Essay on illiteracy in Hindi निरक्षरता पर निबंध Niraksharata Par Nibandh

Essay on illiteracy in Hindi निरक्षरता पर निबंध Niraksharata Par Nibandh
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हेलो दोस्तों आज फिर में आपके लिए लाया हु Essay on illiteracy in Hindi पर पुरा आर्टिकल। भारत देश दुनिया का सबसे अलग है जो अपनी संस्कृति के पूरी दुनिया जाता है। आज के essay में आपको illiteracy के बारे में बहुत बातें पता चलेंगे तो अगर आप अपने बच्चे के लिए Essay on illiteracy in Hindi में ढूंढ रहे है तो हम आपके लिए illiteracy यानि निरक्षरता पर लाये है जो आपको बहुत अच्छा लगेगा। आईये पढ़ते है Essay on illiteracy in Hindi  or निरक्षरता पर निबंध

 

Essay on illiteracy in Hind
Essay on illiteracy in Hindi 400 word

प्रस्तावना :

निरक्षरता-जिसका शाब्दिक अर्थ है अक्षरों तक का ज्ञान न होना। जो व्यक्ति अक्षरों को न तो पहचान सकता है और न ही पढ़ सकता है, वह ‘निरक्षर’ कहलाता है। निरक्षर व्यक्ति संसार में प्रत्येक ज्ञान से अनभिज्ञ रहता है। निरक्षर होना वास्तव में सबसे बड़ा अभिशाप है।

निरक्षरता-एक अभिशाप :

आज के प्रगतिशील युग में भी यदि कोई व्यक्ति पढ़-लिख नहीं सकता, तो निःसन्देह वह सबसे बड़ा अभागा है। भारतवर्ष के विषय में एक सत्य यह भी है कि यहाँ शिक्षितों तथा अशिक्षितों दोनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। आज यदि हमारे देश में पढ़े-लिखे युवा नए-नए आविष्कार कर रहे हैं वही दूसरी ओर अशिक्षितों की भी कमी नहीं है। यह जानते हुए भी कि अशिक्षा कितना बड़ा अभिशाप है, वे लोग पढ़ने की कोशिश भी नहीं करते हैं।

निरक्षरता के दुष्परिणाम :

निरक्षर व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन कष्टों से ‘भरा होता है। वह न तो अपने किसी प्रियजन को पत्र लिख सकता है और न ही किसी को पत्र पढ़ सकता है। वह किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर तक ‘ नहीं कर सकता इसीलिए लोग उसको ‘अंगूठा टेक’ कहते हैं। निरक्षर व्यक्ति ‘किसी से अपने दिल की बात भी नहीं कह सकता क्योंकि उसे किसी भी विषय पर ठीक से बोलना नहीं आता। शिक्षा से ही तो व्यक्ति में आत्मविश्वास आता है। निरक्षर व्यक्ति का कोई भी सम्मान नहीं करता।

निरक्षरता दूर करने के उपाय :

इस दिशा में अनेक कदम उठाए जा सकते हैं। आजकल सरकार की ओर से साक्षरता अभियान भी चलाए जा रहे हैं। महानगरों, नगरों, कस्बो तथा गाँवों में शिक्षित लोग अशिक्षितों को पा रहे हैं। इसके लिए सर्व शिक्षा शिविर भी लगाए जा रहे हैं। प्रायः निरक्षर लोग मेहनत-मजदूरी करने वाले होते हैं, इसलिए उनके पास सुबह-शाम का समय ही होता है, जिसमें वे पढ़ाई कर सकते हैं। घरेलू स्त्रियों के लिए दोपहर के खाली समय में पढ़ने-लिखने की मुफ्त व्यवस्था की जाती है। इसके अतिरिक्त निरक्षर लोगों को शिक्षा-सामग्री भी निशुल्क दी जाती है। इन सब सुविधाओं से लाभ उठाकर हम निरक्षरता रूपी अभिशाप से मुक्ति पा सकते हैं।

