चलचित्र के लाभ और हानियाँ पर निबंध Hindi Essay on Cinema ke Labh aur Haniya

हेलो दोस्तों आज फिर में आपके लिए लाया हु चलचित्र के लाभ और हानियाँ पर निबंध । जैसा की हम सब जानते है मनुष्य पहले पत्थरों से खेलकर,
एक-दूसरे से बात करके अपना मनोरंजन करता था लेकिन अब उसके पास बहुत सारे तरीके उनमे से एक चलचित्र पर आज हम बात करेंगे। आज हम आपके लिए लाये है Essay on Cinema ke Labh aur Haniya की जानकारी जिससे आपको निबंध लिखने में बहुत मदद मिलेगी ।

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Essay on Cinema ke Labh aur Haniya

 

भूमिका :

प्राचीनकाल में मनुष्य आखेट करके, पत्थरों से खेलकर, एक-दूसरे से बात करके अपना मनोरंजन करता था, लेकिन सभ्यता के विकास के साथ-साथ वैज्ञानिकों ने नए-नए आविष्कार किए। मनोरंजन के नए-नए साधन हमारे सामने आए, जिनमें से ‘चलचित्र’ भी एक है। यह विज्ञान का अत्यन्त आश्चर्यजनक तथा महत्त्वपूर्ण आविष्कार है।

चलचित्र का इतिहास :

चलचित्र का अर्थ है चलता-फिरता चित्र। ये चित्र चलने के साथ-साथ बोलते भी हैं। ध्वनि तथा प्रकाश की सहायता से चलचित्र का आविष्कार किया गया है । चलचित्र की खोज का श्रेय अमेरिकन वैज्ञानिक ‘एडीसन’ को जाता है। प्रारंभ में ये चित्र मूक (बिना आवाज) होते थे।

तत्पश्चात् इन चित्रों को आवाज देने के प्रयास किए गए। कछ वर्षों बाद ‘डाउप्टे’ नामक वैज्ञानिक ने इस कार्य में सफलता प्राप्त की। आज इसका रंगीन तथा बढ़ा हुआ रूप भी हमारे समक्ष है।

मनोरंजन का महत्त्वपूर्ण साधन :

हर व्यक्ति के लिए मनोरंजन आवश्यक है। इसके बिना जीवन नीरस और बेरंग लगता है, जबकि मनोरंजन से जीवन में नवीन स्फूर्ति, नई शक्ति तथा जोश का संचार होता है। आज विज्ञान की बदौलत हमारे पास मनोरंजन के अनेक साधन हैं जैसे-दूरदर्शन, रेडियो, खेलकूद, चित्रकला, प्रदर्शनियाँ, बड़े-बड़े मेले इत्यादि।

लेकिन इन सभी में चलचित्र सबसे सस्ता, सुगम तथा लोकप्रिय साधन है। चलचित्र ने नाटक, एकांकी तथा रंगमंचीय कलाओं का भी स्थान ले लिया है।

चलचित्र के सदुपयोग से लाभ :

चलचित्र के सदुपयोग द्वारा शिक्षा प्रसार तथा समाज-सुधार के कार्यों में बहुत अधिक सफलता प्राप्त की जा सकती है। बाल-विवाह, विधवा-विवाह उल्लंघन, बाल-श्रम, छुआछूत, जात-पात आदि कुरीतियों को चलचित्र के माध्यम से संदेशात्मक रूप में दिखाया जा सकता है।

चलचित्रों के माध्यम से दर्शक उन विषयों पर विचार कर ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं तथा कुछ जागरूक व्यक्ति बुराइयों के खिलाफ लड़ भी सकते हैं। चलचित्र पर दिखाई जाने वाली ‘डाक्यूमेन्ट्री फिल्मे’ बहुत ज्ञानवर्धक होती हैं।

चलचित्र के दुरुपयोग से हानियाँ :

हर वस्तु का दूसरा पहलू भी होता है। समझदार व्यक्ति चलचित्र का सदुपयोग करके यदि लाभान्वित हो रहे हैं तो कुछ नासमझ लोग इसके दुरुपयोग से नैतिक पतन के रास्ते पर जा रहे हैं। चित्रपट पर गन्दे, भद्दे तथा अश्लील नृत्य दिखाए जाते हैं, बेढंगे हास्य कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं, जिनका दर्शकों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कुछ विद्यार्थी घर से भागकर या माता-पिता से झूठ बोलकर अश्लील चलचित्र देखने जाते हैं, जिसका उन पर कुप्रभाव पड़ता है।

