स्वावलंबन पर निबन्ध | Essay on Self-Reliance in Hindi

 

हेलो दोस्तों आज फिर में आपके लिए लाया हु Essay on Self-Reliance in Hindi पर पुरा आर्टिकल लेकर आया हु। Self-Reliancein को हिंदी में स्वावलंबन कहते है स्वावलंबन का अर्थ है अपने बलबूते पर कार्य करने वाला व्यक्ति । स्वावलंबन ही तो सफलता की कुंजी है।आज हम आपके लिए लाये है Essay on Self-Reliance in Hindi में जो आपको निबंध लिखने में बहुत मदद करंगे।

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स्वावलंबन पर निबन्ध

स्वावलंबन का अर्थ है अपने बलबूते पर कार्य करने वाला व्यक्ति । स्वावलंबन ही तो सफलता की कुंजी है। स्वावलंबी व्यक्ति जीवन में कीर्ति तथा वैभव दोनों ही अर्जित करता है। दूसरों के सहारे जीने वाला व्यक्ति सदा ही तिरस्कार का पात्र बनता है।

निरंतर निरादर तथा तिरस्कार पाने के कारण उसमें हीन भावना घर कर लेती है। जीवन का यह सच केवल व्यक्ति विशेष पर ही नहीं, अपितु हर जाति, हर राष्ट्र, हर धर्म पर लागू होता है।

हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने भी स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान देशवासियों में जातीय गौरव का भाव जगाने हेतु स्वावलंबन का संदेश दिया था। सवावलंबन के मार्ग पर चलकर ही व्यक्ति, जाति, समाज, राष्ट्र, संसार शिखर तक पहुँच सकते हैं। किसी कवि ने सही ही कहा है-

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स्वावलंबन पर निबन्ध

पुराने जमाने की बात है। अरब के लोगों में हातिमताई अपनी उदारता के लिए दूर-दूर तक मशहूर था। वह सबको खुले हाथों दान देता था। सब उसकी तारीफ करते थे। _एक दिन उसने बहुत बड़ी दावत दी। जो चाहे, वह उसमें शामिल हो सकता था। हातिमताई कुछ सरदारों को लेकर दूर के मेहमानों को बुलावा देने जा रहा था।

रास्ते में देखता क्या है कि एक लकड़हारे ने लकाईयां काटकर एक गट्ठर तैयार किया है, उसकी गुजर-बसर लकड़ियां बेचकर ही होती थी। वह पसीना-पसीना हो रहा था, थककर चूर-चूर हो गया था। हातिमताई ने उससे कहा-“ओ भाई! जब हातिमताई दावत देता है, तो तुम क्यों इतनी मेहनत  करते हो दावत में शरीक क्यों नहीं हो जाते?”

लकड़हारे ने जवाब दिया-“जो अपनी रोटी आप कमाते हैं उन्हें किसी हातिमताई की उदारता  की आवश्यकता नहीं होती।”

हातिमताई भौचक्का होकर उसे देखता रह गया।

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स्वावलम्बन अथवा आत्मनिर्भरता दोनों का वास्तविक अर्थ एक ही है-अपने सहारे रहना अर्थात् अपने आप पर निर्भर रहना। ये दोनों शब्द स्वयं परिश्रम करके, सब प्रकार के दुःख-कष्ट सह कर भी अपने पैरों पर खड़े रहने की शिक्षा और प्रेरणा देने वाले शब्द हैं। यह हमारी विजय का प्रथम सोपान है। इस पर चढ़कर हम गन्तव्य-पथ पर पहुँच पाते हैं। इसके द्वारा ही हम सृष्टि के कण-कण को वश में कर लेते हैं। गाँधी जी ने भी कहा है कि वही व्यक्ति सबसे अधिक दुःखी है जो दूसरों पर निर्भर रहता है।

मनुस्मृति में कहा गया है – जो व्यक्ति बैठा है, उसका भाग्य भी बैठा है और जो व्यक्ति सोता है, उसका भाग्य भी सो जाता है, परन्तु जो व्याक्त अपना कार्य स्वय करता है, केवल उसी का भाग्य उसके। हाथ में होता है। अतः सांसारिक दुखों से मुक्ति पाने की रामबाण दवा है – स्वावलम्बन ।

न स्वावलम्बी या आत्मनिर्भर व्यक्ति ही सही अर्थों में जान पाता है कि संसार में दुःख-पीड़ा क्या होते हैं तथा सुख-सुविधा का क्या मूल्य एवं महत्त्व हुआ करता है। वह ही समझ सकता है कि मान-अपमान किसे कहते हैं? अपमान की पीडा क्या होती है? परावलम्बी व्यक्ति को तो हमेशा मान-अपमान की चिन्ता त्याग कर, व्यक्ति होते हुए भी व्यक्तित्वहीन बनकर जीवन गुजार देना पड़ता है।

एक स्वतंत्र व स्वावलम्बी व्यक्ति ही मुक्तभाव से सोच-विचार कर के उचित कदम उठा सकता है। उसके द्वारा किए गए परिश्रम से बहने वाले पसीने की प्रत्येक बूंद मोती के समान बहुमूल्य होती है। स्वावलम्बन हमारी जीवन-नौका की पतवार है। यह ही हमारा पथ-प्रदर्शक है। इस कारण से मानव-जीवन में इसकी अत्यन्त महत्ता है।

विश्व के इतिहास में अनेकों ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जिन्होंने स्वावलम्बन से ही जीवन की ऊँचाइयों को छुआ था। अब्राहम लिंकन स्वावलम्बन से ही अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे। मैक्डानल एक अमिक से इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री बने थे। फोर्ड इसी के बल पर विश्व के सबसे धनी व्यक्ति बने थे। भारतीय इतिहास में भी शकराचार्य, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, स्वामी रामतीर्थ, राष्ट्रपिता गाँधी जी. एकलव्य, लाल बहादुर शास्त्री आदि महापुरुषों के स्वावलम्बन-शक्ति के उदाहरण भरे पड़े।

अनुचित लाड़-प्यार, मायामोह, आलस्य, भाग्यवाद, अन्धविश्वास आदि स्वावलम्बन में बाधाएँ उत्पन्न करते हैं। इनके अतिरिक्त बच्चों को हतोत्साहित करना या उन पर अंकुश लगाना भी उनके विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं।

वास्तव में ये सभी स्वावलम्बन के शत्रु हैं। अतः इनसे दूर रहना ही हितकर है। स्वावलम्बन की महिमा अपरम्पार है। परिश्रमी को सदा ही सुखद फल की प्राप्ति हुई है।

आज का व्यक्ति अधिक-से-अधिक धन तथा सुख प्राप्त करना तो चाहता है। पर वह दूसरों को लूट-खसोट कर प्राप्त करना चाहता है अपने परिश्रम और स्वयं पर विश्वास व निष्ठा रखकर नहीं। इसीलिए वह स्वतंत्र होकर भी परतंत्र और। दखी है। इस स्थिति से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है और वह है स्वावलम्बी एवं आत्मनिर्भर बनना।

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