निष्कर्ष :

आज का युग कम्प्यूटर, बड़ी-बड़ी मशीनों, इंटरनेट आदि का यग है। ऐसे विकासशील समय में निरक्षर होना देश के नाम पर तथा ‘स्वयं के नाम पर भी कलंक है। हम भारतवासियों का यह परम कर्तव्य है। ‘कि हम स्वयं साक्षर होकर दूसरों को भी साक्षर करें और सर्व शिक्षा अभियान का हिस्सा बने।

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साक्षरता का अर्थ है-

अक्षर ज्ञान होना। दूसरे शब्दों में, पढ़ने-लिखने की क्षमता का होना ही साक्षरता है। आज की दुनिया में सामान्य ज्ञान का बहुत महत्व है। इससे युक्त व्यक्ति को ही सफलता मिल सकती है। अनपढ़ व्यक्ति ज्ञान और जानकारी के अथाह भंडार से वंचित रह जाता है। वह कुएँ के मेढक के समान अपनी संकीर्ण दुनिया में ही कैद रह जाता है। वह न तो अधिकारों का सही प्रयोग कर सकता है न ही जनसामान्य के लिए उपलब्ध सुख-सुविधाओं का लाभ उठा सकता है।

आज व्यक्ति का साक्षर होना अनिवार्य हो गया है। निरक्षरता एक दुर्गुण बन गया है। इसलिए आजकल हर कोई पढ़ना-लिखना चाहता है। सरकार तथा समाज की ओर से देश के हर नागरिक को साक्षर बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके लिए सभी स्थानों पर स्कूल खोले गए हैं। हर बालक को साक्षर बनाने के लिए अभियान चलाए गए हैं। इस नेक कार्य में जनता की भागीदारी आवश्यक है। इक्कीसवीं सदी में यदि भारत का हर नागरिक साक्षर  हो जाए तो यह हमारी महान उपलब्धि होगी।

निरक्षरता पर निबंध

निरक्षरता का सामान्य अर्थ है – अक्षरों की पहचान तक न होना। निरक्षर व्यक्ति के लिए तो ‘काला अक्षर भैंस बराबर होता है। जो व्यक्ति पढ़ना-लिखना एकदम नहीं जानता, अपना नाम तक नहीं पढ़-लिख सकता, सामने लिखी संख्या तक को नहीं पहचान सकता है उसे निरक्षर कहा जाता है। निरक्षर व्यक्ति न तो संसार को जान सकता है और न ही अपने साथ होने वाले लिखित व्यवहार को समझ सकता है, इसीलिए निरक्षरता को अभिशाप माना जाता है।

आज के अर्थात् इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करने वाले ज्ञान-विज्ञान के इस प्रगतिशील युग में भी कोई व्यक्ति या देश निरक्षर हो तो इसे एक त्रासदी के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता परन्तु यह तथ्य सत्य है कि स्वतंत्र भारत में शिक्षा का विस्तार हो जाने पर भी भारत में निरक्षरों तथा अनपढ़ों की बहुत अधिक संख्या है। इस बात को भली-भांति जानते हुए कि निरक्षर व्यक्ति को तरह-तरह की हानियां उठानी पड़ती हैं, उन्हें कई तरह की विषमताओं का शिकार होना पड़ता है, वे लोग साक्षर बनने का प्रयास नहीं करते हैं। यदि हम प्रगति तथा विकास कार्यों से प्राप्त हो सकने वाले सकल लाभ को प्राप्त करना चाहते हैं तो हम सबको साक्षर बनना होगा अर्थात् निरक्षरता को समाप्त करना होगा।