वे चोरी, डकैती, बलात्कार, अपहरण आदि की जो घटनाएँ देखते हैं, उन्हीं को अपने जीवन में अपनाने लगते हैं, जिससे उनका समय भी बर्बाद होता है तथा चारित्रिक पतन भी होता है। अधिक चलचित्र हमारी सेहत पर भी बहुत प्रभाव डालते हैं। हमारी आँखों की रोशनी क्षीण होने लगती है तथा हमारे शरीर में आलस्य आ जाता है।

उपसंहार :

सिनेमा आज हमारे सामाजिक जीवन की आवश्यकता बन चका है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम चलचित्र को अपने मनोरंजन के लिए देखते हैं या फिर उसके आदी ही हो जाते हैं।

चलचित्र के लाभ और हानियाँ पर निबंध

मानव जीवन के लिए मनोरंजन की अत्यंत आवश्यकता है। मनोरंजन के कार्य तथा साधन कुछ क्षण के लिए मानव जीवन के गहन बोझ को कम करके व्यक्ति में उत्साह का संचालन कर देते हैं। मानव सृष्टि के आरंभ से ही मनोरंजन की आवश्यकता प्राणियों ने अनुभव की होगी और जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया वैसे-वैसे नवीनतम खोज इस अभाव को पूरा करने के लिए की गई।

वर्तमान काल में चारों ओर विज्ञान की तूती बोल रही है। मनोरंजन के क्षेत्र में जितने भी सुंदर अन्वेषण एवं आविष्कार हुए हैं, उनमें सिनेमा (चलचित्र) भी एक है। चलचित्र का आविष्कार १८९० ई. में टामस एल्वा एडीसन द्वारा अमेरिका में किया गया। जनसाधारण के सम्मुख सिनेमा पहली बार लंदन में ‘लुमैर’ द्वारा उपस्थित किया गया। भारत में पहले सिनेमा के संस्थापक ‘दादा साहब फाल्के’ समझे जाते हैं। उन्होंने पहला चलचित्र १९१३ में बनाया। भारतीय जनता ने इसकी भरि-भरि प्रशंसा की। आज इस व्यवसाय पर करोड़ों रुपया लगाया जा रहा है और विश्व में भारत का स्थान इस क्षेत्र में प्रथम है।

पहले-पहल चलचित्र जगत् में केवल मूक चित्रों का ही निर्माण होता था, पर धीरे-धीरे इसमें ध्वनिकरण होता गया। चलचित्र निर्माण में कैमरे का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह कैमरा एक विशेष प्रकार का बना होता है। इसके द्वारा ली गई स्थिर तसवीरों को क्रम से जब सिनेमा यंत्र पर घुमाया जाता है, तो चित्रों की चलती-फिरती छाया सामने के परदे पर पड़ती है और इस | प्रकार से शृंखलित कहानी हमारे सम्मुख क्रमपूर्वक चलती रहती है।

सिनेमा संसार में लगातार परिवर्तन व सुधार होते ही रहते हैं। आजकल रंगीन चित्रों की सरगर्मी है। अभिनय, गीत, नृत्य और कहानी चलचित्रों के प्रधान अंग हैं। सिनेमा में सारी कलाओं का संगम है। इसीलिए यह मनोरंजन का सबसे श्रेष्ठ साधन हो गया है। सिनेमा के प्रचार से हमें बहुत लाभ हैं। मनोविनोद के साथ-ही-साथ शिक्षा-प्रचार में भी इससे बहुत सहायता मिलती है। इसके द्वारा देश-विदेश के लोगों का रहन-सहन एवं कार्यकर्ताओं का परिचय बहुत ही सस्ते में हमको मिल जाता है। राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक चित्रों से देश में मनोवांछित सुधार भी किया जा सकता है। व्यापारोन्नति के लिए भी सिनेमा का योग बहुत ही लाभप्रद है।

उपर्युक्त लाभों के साथ ही सिनेमा से कुछ हानियाँ (दोष) भी हैं। नित्य प्रति सिनेमा देखने से आर्थिक हानि के साथ नेत्रों को ज्योति पर बुरा असर पड़ता है। फैशन का भूत भी सिनेमा के कारण ही भारतवासियों को चिपटा है। गंदे और अश्लील चित्रों को देखने से आचार भ्रष्ट हो रहा है।

