Andhvishwas Story in Hindi – अंधविश्वास पर कहानियाँ

हेलो दोस्तों आज हम आपके लिए लाये है अंधविश्वास पर निर्धारित कहानियाँ जो डरने और सोचने पर मजबूर कर देंगी। इस आर्टिकल में हम आपके लिए लाये है बहुत सारी  अंधविश्वास से जुडी हुई कहानियाँ जो आपको बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देंगे। हम आपके लिए लाये है अंधविश्वास पर कहानियाँ वो भी हिंदी में। 

 

Andhvishwas Story in Hindi

Andhvishwas Story No # 1 : अंधविश्वास

 

रामधन रामनगर नामक गांव में रहता था। उसके खेत बहुत उपजाऊ थे और हर बार उसके खेतों में झूमती और लहलहाती फसल को देखकर सब ईष्र्या करते थे। हमेशा फसल से उसे बहुत आमदनी होती थी इसलिए दिनप्रतिदिन वह अमीर होता जा रहा था। अब उसकी गिनती अमीर लोगों में होने लगी रामधन थोड़ा बहुत पढ़ा हुआ था परंतु उसकी पत्नी विद्या ने इंटर की हुई थी । वह काफी बुद्धिमान थी।

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वह रामधन को हमेशा समझदारी भरी और व्यावहारिक बातें बताती किंतु वह उन्हें गंभीरता से न लेते हुए मजाक में उड़ा देता। वह पुराने विचारों का था इसलिए जादूटोनों, अंधविश्वास व भाग्य पर बहुत यकीन करता था।

कभी किसी पंडित की बात संयोगवश सच हो जाती तो वह यह मान बैठता कि पंडित के कहे अनुसार ही उसके जीवन में आगे होगा और पंडित जो बताएंगेवही उसके भाग्य में लिखा होगा।

उनके विवाह को पांच वर्ष हो गए थे किंतु दुर्भाग्यवश अभी तक उनके यहां कोई संतान नहीं थी। रामधन अनेक पंडितों से संतान योग पूछ कर आता और फिर वह जो करने को कहते वह विद्या को बताता।

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कभी कहता कि पंडित ने कहा है कि यदि रात को हम एक विशेष जाप करेंगे तो हमारे यहां शीघ्र ही एक स्वस्थ संतान का जन्म होगा, कभी कहता कि यदि हम पंडित को ग्यारह हजार रुपए दक्षिणा दें और उसे विभिन्न तरह के पकवान खिलाएं तो हमारे यहां गुणवान संतान होगी।

विद्या रामधन की इन मूर्खता भरी बातों पर सिर पीट लेती। एक दिन विद्या रामधन को अपने साथ जबरदस्ती शहर में डॉक्टर के पास ले गई। डॉक्टर ने उन दोनों का चेकअप किया। चेकअप करने पर उसने उन्हें उचित इलाज कराने का परामर्श दिया। पहले तो रामधन विद्या पर बहत भड़का और बोला”हमारे यहां डॉक्टरों पर कोई विश्वास नहीं करता। सब कुछ झाड़ फूक के द्वारा किया जाता है किंतु तुम हो कि मेरी बात मानती ही नहीं हो। उलटा इन सबको अंधविश्वास और पागलपन कहती हो।

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बारह क्लास क्या पड़ गई हो अपने आपको अफसर समझने लगी हो।” उसकी इस बात पर विद्या बोली, “देखोयदि डॉक्टर के बताए इलाज से हमें बच्चा हो गया तो तुम इन सब अंधविश्वासों पर विश्वास करना बंद कर दोगे और हमेशा के लिए इन जादू-टोनों से दूर हो जाओगे ।” नासमझ रामधन मन ही मन विद्या का मजाक उड़ाने लगा और सोचने लगा कि चलो अब तो कुछ समय बाद विद्या मेरे साथ जप करेगी और झाड़ फूक से ही अपनी हर समस्या हल करेगी।

उधर विद्या ने डॉक्टर द्वारा बताए गए इलाज को समय पर किया। कुछ ही समय बाद उनके यहां एक सुन्दर-सी बेटी ने जन्म लिया। रामधन यह देखकर हैरान रह गया कि जो मंत्रजाप, अनुष्ठान व झाड़फूक वह वर्षों से संतानोप्राप्ति के लिए कर रहा था। वह उसके किसी काम न आए बल्कि डॉक्टर द्वारा इलाज की सलाह ने एक वर्ष के अंदर ही उसके घर में एक नन्ही-सी परी की किलकारियां गूंज उठी।