व्यक्तिगत स्तर पर भी निरक्षर व्यक्ति को कई तरह के कष्टों का सामना करना पड़ता है। वह न तो किसी को स्वयं कुशल-क्षेम जानने वाला पत्र ही लिख सकता है और न ही किसी से प्राप्त पत्र को पढ़ ही सकता है। निरक्षर व्यक्ति न तो कहीं मनीआर्डर भेज सकता है और न ही कहीं से आया मनीआर्डर अपने हस्ताक्षरों से प्राप्त कर सकता है, ऐसी दोनों स्थितियों में वह ठगा जा सकता है। देहाती निरक्षरों से तो अंगूठे लगवाकर जमींदार व महाजन उनकी जमीनों के टुकड़े तक हड़प कर चुके हैं। ऐसा अनेक बार होता देखा गया है, इसीलिए निरक्षरता को अभिशाप माना जाता है।

इस निरक्षरता के अभिशाप को मिटाने के लिए आजकल साक्षरता का अभियान जोर-शोर से चलाया जा रहा है। महानगरों, नगरों, कस्बों व देहातों में लोगों को साक्षर बनाने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। अधिकतर निरक्षर लोग मेहनत-मजदूरी करने वाले लोग होते हैं इसलिए उनके लिए सुबह-शाम घरों के पास पढ़ाई की व्यवस्था की जाती है। गृहणियों के लिए दोपहर के खाली समय में पढ़-लिख पाने की मुफ्त व्यवस्था की जाती है। इनके लिए पुस्तक कापी की भी मुफ्त व्यवस्था की जाती है। यहाँ तक कि घर-घर जाकर भी साक्षर बनाने के अभियान चलाये जा रहे हैं। इन सबसे लाभ उठाकर हम निरक्षरता के अभिशाप से मुक्ति पा सकते हैं। साक्षर होना या साक्षर बनाना आज के युग की विशेष आवश्यकता है।

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महान दार्शनिक अरस्तू ने शिक्षा के संबंध में कहा है-“निरक्षर होने से पैदा न होना अच्छा है।” इस कथन से शिक्षा का महत्व स्वत: सिद्ध हो जाता है। शिक्षा मानव को सुसंस्कृत बनाती है। शिक्षा के माध्यम से ही मनुष्य अपने असाध्य जीवन को साध्य बना सकता है। महात्मा गाँधी ने कहा है “शिक्षा से अभिप्राय बालक एवं मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा में निहित सर्वोत्तम शक्तियों के सर्वांगीण प्रगटीकरण से है।” साहित्यकारों ने विद्याहीन निरक्षर मनुष्य को पशु के समान बताया है।

आज भारत में करोड़ों लोग निरक्षर हैं। अधिकांश निरक्षर लोग गाँवों में हैं। हालाँकि गाँवों में शिक्षा का विकास हो रहा है, परंतु फिर भी निरक्षरों की संख्या गाँवों में सर्वाधिक है। हालाँकि सरकार का उद्देश्य इन लोगों को साक्षर बनाने के साथ-साथ कृषि विकास संबंधी जानकारी, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी तथा औद्योगिक शिक्षा प्रदान करना भी है।

भारत की अधिकांश जनता अशिक्षित है। किसी भी देश की उन्नति के लिए उस देश के नागरिकों का शिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है। जिससे वे व्यक्तिगत एवं सामाजिक रूप से अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सचेष्ट रहें। पंचवर्षीय योजनाओं में इसे स्थान दिया गया है जिससे कि निरक्षर स्त्री-पुरुष साक्षर होकर अपने दायित्वों को समझें और अपने जीवन का विकास करें।

निरक्षर मानव जीवन में साक्षरता का महत्वपूर्ण स्थान है। आधुनिक युग की जटिलताओं को देखते हुए निरक्षरों को शिक्षित करना अनिवार्य है। हमारी सामाजिक समस्याओं-जाति प्रथा, दहेज प्रथा, जनसंख्या नियंत्रण आदि का निवारण भी तभी संभव है जब हर व्यक्ति साक्षर हो। शिक्षा के माध्यम से ही निरक्षर स्त्री-पुरुषों का जीवन स्तर ऊँचा उठाया जा सकता है। साक्षरता का उद्देश्य मात्र अक्षर ज्ञान देना नहीं है, अपितु मनुष्य के संपूर्ण जीवन को उन्नत बनाना है।