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चलचित्र के लाभ और हानियाँ पर निबंध

चलचित्र अर्थात सिनेमा आधुनिक युग की महत्वपूर्ण देन है। सन् १९७०ई० के बाद से भारतीय समाज में चलचित्र का अत्यधिक प्रचार- प्रसार हुआ। यह नाटक-नौटंकी का आधुनिक रुप है जिसने अपने नवीन रुप में मानव जीवन और मानवीय समाज को सर्वांगीन रुप में प्रभावित किया है। सहित्य और कला के सामंजस्य द्वारा इससे मानवीय गतिविधियों को जीवन्त रुप में चित्रांकित कर मानव समाज का यह आवश्यक अंग बन गया है। आज चलचित्र निःसंदेह एक बड़े व्यापारिक संस्थान का रूप धारण कर चुका है। ऐसी स्थिति में इसके व्यापक प्रभाव का अध्ययन आवश्यक है।

चलचित्र न केवल मनोरंजन का एक आसान और सस्ता साधन है अपितु समाज के सागिन अध्ययन और रूपायन का माध्यम भी है। देशकाल और वातावरण के सटीक चित्रण द्वारा सामाजिक पारिदृश्य को चित्रपट पर उभारकर यह एक सफल आलोचक की भूमिका का निर्वाह करता है। चलचित्र में जीवन का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसकी संपूर्ण झांकी प्रस्तुत नही की जाती। समाज में बढ़ती हुई असामाजिक घटनाएं, आतंकवाद, नारी उत्पीड़न, शोषण, अन्धविश्वास, रूढ़िवादिता, जड़ता, बेरोजगाड़ी, अशिक्षा, मद्यपान की समस्या आदि का चित्रण कर उसके दुष्परिणामों से यह अवगत कराता है। साथ ही इनसे लड़ने की प्रेरणा भी प्रदान करता है। इतना ही नही पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र से जुड़ी विभिन्न समस्याओं का अंकन भी चलचित्र के द्वारा किया जाता है। चलचित्र साधारण जनता के हृदय पर सीधा और स्पष्ट प्रभाव डालता है। सामाजिक, राजनीतिक, पारिवारिक और सामयिक समस्याओं की सफल आलोचना कर यह सामाजिक दायित्व का पालन भी करता है।

चलचित्र के माध्यम से हम मानव जीवन के हर सम्भव पहलुओं का अध्ययन ही नहीं करते अपितु उसके परिणामों का प्रभाव भी रूपायित कर सकते हैं। इतना ही नहीं संपूर्ण विश्व की जीवन्त तसवीर इसके माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। राष्ट्रीय जीवन की विशेषताओं और कमजोरियों का अंकन कर चलचित्र राष्ट्रनिर्माण का कार्य भी करता है। वास्तव में चलचित्र किसी भी देश समाज और काल की संस्कृति का बाहक है। कभी कभी इसके दुस्परिणाम भी सामने आते हैं। किन्तु कोई भी चीज अपने आप में अच्छी या बुरी नहीं होती। उसका अच्छा या बुरा प्रभाव उसके प्रयोग पर निर्भर करता है। व्यावसायिकता की होड़ में कतिपय फिल्मकार वासना की कुत्सित गतिविधियों का प्रदर्शन भी इसके माध्यम से करते हैं। आज फिल्म मनोरंजन के साथ-साथ व्यसन का साधन भी हो गया है। जिसका समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। समाज के सामने यह अनुचित आदर्श भी पेश करता है।

यद्यपि इसके उचित निर्देशन के लिए सेंसर बोर्ड की स्थापना की गई है किन्तु यह कहाँ तक और किस तरह अपने दायित्व का पालन कर रही है यह कहना मुश्किल है। फिर भी यदि यह अपने कर्तव्य का उचित ढंग से पालन करे तो साधारण जन में ज्ञान की, जागरूकता की नई लहर चलचित्र के माध्यम से विकसित की जा सकती है।

हमारा यह कर्तव्य है कि मानव जीवन की इस विस्तृत प्रयोगशाला का जीवन के प्रति व्यापक दृष्टिकोण के विस्तार के लिए उचित प्रयोग करें।