 

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रामधन ने उस बच्ची का नाम परी रखा और अपनी पत्नी विद्या से अपनी अंधविश्वासी हरकतों के कारण माफी मांगी। फिर उसने उससे वादा किया कि आगे से वह कभी भी इन पोंगा पंडितों की बातों में नहीं आएगा और बीमारी या समस्या के समय हमेशा डॉक्टर या पढ़े लिखे व्यक्ति से परामर्श कर उसका समाधान निकालेगा ।

विद्या रामधन को सही रास्ते पर आते देखकर बहुत खुश हुई और बोली, “रामधन आज सही मायनों में तुमने प्रगति की ओर एक कदम बढ़ाया है क्योंकि जो इंसान में वह नहीं ।

अंधविश्वासों जीता है कभी आगे बढ़ सकता अंधविश्वासों के कारण एक दिन ऐसा आता है जब नकसान भी वह अपना ही कर डालता है किंतु शुक्र है से कि तुम सही समय पर भटके हुए मार्ग प्रगति के मार्ग पर आ गए हो।”

इसके बाद वे दोनों खुशी-खुशी अपना जीवन बिताने

 

Andhvishwas Story No # 2 साहसी राहुल

 

राहुल दस साल का एक बहुत ही प्यारा-सा बच्चा था। उसे सब बहुत करते थे पर उसमें एक बहुत खराब आदत थी कि वह अंधेरे से बहुत डरता था। इस डर के कारण वो ना तो रात में देर तक जागकर पढ़ पाता और ना ही अपनी मम्मी का हाथ पकड़े बिना कमरे से बाहर जाता।

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Andhvishwas Story in Hindi

 

इस वजह से उसके घर में सब लोग बहुत परेशान रहते थे। दिनभर तो वो बहुत मस्ती करता और उछलकूद मचाता पर जैसे ही रात होती तो बत्ती बंद होने पर वो थरथर कांपने लगता। उसके डर की वजह उसकी चाची थी जो बचपन में उसे जल्दी सुलाने के लिए तरहतरह के मन से बनाए हुए डरावने किस्से सुनाती रहती थी।

शुरू में तो राहुल को भी इन अजीबोगरीब किस्सों को सुनने में बड़ा मजा आता था पर धीरे-धीरे उसके मन में डर बैठ गया और अब वो चाची की भी बात मानने के लिए तैयार नहीं होता था कि भूत अंधेरे में नहीं आते हैं। क्योंकि ये सब होते ही नहीं हैं। अब बेचारी चाची भी बहुत दुखी होती थी। कि उनके कारण ही राहुल इतना डरपोक हो गया था। इसी तरह से कई दिन बीत गए और राहुल का डर कम होने के बजाए बढ़ता ही गया। एक रात बहुत बरसात हो रही थी और घर में सबको शादी में जाना पड़ा था। बस राहुल ही चाची के साथ घर पर था और खाना खा रहा था।

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अचानक बिजली चमकने के साथ ही बत्ती गुल हो गई। बेचारे राहुल के हाथ से डर के मारे चम्मच छूट गया । यह देखकर उसकी चाची बड़े ही प्यार से बोली, “तुम बिलकुल मत डरो। मैं अभी मोमबत्ती लेकर आती हूं।” कहकर जैसे ही अंधेरे में हाथों से टटोलकर आगे बढ़ी कि जमीन वह पर पानी होने कि वजह से फिसलकर गिर पड़ी। जब तक वह संभल पाती अंधेरे उनका के माथे से खून निकलने सर मेज नुकीले कोने से टकराया और लगा। ” चाची जोरजोर से रोते हुए राहुल को बुलाने लगी। राहुल जो अब तक में डर के मारे पत्थर का बुत बना बैठा हुआ था चाची के पास दौड़ा।

बिजली चमकने पर उसने देखा कि चाची के माथे से बहुत खून बह रहा है। वह हवा की गति से घर के सामने रहने वाले डॉक्टर अंकल को बुलाने के लिए दौड़ बरसात में वह रहरहकर फिसल रहा था, पर उसकी आंखों के सामने सिर्फ चाची का खून भरा माथा घूम रहा था। अंधेरे में जब रह-रहकर बिजली गरज रही थी और कुत्ते भौंक रहे थे तो डर के मारे उसके माथे पर पसीना छलछला जाता था।