आज देश भर में साक्षरता अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान में कई एन.जी.ओ. (गैर-सरकारी संगठन) सक्रिय हैं। परंतु हमारे देश से निरक्षरता पूर्णत: तभी मिटेगी, जब हर व्यक्ति प्रयास करेगा। हालांकि देश की सरकार के साथ-साथ विश्व बैंक भी हमारी मदद कर रही है। ताकि देश में कोई भी निरक्षर न रहे। इसके बावजूद हमें भी पूरी ईमानदारी से स्वयं प्रयास करने होंगे तभी प्रत्येक भारतीय साक्षर होगा।

Essay on illiteracy in Hindi

जीवन के लिए जिस प्रकार रोटी, कपड़ा और मकान की आवश्यकता होती है ठीक वैसे ही शिक्षा की भी आवश्यकता होती है। मनुष्य अपनी सामाजिक-परिस्थितियों के कारण यदि शिक्षा लेने में असमर्थ हो जाता है, तब उसे दोषी नहीं कहा जा सकता। लेकिन जिस व्यक्ति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति उसे शिक्षा प्रदान करने का अवसर प्रदान करती है, उस अवस्था में यदि वह शिक्षा नहीं लेता, तब निसंदेह उसकी गिनती पशुओं में की जानी चाहिए।

अब प्रश्न यह उठता है कि मनुष्य और पशु के बीच कौन-से ऐसे तत्व हैं, जो उसे पशु से अलग करते हैं? क्योंकि वे सभी गुण जो पशु में पाए जाते हैं, वे मनुष्य में भी पाए जाते हैं। विचार करने पर पता चलता है कि जिस प्रकार मनुष्य स्वार्थ-सेवा में लगा रहता, ठीक उसी प्रकार से पशु-पक्षी भी अपनी स्वार्थ-सेवा में लगे रहते हैं।

जिस प्रकार मनुष्य अपनी संतान से प्रेम करता है, ठीक उसी प्रकार से पशु-पक्षी भी अपनी संतान से प्रेम करते हैं। डंडे की मार से आप भी डरते हैं और पशु भी। इस संदर्भ में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि समानधर्मी प्राणियों में किसी प्रकार का अंतर है, तो वह केवल शिक्षा का है या फिर शिक्षा पर आधारित ज्ञान का है। जिसके अभाव में मनुष्य पशुवत जीवन व्यतीत करता है। हमारा समाज निरंतर प्रगति तो करता रहा, किंतु प्रगति के मापदंड शिक्षा के गलियारे से होकर नहीं जाते थे। हालांकि विद्वानों, शास्त्रों और गुरुओं की यहाँ कभी कमी नहीं हुई, किंतु शिक्षा बहुसंख्यक सामान्यजन की कभी न हो सकी। इसका प्रमुख कारण था प्रशासनिक कार्यपद्धति का ठीक ढंग से कार्य न करना। देश की अधिकांश आबादी गरीबी रेखा से हमेशा ही नीचे रहती आई है।

अपनी न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के लिए जनता को दिनभर कठोर परिश्रम करना पड़ता था, जिस कारण से वे शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दे सकते थे। इन सब बातों के अतिरिक्त अनेक आक्रमणकारी समय-समय पर भारतवर्ष पर आक्रमण करते आए हैं, जिस कारण से यहाँ के लोग अपने जीवन की सुरक्षा को प्राथमिकता देकर शिक्षा को गौण समझते रहे।