चलचित्र के लाभ और हानियाँ पर निबंध

सिनेमा बीसवीं सदी में मानव जाति को मिले कुछ बेशकीमती वैज्ञानिक उपहारों में से एक है। इसने विश्व के मनोरंजन के परिदृश्य में एक क्रांति ला दी है क्योंकि इससे पहले नाटक, नौटंकी व त्योहारों के अवसर पर लगने वाले मेले ही लोगों के मनोरंजन का प्रमुख साधन थे। क्योंकि ऐसे समागम कभी-कभी ही आयोजित हुआ करते थे, अतः मनोरंजन के मामले में लोग सदा ही अतृप्त रहा करते थे। सिनेमा विश्व के लोगों के लिये मनोरंजन का एक उत्तम साधन बनकर सामने आया है क्योंकि इसे किसी भी वर्ग ,जाति या धर्म के लोग एक साथ देख सकते हैं तथा इसका आनन्द पूरा परिवार एक साथ बैठ कर उठा सकता है। यह मनोरंजन का एक सुलभ साधने बन गया है।

भारत में अंग्रेजों के शासन काल से ही फिल्में बनने का सिलसिला आरम्भ हुआ जिसका सफर मूक, संवाद के साथ मगर श्वेत-श्याम और फिर रंगीन फिलमों के दौर से गुजरा और आज भी भारतीय फिल्में पूरी दुनिया में बड़े चाव से देखी जाती हैं। लेकिन पुरानी फिल्मों और आज के दौर की फिल्मों में एक बड़ा अंतर है कि जहाँ पुरानी फिल्में समाज के सभी वर्गों को ध्यान में रखकर बनाई जाती थीं वहीं आज का सिनेमा पारिवारिक एवं नैतिक हितों को कई तरह से अनदेखी करता है।

जहाँ तक सिनेमा और समाज के आपसी सम्बंधों की बात है तो अब तक के अनुभवों से यह सिद्ध हो गया है कि दोनों अपनी-अपनी सीमा तक एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। हर दशक का सिनेमा तेजी से परिवर्तित होते समाज को दर्शाता है। सिनेमा और समाज एक दूसरे के पूरक भी है। व्यक्ति थोडी देर के लिये ही सही, अपने दुखपूर्ण संसार से बाहर आ जाता है। जिस प्रकार साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है उसी प्रकार सिनेमा भी समाज का दर्पण बनता दिखाई दे रहा है ।

चलचित्र के लाभ और हानियाँ पर निबंध

आज सिनेमा मनोरंजन एवं प्रबोधन का सबसे लोकप्रिय माध्यम है। लोग अक्सर फिल्म स्टार एवं उनकी उपलब्धियों के बारे में बात-चीत करते हैं। युवा पीढ़ी फिल्मी दुनिया के विषय में नवीनतम जानकारी प्राप्त करना चाहती है। नियमित रूप से सिनेमा जाने वालों। की संख्या निरंतर बढ़ रही है। इससे फिल्मी पत्रिकाओं एवं अन्य सम्बन्धित साप्ताहिकों की बिक्री भी बढ़ी है।

सिनेमा शिक्षा का एक बड़ा स्रोत है। विद्यार्थी अगर एक चीज़ के बारे में पढ़ने के साथ-साथ उसे देख भी लेता है तो उसकी जानकारी पूर्ण हो जाती है। इस तरह प्राप्त की गयी जानकारी सदैव स्मरण रहती है। हम बहुत सी बातें पढ़ते हैं किन्तु जब हम उन चीज़ों को परदे पर देख लेते हैं तो वह हमारे मस्तिष्क पर छप जाती हैं। सिनेमा हॉल में किसी फिल्म के माध्यम से हम कितने ही देशों की सैर कर लेते हैं उनके बारे में ज्ञान अर्जित कर लेते हैं चाहे हमारे पास वहां जाने का समय और पैसा है या नहीं। हम उनके जीवन, सभ्यता, संस्कार, रीतिरिवाज़ों के बारे में जान लेते हैं। हॉल में मैंने एक हिन्दी फिल्म देखी ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे‘ जिसमें स्विटज़रलैंड के खूबसूरत दृश्य हैं। यह फिल्म देखने के पश्चात् हम जान जायेंगे कि स्विस लोग कितने परिश्रमी है। हालांकि यह बहुत छोटा सा देश है तो भी इसे योजना बद्ध ढंग से कलात्मक ढंग से बनाया गया है। घरों, सड़कों, होटलों, रेलवेस्टेशनों एवं खेतों को बहुत सुन्दर ढंग से व्यवस्थित किया गया है। ऐसी अन्य बहुत सी फिल्में हैं जिनसे हमें न केवल शिक्षा मिलती है बल्कि रोमांच एवं मनोरंजन भी प्राप्त होता है।