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पर वो बिना रूके दौड़ता ही रहा और सामने की गली पार करके 1 गोद डॉक्टर अंकल के यहां पहुंच गया। डॉक्टर अंकल ने जैसे ही उसकी बात सुनी वो तुरंत अपना फर्स्ट एड बॉक्स और जरूरी दवाइयां लेकर उसके साथ झट 1 उसी से चल पड़े। जब वे दोनों घर पहुंचेतब तक लाइट आ चुकी थी और चाची जमीन पर ही पड़ी हुई दर्द से कराह रही थी।

डॉक्टर अंकल ने उन्हें सहारा देकर बिस्तर पर लिटाया और तुरंत उनके माथे से बहते खून को पोंछकर उनकी 1 श मरहम पट्टी की। तब तक घर के सभी सदस्य भी शादी से लौटकर आ चुके थे। सबकी आंखों में घबराहट और चिंता के भाव देखते ही डॉक्टर अंकल |

पद मुस्कुराकर बोलेजिस घर में राहुल जैसा हिम्मती और समझदार बच्चा हो 1 जन वहां किसी को कभी भी कोई चिंता करने की जरूरत ही नहीं है। देखिएउसने कितनी हिम्मत और बहादुरी से सब कुछ संभाल लिया।” यह कहते हुए डॉक्टर अंकल ने बड़े ही प्यार से उसकी पीठ थपथपाई। मम्मी ने तो सारी बातें सुनकर राहुल को गले से लगा लिया और खुशी के मारे रोने लगी।

उस दिन से तो राहुल सबका हीरो बन गया। और हां चाची ने अपने मन में प्रण कर लिया कि अब वो किसी भी बच्चे को कभी भी झूठी और डरावनी कहानियां ना सुनाकर उसका आत्मबल और मनोबल बढ़ाने ज्ञानवर्धक कहानियां सुनाएंगी।

Andhvishwas Story No # 3 : बलि से पहले

धौल और भूरा बड़े कौतूहल से सब कुछ देख रहे थे। पंक्ति में खड़े उनके साथियों को बारी-बारी से नल के नीचे ले जाया जाता। साबुन लगाकर, मलमल कर उन्हें नहलाया जाता, सभी कुछ अद्भुत था। आश्चर्य से भरा धौल भर से बोला, “भूरा! देख तो नहा-धोकर कितने भले लग रहे हैं सब। आखिरकार क्या है, आज आदमी हम पर इतना मेहरबान कैसे हो गया? मुझे तो दाल में कुछ काला दिखता है! भूरा ने जवाब दिया। हुंह ।

तुझे तो बस काला ही काला दिखता है। काला हो या पीला पर। है बहुत खूब, शायद इंसान को अक्ल आ गई है कि अपने पालतू साथियों की भी कभी सफाई की जानी चाहिए। धौलू बड़े मधुर स्वर से बोला। तभी धौलू के पास एक गोल टोपी वाला व्यक्ति आया, और उसे नल के नीचे ले गया।

नल की ठंडी फुहारों से धौलू का बदन सिहर उठता और साबुन लगाकर जोर-जोर से पेट-पीठ का मलना उसे विचित्र आनंद भी दे रह था।नहला-धलाकर धौल को एक ओर खड़ा कर दिया गया। अब भूरा की बारी आई। थोडी ही देर बाद नहा-धोकर वह फिर धौलू की बगल में आ पहुंचा। ऐ धौलू! तू तो कपास की ढेर-सा उजाला निखरा लग रहा है रे! धौलू के सफेद बदन को खूब चमकता देखकर भूरा बोला। और तेरा चकत्तेदार शरीर क्या कम सुंदर लग रहा है, धौलू ने कहा-

सच? हां और क्या! और फिर दोनों मुस्करा उठे, थोड़ी ही देर बाद उन्हें एक लंबे चौड़े मैदान में ले जाया गया। मैदान चारों ओर से लगभग दो फुट ऊंचे कटीले तारों से घिरा हुआ था, एक-एक पैर रस्सियों से बांधकर उनके आगे हरे चारे का ढेर लगा दिया गया, दोनों अन्य सबके साथ मजे-मजे में चारा चटकारने लगे। तारों के बाहर खड़े छोटे-छोटे बच्चे बकरों को देख-देखकर हंस रहे थे, तरह-तरह की बातें कर रहे थे।

इंदु। देख कितना प्यारा है यह बकरा। विनय बोला- हाय!

