी और चिंटू भाग के सूचना पट के पास पहुंचे। अगले हफ्ते होने वाली प्रतियोगिता के लिए जिन बच्चों का चयन हुआ है उनके नाम हैं- दीपू,रोशनी,कृष्णा,मीना,चिंटू और सुमी। प्रतियोगिता का विषय है विज्ञान।

चूँकि चिंटू को विज्ञान से डर लगता है इसलिए वो उदास हो जाता है।

सुमी-चिंटू…क्या तुम्हें सचमुच विज्ञान से डर लगता है?

चिंटू- सुमी, डर तो लगेगा ही क्योंकि मास्टर जी जिस तरह विज्ञान पढ़ाते हैं…मुझे तो कुछ समझ नही आता।

चिंटू प्रतियोगिता को लेकर बहुत उदास था और जब स्कूल की छुट्टी के बाद वो अपने घर पहुंचा….

उसकी माँ ने उसे खाना खाने को कहा। चिंटू बोला, ‘मुझे भूख नहीं है माँ।…. प्रतियोगिता के लिए मुझे चुन लिया गया है माँ लेकिन ….मैं

प्रतियोगिता में भाग नहीं लूँगा क्योंकि प्रतियोगिता का विषय विज्ञान है।…..मैं विज्ञान में बहुत ही कमजोर हूँ।

मास्टर जी जी क्या पढ़ाते हैं मुझे कुछ समझ नही आता।

माँ ने पूँछा, ‘क्या तुमने इस बारे में मास्टरजी से बात की?

चिंटू- नहीं माँ….अगर मैं उनसे इस बारे में बात करूं और वो गुस्सा हो गए तो।

चिंटू की माँ उससे सुमी के घर चलने को कहती हैं… “सुमी के पिताजी स्कूल प्रबन्धन समिति के सदस्य है। मैं उनसे कहूंगी कि वो प्रिंसिपल साहिबा से इस बारे में बात करें।”

और फिर थोड़ी देर बाद चिंटू की माँ और चिंटू गए सुमी के घर। सुमी के माँ, अगले हफ्ते होने वाले अपने भांजे की शादी में, जाने को तैयार खडी हैं। चूँकि उनकी बस का समय हो जाने के कारण सुमी के पिताजी उनकी समस्या के बारे में, कल स्कूल प्रबन्ध समिति की मीटिंग में आके, बात करने को कह देते हैं।

चिंटू की माँ(लीला)-…सुमी, खूब मजे करना शादी में।

सुमी के पिताजी- लीला भाभी…सुमी कहीं नहीं जा रही ….वो इसलिए अगर सुमी शादी में गयी तो फिर स्कूल कौन जाएगा?

और अगले दिन स्कूल प्रबंधन समिति की मीटिंग में…..

सुमी के पिताजी-….लीला भाभी का कहना है कि विज्ञान के मास्टर जी ठीक से नही पढ़ाते।

लीला- जी प्रिंसिपल साहिबा….इसी वजह से मेरा बीटा चिंटू अगले हफ्ते होने वाली प्रतियोगिता में भाग नहीं लेना चाहता।

प्रिसिपल साहिबा-….अगर मास्टर जी ठीक ढंग से नहीं पढ़ाते तो अब तक कई बच्चों की शिकायत हमारे पास आ गयी होती।

सुमी के पिताजी सुझाव देते है, ‘सुमी और मीना भी चिंटू की क्लास में पढ़ते हैं क्यों न उन्हें यहाँ बुलाके ये बात पूँछी जाए?”

चौकीदार मीना औए सुमी को लेकर प्रिंसिपल साहिबा के दफ्तर में पहुँचा।

प्रिसिपल साहिबा- मीना…सुमी, क्या तुम्हें विज्ञान के मास्टर जी से कोई शिकायत है? मेरा मतलब क्या वो ठीक से नही पढ़ाते?

मीना-…ऐसी कोई बात नही है।

चिंटू- मुझे विज्ञान के पाठ समझने में बहुत मुश्किल होती है।

प्रिसिपल साहिबा- मीना जरा वो उपस्थिति का रजिस्टर लाना तो।

चिंटू पिछले महीने में सिर्फ ९ दिन ही स्कूल में आया था।

प्रिंसीपल साहिबा लीला से कहती हैं, ‘अब आपको पता चला कि चिंटू को विज्ञान पढ़ने में मुश्किल क्यों आ रही है?’

सुमी के पिताजी- किसी भी विषय के पाठ जंजीर के कड़ियों की तरह होते है एक दूसरे से जुड़े हुए,एक भी कड़ी छुट गयी तो समझो जंजीर टूट गयी।

चिंटू को बात समझ आ जाती है और उसकी माँ लीला को भी।

सुमी के पिताजी प्रश्न उठाते हैं, ‘…चिंटू की समस्या कैसे हल की जाए।?’

मीना कहती है, ‘चाचा जी, प्रतियोगिता होने में अभी एक हफ्ता है तब तक सुमी और मैं चिंटू को विज्ञान के वो सभी पाठ पढ़ा देंगे जो छुट्टियाँ लेने के कारण ये नहीं पढ़ पाया था।

बहिन जी- शाबाश! मीना, मैं भी मास्टर जी से कहूंगी कि वो भी क्लास में चिंटू की तरफ विशेष ध्यान दें।

मीना,मिठ्ठू की कविता-

“अपने मन के कागज़ पे इस बात को करलो दर्ज,
रोज स्कूल बच्चों को भेजना हर माँ बाप का फर्ज”

 

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