इसे जनता की शिक्षा के प्रति निष्क्रियता नहीं कहा जा सकता, किंतु विभिन्न शासकों ने ऐसे नियम-कानूनों की संरचना की जो लोगों को हर प्रकार के ज्ञान से अनभिज्ञ रखें, क्योंकि अज्ञानता, अशिक्षा और अनभिज्ञता गुलामी को स्थायित्त प्रदान करती है।

शिक्षा के अभाव में मनुष्य के भीतर किसी प्रकार की जागृति नहीं रहती। इसके अभाव में मनुष्य रचनात्मक कार्यों में भाग नहीं ले पाता और देश एवं राष्ट्र के कल्याण के विषय में सोचने की शक्ति का विकास करने में असमर्थ हो जाता है। शिक्षा के अभाव में व्यक्ति अपने प्राचीन साहित्य को पढ़कर ज्ञानार्जन करने में असमर्थ हो जाता है, जिससे उसे अपने गौरवशाली अतीत का बोध नहीं होता।

अशिक्षित व्यक्ति ने अपने जीवन के सही मायने तलाश पाता है और न ही अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षा प्रदान कर सकता है। शिक्षा का अभाव आत्म-कल्याण एवं राष्ट्र-कल्याण की भावना को भी समाप्त कर देता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए चलाए जा रहे अभियानों के चलते, राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रति जागृति की भावना फैलने लगी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ-साथ जनता ने शिक्षा के महत्व को भी समझा। लोगों के दिमाग में यह बात घर कर गई कि अशिक्षा ही उनकी समस्त कठिनाइयों और दुखों का कारण है। क्योंकि उनकी अशिक्षा का लाभ सेठ, साहूकार, वकील, पुलिस, जमींदार, व्यापारी केवल इसलिए उठा पाते हैं, क्योंकि उनके कार्यों की पेचीदगियों से ये लोग अनभिज्ञ हैं। देश में शिक्षा का स्तर बढ़ाने के लिए 1937 ई. में राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत की गई, ताकि जनता के बीच शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जा सके।

इस आंदोलन के तहत प्रौढ़ शिक्षा केंद्रों और रात्रि पाठशालाओं की स्थापना की गई। हालांकि अपने आरंभिक दौर में इस आंदोलन को बड़े जोश के साथ शुरू किया गया था, किंतु धीरे-धीरे करके यह आंदोलन 1947 तक आते-आते एकदम खोखला हो गया, किंतु 1947 के बाद इस दिशा में उचित कदम उठाए गए और शिक्षा-प्रसारण का अहम प्राथमिक लक्ष्य बन गया। लेकिन छह पंचवर्षीय योजनाओं के बाद भी भारत की तीन-चौथाई से भी अधिक जनसंख्या निरक्षर है।

इतनी बड़ी जनसंख्या का आजादी के 50-55 वर्षों तक निरक्षर बने रहना वास्तव में बेहद दुखदायी है। इसके दो महत्वपूर्ण कारण हैं, पहला, शिक्षा के व्यवसायिकरण ने उसे इतना अधिक महंगा बना दिया है कि उसका खर्च आम जनता के लिए वहन करना कठिन है। दूसरा, शिक्षा का सरकारी स्तर इतना अधिक गिर गया है कि आम लोगों का उससे मोहभंग हो गया है। इन सभी चीजों को ध्यान में रखकर हमें शिक्षा के नए मानदंड तय करने होंगे।

सरकार के साथ-साथ आम जनता को भी इस भागीरथ प्रयास में मदद करनी चाहिए, तभी हमारा देश शिक्षित और खुशहाल बन सकेगा।

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Essay on illiteracy in Hindi

हमारे देश में छ: करोड़ तीस लाख बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने स्कूल का मुंह नहीं देखा। जाहिर है। इसकी वजह भारत जैसे विकासशील देश की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि है। ऐसे में गरीब ग्रामीण परिवारों की ज्यादातर लड़कियों के लिए स्कूल जाना एक स्वप्न है। गांवों में यह देखकर दुःख होता है कि पांच से सात वर्ष की आयु की लड़कियां दस-दस घंटे काम करती हैं।