कैसा सफ़ेद-सफ़ेद है। कितना सुंदर लग रहा है। इंदु ने कहा- और यह भूरा देख। भूरे बदन में सफेद चकत्ते कैसे अच्छे लग रहे हैं। करीब चहका।

इन बेचारों को क्या पता कि परसों ईद के दिन इन्हें टिच….गले पर हाथ फेरकर अब्दुल्ला खिलखिलाया। बड़ी शान से बोल रहा है, क्या रीति है तुम्हारी भी! बकरों के ढेर के ढेर काट डालते हो। नीलू ने भी गर्दन पर हथेली फेरते हुए कहा।

और तुम्हारे यहां देवी-देवताओं के नाम पर क्या इन्हें छोड़ दिया जाता है? हबीब ने मुंह बनाया।

और तुम ईद के दिन सबको-इंदु ने फिर कहना चाहा…. । चुप! तू बड़ी दूध की धुली है। अब्दुल्ला ने तेजी से उसकी बात काट दी।

तू बड़ा आया दूध का धुला। चुप….चुप….तू….तू चुप बच्चों के बीच तकरार बढ़ने लगी। सुनकर भूरा और धौलू के कान खड़े हो गए। तभी दूर आसमान से कटी पतंग नीचे गिरने लगी, बच्चों का रेला तू-तू मैं-मैं भुलाकर पतंग की ओर दौड़ पड़ा और धौलू उदास हो उठा।

हे भगवान! यह कैसा अन्याय हो रहा है। धौलू ने लंबी सांस ली। देख लिया तूने बरसों से हमारा शोरबा बनाने वाली यह आदमजात। हुंह! तू कहता था कि अब इन्हें अक्ल आ गई, भूरा बिगड़ा। लेकिन यह अन्याय है भूरा। सरासर अन्याय। मैं यहां नहीं रहूंगा, भाग जाऊंगा धौलू ने गर्मजोशी से कहा।

ऊंगा। उसका छोटा-मोटा देखता नहीं इन पहाड़ों मगर कहां? है तो तू बकरा ही, जहां जाएगा तेरी शामत आएगी। भरा जैसे स्वयं पर व्यंग्य कर उठा।

मैं किसी गरीब की झोपड़ी में चला जाऊगा। उसका ठोगा बोझा दो लूंगा। मैं उसके खेतों के लिए खाद दूंगा। देखता नही पर लोग ऐसे कितने ही बकरे पालते हैं। हां….हां….तू यह सब करेगा, पर एक दिन फिर भी सच ही तो है भूरा कहते-कहते धौलू की आंखें भर भी वह एक गहरी सांस लेकर बोला-काश! मैं भी वैसा कैसा?

उस बलिदानी की तरह। किसकी बात करता है धौलू? देन फिर भी मारा जाएगा। की आंखें भर आईं। कुछ देर बाद भरा! मैं जहां पलता था, उस घर का एक नौजवान फौज में था। पिटले ही हफ्ते छुट्टी बिताकर वापस गया। एक दिन आंगन में बैठा यट सना रहा था। मैं भी पास ही बंधा था, मुझे देखते ही वह बोला- खब याद आया। हमें एक दिन जंगल में ऐसा ही बकरा मिला. हम लोग उसे अपने साथ यूनिट में ले आए। सब उस बकरे को प्यार करते थे।

एक दिन हम कुछ जवानों को दुश्मन की टोह लेने भेजा गया। हम लोग चुपचाप बढ़ रहे थे, कुछ दूर चलकर सुस्ताए और एक ओर चलने का इरादा कर बढ़ने ही वाले थे कि वही बकरा जाने किधर से हमारे पास आ रुका। हमारे कदम उठाने से पहले ही उस ओर कूदा, जिधर हमें बढ़ना था, सहसा एक धमाका हुआ। धड़-धड़ धड़ाम….वह बेचारा खून से लथपथ धरती पर पड़ा था, दुश्मन शायद उस ओर बारूदी सुरंगें बिछा गया था। सचमुच अगर हम में से एक ने भी कदम बढ़ाया होता तो हमारे चीथड़े उड़ गये होते। धन्य था वह बलिदानी बकरा, जिसने यूनिट के अन्न का कर्जा चुकाया। कहते-कहते धौलू किन्हीं विचारों में खो गया।

भूरा ने उदास धौलू को अपने यूंथन से सहलाया और बोला-धौल क्या सोच रहा है?