सिनेमा हमें इतिहास, भूगोल, एवं विज्ञान सीखने में भी सहायता करता है। यह इन शुष्क विषयों को भी मनोरंजक ढंग से पढ़ाता है। टी. वी. एवं सिनेमा के व्यवसायी हमें इन विषयों के बारे विभिन्न फिल्में दिखाकर, विभिन्न उदाहरणों के साथ सिखाते हैं और इस तरह छोटे-छोटे बच्चे भी आसानी से उसे सीख जाते हैं। उदाहरण स्वरूप टी. वी. सीरियल ‘द स्ोड ऑफ टीपू सुल्तान’ एक सफल ऐतिहासिक सीरियल था जो दूरदर्शन पर दिखाया गया। यह न केवल मनोरजंक अपितु शिक्षाप्रद और ज्ञानवर्धक था। सिनेमा हमारा नैतिक उपदेशक व शिक्षक है।

प्रत्येक अच्छी फिल्म में कुछ न कुछ संदेश छिपा होता है। सावित्री फिल्म हमें दिखाती है कि एक पत्नी को अपने पति से कितना प्रेम था उसने मृत्यू पर भी विजय प्राप्त की। ‘कृष्ण सुदामा’ फिल्म में हम देखते हैं कैसे सुदामा प्रभुभक्ति के कारण दरिद्र से धनवान हो गया। ‘शहीद’ जैसी फिल्में हममें देशभक्ति की भावना जाग्रत करती है। किन्तु यह फिल्मों का केवल उजियारा पक्ष उजागर हुआ है।

अब हम दूसरे यानी इसके अंधियारे पक्ष के बारे में बात करेंगे। प्रत्येक गुलाब के साथ कांटे भी होते हैं। यह देखकर दु:ख होता है कि फिल्म उद्योग का उद्देश्य अब केवल पैसा कमाना है। फिल्म उत्पादक धन की आराधना करते हैं एवं आदर्शों एवं सिद्धान्तों पर कोई ध्यान नहीं देते। आजकल की फिल्मों ने युवा लड़के एवं लड़कियों के दिमाग पर गलत असर छोड़ा है। वह आधुनिक फैशन के दिवाने हो गये हैं। वह गन्दे अश्लील गाने गाते हैं। भद्दे अश्लील दृश्यों ने युवा वर्ग के दृष्टिकोण एवं चरित्र को बुरी तरह प्रभावित किया है।

 

अभी भी समय है फिल्म उद्योग को अपनी गहरी निद्रा से जागना चाहिये एवं ऐसी फिल्मों को बनाने के लिये निरूत्साहित करना चाहिये क्योंकि इन्होंने युवा वर्ग के मस्तिष्क में अनैतिकता के बीज बोये हैं। आज के बच्चे कल के प्रशासक होंगे। अतः उनमें त्याग, परिश्रम, ईमानदारी, निस्वार्थ भाव एवं अच्छे व्यवहार के गुणों का निरूपण करना चाहिये। फिल्मों में चरित्र के इन गुणों पर बल देना चाहिये।

फिल्मों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित करना चाहिये जैसे – निर्देशात्मक, सामाजिक, नैतिक, अंग-विक्षेप भिड़न्त, रोमांटिक, मनोरंजन एवं साहित्यक। जिससे सभी तरह के लोग अपनी रुचि की फिल्म देख कर मनोरंजन प्राप्त करें।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि सिनेमा द्वारा बहुत सा ज्ञान एवं मनोरंजन प्राप्त किया जा सकता है। यह मनोरंजन का सस्ता साधन है जो गरीब भी खरचने में समर्थ है। इससे लोगों का बहुत लाभ हो सकता है अगर सरकार एवं फिल्म निर्माता दोनों इस तरह की फिल्में बनाने पर राज़ी हों जो नैतिकता एवं कलात्मक रुचि को बढ़ावा दें।

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चलचित्र के लाभ और हानियाँ पर निबंध

 