ऐसे परिवारों के बच्चे बहुत छेटी उम्र से ही अपने परिवार या अपने माता-पिता के काम में हाथ बंटाने लगते हैं। इस प्रकार जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं लड़कों के मुकाबले लड़कियों पर काम का बोझ बढ़ता जाता है।

वर्ष 1998-99 के आंकड़ों के अनुसार केरल और हिमाचल प्रदेश ही ऐसे राज्य हैं जहां छ: से चौदह वर्ष तक की स्कूल न जाने वाली लड़कियों की संख्या पांच प्रतिशत से कम है। स्त्री शिक्षा का स्तर शेष देश में चिन्ताजनक है। इसकी एक अहम् वजह यह भी है कि दूरदराज के कई ग्रामीण इलाकों में स्कूल प्रायः इतने दूर होते हैं कि परिवार वालों की राय में लड़कियों को वहां भेजना जोखिम भरा होता है। ग्रामीण इलाकों में महिला अध्यापकों के न होने के कारण भी लड़कियां स्कूल जाने से हिचकती हैं। या फिर वे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती हैं।

गांव ही नहीं शहरों में भी ऐसे बहुत से स्कूल हैं जहां अध्यापक हैं तो पढ़ने के लिए कमरे नहीं, यदि कमरे हैं तो अध्यापक नहीं हैं। यदि सब सुविधा है तो अध्यापक स्कूल से नदारत मिलेंगे।

विभिन्न राज्यों में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में स्कूलों के शिक्षकों के हजारों पद खाली पड़े हैं। उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय से जुड़ी स्थायी संसदीय समिति भी अपनी 93र्वी रिपोर्ट में इस तथ्य पर चिंता जता चुकी है। दूरदराज के गांवों तथा आदिवासी इलाकों में अव्वल तो स्कूलों की संख्या बहुत कम हैं जो हैं भी उनमें अध्यापक जाने में रुचि नहीं दिखाते। ग्रामीण बच्चों की सुविधा के लिए स्कूल एक किलोमीटर के दायरे में खोले गये हैं। इनका सर्वेक्षण करने पर पता चला कि इन स्कूलों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं।

स्कूलों की इमारत खस्ताहाल है। सर्वेक्षण के अनुसार 84 प्रतिशत स्कूलों में शौचालय नहीं पाये गये तथा 54 प्रतिशत स्कूलों में पीने का पानी नहीं था। पुस्तकालय, खेल के मैदान किताबों की बात तो दूर 12 प्रतिशत स्कूलों में केवल एक ही अध्यापक थे। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को सार्थक शिक्षा देने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

आज से 90 वर्ष पूर्व ‘सभी को शिक्षा नीति की परिकल्पना गोपाल कृष्ण गोखले ने की थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब भारत का संविधान बना तो उसमें भी चौदह साल तक के सभी बच्चों के लिए नि:शुल्क शिक्षा और अनिवार्य शिक्षा देने की बात कही गयी साथ ही यह भी कहा गया कि इस लक्ष्य को हमें 1960 तक हासिल कर लेना है। लेकिन यह लक्ष्य बीसवीं सदी तक तो पूरा हो नहीं सका अब इसे वर्ष 2010 तक के लिए बढ़ा दिया गया है।

मनुष्य के विकास में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है। शिक्षा से मनुष्य का जहां सर्वांगीण विकास होता है वहीं वह उसका आर्थिक और सामाजिक उत्थान करने की सामर्थ्य भी देती है। इस प्रकार बौद्धिक स्तर के साथ-साथ मनुष्य का जीवन स्तर भी ऊंचा उठता है, विशेषकर स्त्रियों में।