सोचता हूं मैं भी कुछ ऐसा ही करूं….हां भूरा. ऐसा ही करूंगा। मैं चला जाऊंगा। कहीं दूर….बहुत दूर…. । धौलू बड़बड़ाता जा रहा था। साथ 12 • अंधविश्वास की 15 श्रेष्ठ कहानियां

ही बंधे पैर को जोर-जोर से झटकता जा रहा था रस्सा पतला था, जल्दी ही टूट गया।

अरे! धौलू खुशी से चीखा और सरपट बाड़े को लांघने भागा। उसने पूरी ताकत से छलांग लगाई और झटके से उस पार हो गया। एक तार की कंटीली नोंक से उसके पेट में गहरी खरोंच आ गई। पर खून और दर्द की चिंता किए बिना वह जोर-जोर से हंसने लगा….वाह! अब मैं आजाद हूं। अपने ढंग से मौत मरूंगा, हंह। ऐसी बलि लेकर ही भला ईश्वर प्रसन्न होगा, पलभर रुककर उसने बाड़े में खड़े भूरा को निहारा और फिर राम-राम करता हुआ एक ओर दौड़ पड़ा।

खूटी से बंधा भूरा टुकुर-टुकुर उसे ताकता रहा। उसकी इच्छा हुई कि वह भी भाग जाए पर मन ने कहा कि कहीं और की मौत से तो खुदा के नाम पर मरना अच्छा। और वह चुपचाप धौलू के पैरों से उड़ती हुई धूल का गुब्बारा देखने लगा।

धौलू बहुत दूर निकल गया था, उधर नजरें गड़ाए भूरा बड़बड़ाया- अलविदा! प्यारे दोस्त! खुदा तेरी मुराद पूरी करे। तभी सामने बाड़े का द्वार खुला और कुछ लोग भूरे की ओर लपकने लगे।

Andhvishwas Story No # 4 : बन गए सब घनचक्कर

इकलू चूजा नानी के घर से होकर लौटा है तभी मां ने उसके हाथ में पैसे देकर गरमागरम जलेबी लाने को कहा। जलेबी की बात सुनकर वह और खुश हो गया। वह थैला उठाए बाजार की ओर निकल पड़ा। बाजार पहुंचा तो वह दंग रह गया। बदरू हलवाई की दुकान को जंगल में मुर्गियों ने घेर रखा है। गजब की भीड़ लगी हुई है।

“भई! अचानक ऐसा क्या हो गया कि सभी को जलेबी ही चाहिए?” उसने पास खड़े निबलू नेवले से पूछा। “क्या तुम्हें मालूम नहीं?” उत्तर देने की बजाए निबलू ने प्रश्न कर डाला। फिर इस तरह से घूरने लगा जैसे कि वह कोई बेवकूफी भरी बात कर रहा हो?

“चलो-चलो पीछे लाइन में लगो। पंक्ति मत तोड़ो। देर से आते हो और बीच में घुसते हो।” कई जानवर उसे देख चिल्लाने लगे। कुछ तो उसे पीछे धकेलने लगे। अजीब-सी रेलम-पेल मची हुई है। इकलू ने बुरा-सा मुंह बनाया और पीछे जाकर पंक्ति में खड़ा हो गया। दोपहर बाद उसका नंबर आया तब तक जलेबियां बिक चुकी थीं। उसे थोड़ी जलेबी पर ही संतोष करना पड़ा।