मनुष्य के लिए मनोरंजन अत्यन्त आवश्यक है। आधुनिक युग में विज्ञान ने मानव को मनोरंजन के अनेक साधन प्रदान किए हैं जैसे-रेडियो, दूरदर्शन, फोटोग्राफी, चित्रकला, चलचित्र, खेलकूद व प्रदर्शनियाँ आदि। इनमें सबसे अधिक लोकप्रिय व सस्ता साधन चलचित्र है। आज के युग में इसका अपना विशेष स्थान है। यह वह साधन है जहाँ धनी हो या निर्धन, एक टिकट खरीद कर दो-तीन घंटे का समय एकान्त-शान्त व्यतीत कर सकता है।

चलचित्र जहाँ एक ओर मनोरंजन का अच्छा साधन है वहाँ दूसरी ओर शिक्षा का एक अच्छा माध्यम भी है। जिस वस्तु को जितना ज्ञान आँखों से देखकर होता है उसका उतना ही प्रभाव उस विषय को पढ़कर या सुनकर नहीं होता। विज्ञान, भूगोल, इतिहास आदि के पाठ विभिन्न देशों के रहन-सहन, वेशभूषा, परम्पराएँ व चलचित्र में प्रयुक्त अच्छी-सी कहानी, सुन्दर गीत या कविता, कर्णप्रिय संगीत और छायाचित्रों के माध्यम से प्रकृति के सुन्दर-से-सुन्दर दृश्य देखने को मिलते हैं।

ठाठे मारता हुआ समुद्र, बर्फ से ढकी पहाड़ों की चोटियों, लहलहाते हुए हरे-भरे खेत, कलकल करती नदियाँ, वन उपवनों में पशु-पक्षियों की अठखेलियाँ आदि मनोहारी दृश्य चलचित्र के पर्दे पर साकार हो उठते हैं और हम उनका थोड़े से समय में तथा एक ही स्थान पर बैठे हुए भरपूर आनन्द प्राप्त कर लेते हैं। चलचित्र से हमारे ज्ञान में वृद्धि होती है। जिन कुरीतियों को दूर करने में महान उपदेशक, प्रचारक तथा शिक्षक असफल हो जाते हैं उनको दूर करने में शिक्षाप्रद फिल्में बहुत सहायक सिद्ध अच्छे चित्र सामाजिक चेतना तथा राष्ट्रीयता की भावना को जागृत करते हैं तथा पारिवारिक समस्याओं को सुलझाने में सहायता करते हैं। मदर इण्डिया, झांसी की रानी, जागृति, उपकार, शहीद भगतसिंह जैसे अनेक चलचित्रों ने हमें बहुत प्रभावित किया है। चलचित्र द्वारा विज्ञापन देकर व्यापार में भी आशातीत सफलता प्राप्त की जा सकती है। भारत सरकार के फिल्म प्रभाग द्वारा बनाए गए ‘वृत्तचित्र’ इस दिशा में अच्छा योगदान कर रहे हैं।

चलचित्र का दूसरा पहलू हानिकारक है। पैसा कमाने के लोभ में फिल्म निर्माता ऐसे चलचित्र बना डालते हैं जिन्हें देखकर देश के नवयुवकों का चारित्रिक पतन होने लगता है। विद्यार्थियों में सिनेमा देखने की बुरी आदत पड़ जाती है जिससे वे विद्यालय से भाग कर तथा घर से पैसे चुराकर सिनेमा देखने जाने लगते हैं। उनकी आँखों पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है। वे चोरी, डकैती, अपहरण, कत्ल, बलात्कार आदि के दृश्य देखकर उनका अनुकरण करने का प्रयास करते हैं। अतः चलचित्र का चयन और उपयोग सोच-समझकर किया जाना चाहिए।

चलचित्र के लाभ और हानियाँ पर निबंध

मानव-समाज उन्नति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहता है। अपने-अपने कार्य-क्षेत्र में मनुष्य अथक परिश्रम करता है, ताकि समाज में सम्मान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त कर सके। परन्तु जीवन के कर्म-क्षेत्र की भाग-दौड़ के चलते मनुष्य को मनोरंजन की भी आवश्यकता होती है, ताकि वह कुछ समय के लिए मानसिक शान्ति एवं प्रसन्नता का अनुभव करने के उपरान्त पुनः उत्साह से अपने कार्य-क्षेत्र में परिश्रम कर सके। मनुष्य के मनोरंजन के लिए सिनेमा (चल-चित्र) एक सस्ता, सुलभ साधन है। मनोरंजन के अन्य साधनों की तुलना में सिनेमा समाज में अधिक लोकप्रिय भी है। यही कारण है कि सिनेमा का समाज पर सीधा प्रभाव पड़ता है। सिनेमा में दिखाए गए पात्रों, उनकी जीवनचर्या और घटनाओं से आज का समाज सर्वाधिक प्रभावित है।