महिला शक्तिकरण में भी शिक्षा का प्रमुख योगदान है। लड़कियों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सरकार द्वारा समय-समय पर कई कार्यक्रम बनाये गये लेकिन उनमें साक्षरता की गति विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों में उतनी नहीं बढ़ी है जितनी बढ़नी चाहिए थी। यदि हम सरकार की मानें तो उसके अनुसार देश के 98 प्रतिशत जिलों में सरकारी साक्षरता अभियान चलाया जा रहा है। स्कूल की बात तो दूर लड़कियों को स्नातक तक की शिक्षा निःशुल्क देने की बात कही गयी है।

लड़कियां इतनी ऊंची कक्षाओं तक पहुंचे इसके लिए जरूरी है कि वे पहले स्कूल तो जाएं। हमारे संविधान तथा पंचवर्षीय योजनाओं में शिक्षाओं पर जोर दिया गया है लेकिन देश की कुल साक्षरता के आंकड़ों में लिंग भेद स्पष्ट नजर आता है।

देशभर में केरल, मेघालय तथा मिजोरम राज्य ऐसे हैं जहां स्त्री-पुरुष के बीच साक्षरता का अन्तर दस प्रतिशत से कम है। हम हमेशा इसी विवाद में उलझकर रह गये कि प्राथमिक शिक्षा को बुनियादी आधार बनाया जाए कि नहीं।

शिक्षा भले ही हमारे मूलभूत आवश्यकताओं में से एक हो पर सरकार शिक्षा पर कुल घरेलू सकल उत्पाद का मात्र छ: प्रतिशत व्यय करती है। इसमें प्राथमिक शिक्षा का हिस्सा आज भी नाम मात्र को है। बेहतर होगा कि निरक्षरता उन्मूलन के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में वहीं के पढ़े-लिखे युवाओं को जिम्मेदारी सौंपी जाए।

Niraksharata Par Nibandh in Hindi

हमारे देश में छ: करोड़ तीस लाख बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने स्कूल का मुंह नहीं देखा। जाहिर है इसकी वजह भारत जैसे विकासशील देश की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि है। ऐसे में गरीव ग्रामीण परिवारों को ज्यादातर लड़कियों के लिए स्कूल जाना एक स्वप्न है। गांवों में यह देखकर दु:ख होता है कि पांच से सात वर्ष की आयु की लड़कियां दस-दस घंटे काम करती हैं। ऐसे परिवारों के बच्चे बहुत छोटी उम्र से ही अपने परिवार या अपने माता-पिता के काम में हाथ बंटाने लगते हैं। इस प्रकार जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं लड़कों के मुकाबले लड़कियों पर काम का बोझ बढ़ता जाता है।

वर्ष 1998-99 के आंकड़ों के अनुसार केरल और हिमाचल प्रदेश ही ऐसे राज्य हैं। जहां छ; से चौदह वर्ष तक की स्कूल न जाने वाली लड़कियों की संख्या पांच प्रतिशत से कम है। स्त्री शिक्षा का स्तर शेष देश में चिन्ताजनक है। इसकी एक अहम वजह यह भी है कि दूरदराज के कई ग्रामीण इलाकों में स्कूल प्रायः इतने दूर होते हैं कि परिवार वालों की राय में लड़कियों को वहां भेजना जोखिम भरा होता है। ग्रामीण इलाकों में महिला अध्यापकों के न होने के कारण भी लड़कियां स्कूल जाने से हिचकती हैं। या फिर वे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती हैं।

गांव ही नहीं शहरों में भी ऐसे बहुत से स्कूल हैं। जहां अध्यापक हैं तो पढ़ने के लिए कमरे नहीं, यदि कमरे हैं तो अध्यापक नहीं हैं। यदि सर्व सुविधा है तो अध्यापक स्कूल से गायब मिलेंगे।