इकलू चूजे को आज एक बात और अजीब दिखी। रास्ते पर आते जाते चलते सभी मुर्गियों ने लाल रंग के कपड़े पहन रखे हैं। किसी ने लाल रंग के सलवार कुर्ता पहना है तो कोई लाल चुनर ही ओढ़े हुए है। वहां हलवाई की दुकान पर भी सभी मुर्गियां लाल रंग के वस्त्रों में ही नजर आईं। चारों ओर लाल रंग ही लाल रंग बिखरा हुआ है। इकलू को ध्यान आया कि आज उसकी मां ने भी लाल रंग की साड़ी पहन रखी है। “लो मां, सिर्फ दो ही जलेबी मिल पाई हैं….” इकलू ने घर जाकर मां को जलेबी थमाते हुए कहा। क्या कहा, सिर्फ दो ही जलेबियां? हाय! मैं कैसे व्रत करूंगी?” “आज कोई विशेष त्योहार है मां?” “बेटा! आज हम सभी मुर्गियों का व्रत है। यह व्रत हमें लाल कपड़े पहनकर जलेबी खाकर ही पूरा करना है।” इकलू चकराया, “यह कौन-सा व्रत है मां?” “यह मंगलकारी सब मनोकामना पूरी करने वाला व्रत है। अभी कुछ दिन पहले ही एक बाबा ने हम सब मुर्गियों को यह व्रत सुझाया है। इकलू के मन में जिज्ञासा भरा सवाल उठा और वह परोपकारी बाबा को देखने उस विशाल बरगद के नीचे पहुंच गया।

“आओ बेटा इकलू। बड़े दिनों के बाद आए हो।”“अयं ये क्या?” इकलू को बाबा की आवाज जानी पहचानी लगी।nइकलू ने अपने दिमाग पर जोर डाला और कुछ देर याद नहीं आया।

“क्या सोच रहे हो बेटा! क्या परीक्षा में फर्स्ट आना चाहते हो?” उसने सिर हिलाया, “हां बाबा।” तो सुनो बेटा तुम आज से ही जलेबियां खाकर व्रत करना शुरू कर दो पर हां उत्तम फल पाने के लिए व्रत के साथ लाल रंग के कपड़े पहनना न भूलना।

“अयं ये क्या?” यह सुनकर इकलू चूजा चौंका। सभी को यह व्रत? कुछ सोचता हुआ इकलू वहां से चल पड़ा। वह सीधा अपने मित्र टिकलू के पास जा पहुंचा और सारी बात कह सुनाई।

टिकलू बोला, “मुझे तो दाल में कुछ काला नजर आ रहा है।” “कुछ भी काला नहीं? अरे! मुझे तो पूरी दाल ही काली नजर आ रही है। यह कोई बाबा नहीं धूर्त है। जिसने सभी को अंधविश्वास में घेरकर घनचक्कर बना रखा है।”

दोनों मित्र जंगल की टोह लेने चल पड़े। जंगल में जलेबियों और लाल कपड़ों का व्यापार जोरों पर चल रहा था। ऊंचे दामों पर लोग जलेबी खरीद रहे थे। बाजार में भी लाल कपड़ा धड़ाधड़ बिक रहा था। “लगता है पैसा कमाने के चक्कर में यह सब चक्कर चलाया गया है। टिकलू ने अपना संशय रखा तो इकलू बोला, “लगता है इन अंधविश्वासी मुर्गियों को बेवकूफ बनाया जा रहा है।”

इकलू और टिकलू ने मिलकर अपने मित्र चूजों को एकत्रित किया और इस षड्यंत्र का पर्दाफाश करने की एक योजना बनाई। योजनानुसार चूजों ने बरगद के नीचे बैठे बाबा पर हमला बोल दिया। वे उस पर चढ़कर अपनी चोंचे मारने लगे। ढोंगी वेश में बैठा लोमड़ इस आक्रमण से बौखला कर ओढ़ा लबादा और मुखौटा उतारकर अपने असली वेश में आ गया। शोर सुन जंगल के दूसरे जानवर भी आ चुके थे। लोमड़ की असलियत सभी के सामने थी। सभी जानवर लोमड़ को खदेड़ते हुए शेरसिंह के पास ले गए।

लोमड़ ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि बन्दरू हलवाई, गरदू दर्जी तथा लंगूरी दर्जन सभी ने मिलकर पैसा कमाने के लिए यह योजना बनाई थी। अभी तो केवल इस चक्कर में केवल मुर्गियां ही फंसी थीं। उनका इरादा तो इसी अंधविश्वास का लाभ देकर दूसरे सभी पशु-पक्षियों को ठगने का था।

 

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