भारत में सिनेमा के आरम्भिक काल में धार्मिक कथा-चित्रों का अधिक निर्माण किया जाता था। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति | को बचाए रखने के साथ-साथ धार्मिक चल-चित्रों में समाज के  लिए उपयोगी संदेश भी होते थे। सामाजिक चल-चित्रों में भी समाज को दिशा देने का प्रयत्न किया जाता था। बाद में गीत-संगीत के आगमन से सिनेमा मनोरंजन का एक सशक्त  माध्यम बन गया था, परन्तु मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक मर्यादाओं का भी सिनेमा में ध्यान रखा जाता था। सिनेमा की कथाओं में बाल-विवाह, दहेज आदि सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया जाता था और रोचक घटनाओं के द्वारा समाज को आपसी भाईचारे का, जात-पांत के भेद-भाव को मिटाने का संदेश दिया जाता था।

वस्तुतः सिनेमा के संदेश को भारतीय समाज शीघ्र ग्रहण कर लेता है। आरम्भ से ही सिनेमा का भारतीय समाज पर प्रभाव रहा है। सिनेमा के नायक-नायिकाओं के रहन-सहन को भारतीय समाज तुरन्त अपना लेता है।

विशेषतः युवा-पीढ़ी पर सिनेमा का अधिक प्रभाव पड़ता है। सिनेमा के गीत-संगीत के स्वर्णिम दौर में भारतीय युवा-पीढ़ी नगर, गाँव में, गली-मुहल्लों में सिनेमा के गीत गाते देखी जाती थी। हिंसा-प्रधान सिनेमा ने भी भारतीय समाज को प्रभावित किया है। हिंसा के मार्ग पर चलकर जीवन में सफलता प्राप्त करने वाले सिनेमा-नायक को देखकर भारतीय नौजवान स्पष्टतः अधिक आक्रामक हुआ है।

अनेक अपराधियों ने पुलिस की गिरफ्त में आने के उपरान्त स्वीकार किया कि उन्हें इस अपराध की प्रेरणा सिनेमा से मिली। वर्तमान सिनेमा भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को भूल गया है। अब सिनेमा में समाज को दिशा-निर्देश देने के लिए आदर्श चरित्र प्रस्तुत नहीं किए जाते। भारतीय सिनेमा अब स्वस्थ मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है। उस पर पश्चिमी संस्कृति हावी हो रही है, जिसकी आड़ में नग्नता, अश्लीलता का प्रदर्शन किया जा रहा है।

इसका दुष्प्रभाव भी सीधा समाज पर पड़ रहा है। पहले की तुलना में आज के भारतीय समाज का स्वरूप ही बदल गया है। विशेषतः युवा-पीढ़ी की जीवनचर्या, उसके विचारों में अकल्पनीय परिवर्तन देखने को मिल रहा है और यह सिनेमा की ही देन है।

वास्वव में सिनेमा ने अब बड़े उद्योग का रूप ले लिया है। अब सिनेमा स्वस्थ मनोरंजन अथवा समाज का पथ-प्रदर्शन करने का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि व्यापार के रूप में केवल अपनी उन्नति के प्रति प्रयत्नशील है। अपनी उन्नति के लिए सिनेमा समाज की चिन्ता से मुक्त होकर दर्शकों को हिंसा, नग्नता, अश्लीलता, कुविचार बेच रहा है। आज सिनेमा में अपराधियों को राजसी ठाट-बाट का जीवन व्यतीत करते दिखाया जाता है।

एक प्रेमी को निर्दयता से अपनी प्रेमिका की हत्या करते हुए दिखाया जाता है। इतना ही नहीं, नौजवानों को नशीले पदार्थों का सेवन करते हुए तथा अपराध एवं व्यभिचार में लिप्त दिखाया जाता है। आज समाज को ऐसे सिनेमा के बहिष्कार की आवश्यकता है, ताकि वर्तमान एवं भावी पीढ़ी को घातक दुष्प्रभावों से बचाया जा सके।

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