विभिन्न राज्यों में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में स्कूलों के शिक्षकों के हजारों पद खाली पड़े हैं। उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय से जुड़ी स्थायी संसदीय समिति भी अपनी 93वीं रिपोर्ट में इस तथ्य पर चिंता जता चुकी है। दूरदराज के गांवों तथा आदिवासी इलाकों में अव्वल तो स्कूलों की संख्या बहुत कम हैं।

जो हैं भी उनमें अध्यापक जाने में रुचि नहीं दिखाते। ग्रामीण बच्चों की सुविधा के लिए स्कल एक किलोमीटर के दायरे में खोले गये हैं। इनका सर्वेक्षण करने पर पता चला कि इन स्कूलों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। स्कूलों की इमारत खस्ताहाल है।

सर्वेक्षण के अनुसार 84 प्रतिशत स्कूलों में शौचालय नहीं पाये गये तथा 54 प्रतिशत स्कूलों में पीने का पानी नहीं था। पुस्तकालय, खेल के मैदान किताबों की बात तो दूर 12 प्रतिशत स्कूलों में केवल एक ही अध्यापक थे। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को सार्थक शिक्षा देने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। आज से 90 वर्ष पूर्व सभी को शिक्षा’ नीति की परिकल्पना गोपाल कृष्ण गोखले ने की थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब भारत का संविधान बना तो उसमें भी चौदह साल तक के सभी बच्चों के लिए निशुल्क शिक्षा और अनिवार्य शिक्षा देने की बात कही गयी साथ ही यह भी कहा गया कि इस लक्ष्य को हमें 1960 तक हासिल कर लेना है। लेकिन यह लक्ष्य बीसवीं सदी तक तो पूरा हो नहीं सका • अब इसे वर्ष 2010 तक के लिए बढ़ा दिया गया है।

मनुष्य के विकास में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है। शिक्षा से मनुष्य का जहां सवर्गीण विकास होता है वहीं वह उसका आर्थिक और सामाजिक उत्थान करने की सामर्थ्य भी देती है। इस प्रकार बौद्धिक स्तर के साथ-साथ मनुष्य का जीवन स्तर भी ऊंचा उठता है, विशेषकर स्त्रियों में महिला शक्तिकरण में भी शिक्षा का अहम योगदान है।

लड़कियों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सरकार द्वारा समय-समय पर कई कार्यक्रम बनाये गये लेकिन उनमें साक्षरता की गति विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों में उतनी नहीं बढ़ी हैं जितनी बढ़नी चाहिए थी।

यदि हम सरकार की मानें तो उसके अनुसार देश के 98 प्रतिशत जिलों में सरकारी साक्षरता अभियान चलाया जा रहा है। स्कूल की बात तो दूर लड़कियों को स्नातक तक की शिक्षा निशुल्क देने की बात कही गयी है। लड़कियां इतनी ऊंची कक्षाओं तक पहुँचें।

इसके लिए जरूरी है कि वे पहले स्कूल तो जाएं। हमारे संविधान तथा पंचवर्षीय योजनाओं में शिक्षाओं पर जोर दिया गया है लेकिन देश की कुल साक्षरता के आंकड़ों में लिंग भेद स्पष्ट नजर आता है। देशभर में केरल, मेघालय तथा मिजोरम राज्य ऐसे हैं जहां स्त्री पुरुष के बीच साक्षरता का अन्तर दस प्रतिशत से कम है।

हम हमेशा इसी विवाद में उलझकर रह गये कि प्राथमिक शिक्षा को बुनियादी आधार बनाया जाए कि नहीं। शिक्षा भले ही हमारे मूलभूत आवश्यकताओं में से एक हो पर सरकार शिक्षा पर कुल घरेलू सकल उत्पाद का मात्र छ: प्रतिशत व्यय करती है। इसमें प्राथमिक शिक्षा का हिस्सा आज भी नाम मात्र को है। बेहतर होगा कि निरक्षरता उन्मूलन के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में वहीं के पढ़े-लिखे युवाओं को जिम्मेदारी सौंपी जाए।

 

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