Satsangati ka Mahatva par Nibandh in Hindi सत्संगति का महत्व पर निबंध

हेलो दोस्तों आज फिर में आपके लिए लाया हु Satsangati ka Mahatva par Nibandh पर पुरा आर्टिकल लेकर आया हु। अच्छे लोगों की Satsangati आदमी को कहा से कहा पंहुचा देती है। अच्छी संगति पारस के समान होती है इसलिए आप अपने बच्चो की संगति पर पूरा ध्यान दे। इस आर्टिकल में हम आपके लिए लाये है सत्संगति का महत्व की पूरी जानकारी जो आपको अपने बच्चे का होमवर्क करवाने में बहुत मदद मिलेगी।

 

satsangati ka mahatva par nibandh in hindi

सत्संगति का महत्व पर निबंध

प्रस्तावना :

‘सत्संगति’ का अर्थ है-अच्छे लोगों की संगति, सज्जन व्यक्तियों का सम्पर्क तथा श्रेष्ठ व्यक्तियों का साथ। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और इसीलिए उसे मित्रों की आवश्यकता होती है। यह संगति जो उसे मिलती है, वह अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी। अच्छी संगति पारस के समान है। जिस प्रकार पारस के छूने से लोहा भी सोना बन जाता है, उसी प्रकार सत्संगति के प्रभाव से दुष्ट व्यक्ति भी देवता समान बन जाता है, लेकिन यदि व्यक्ति को बुरी संगति मिलती है तो उसका जीवन नारकीय हो जाता है।

सत्संगति के सुप्रभाव :

सत्संग की महिमा अनूठी है। व्यक्ति जैसी संगति में रहता है, वह वैसा ही बन जाता है। इसके कुछ ज्वलंत उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हैं-एक ही स्वाति बूंद केले के गर्भ में पड़कर कपूर बनती है, सीप में पड़ने पर मोती बन जाती है और साँप के मुंह में गिरने पर विष बन जाती है। इसी प्रकार पुष्प की सत्संगति में रहने से कीड़ा भी देवताओं पर चढ़ने योग्य हो जाता है।

महर्षि वाल्मीकि रत्नाकर नाम के एक ब्राह्मण थे। भीलो की संगति में रहकर वह डाकू बन गया लेकिन जब वही डाकू देवर्षि नारद की संगति में आया तो तपस्वी बन गया और ‘महर्षि वाल्मीकि’ नाम से ‘रामायण’ की रचना कर डाली।

गन्दे पानी का नाला भी पवित्र भागीरथी से मिलकर गंगाजल बन जाता है। लकड़ी के सम्पर्क में आने पर लोहा भी पानी में तैरने लगता है। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब सत्संगति ने अपने अच्छे परिणाम दिखाए हैं और कुसंगति ने दुष्परिणाम। सत्संगति हमारी अज्ञानता को दूरकर वाणी को सत्य तथा पवित्र बनाती है, यह पाप को दूर करती है तथा पवित्रता प्रदान करती है।

विद्यार्थी जीवन में सत्संगति का महत्व :

विद्यार्थी काल बहुत नाजुक दौर होता है। इस समय बालमन चंचल होता है इसलिए वह अच्छे बुरे का भेद नहीं जानता। हर विद्यार्थी को चाहिए कि वह निष्ठावान, प्रतिभाशाली सच्चे तथा अच्छे विद्यार्थी से ही मित्रता करें और झूठ बोलने वाले, समय पर कार्य न करने वाले, धूम्रपान करने वाले लड़कों से मित्रता न करें।

एक बार कुसंगति में पड़ जाने पर उससे बाहर आना बहुत मुश्किल होता है। परिश्रमी बने तथा परिश्रमी व्यक्ति को ही अपना मित्र बनाएँ। इससे भावी जीवन में बहुत सहायता मिलेगी।

कुसंगति के कुप्रभाव :

उन्नतिशील व्यक्ति को अपने चारों ओर के समाज तथा व्यक्तियों के साथ बहुत सोच-समझकर मित्रता स्थापित करनी चाहिए क्योंकि मनुष्य का मन जल जैसा स्वभाव वाला होता है। दोनों बहत तेजी से नीचे गिरते हैं, लेकिन ऊपर उठाने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है।

कुसंगति काम, क्रोध, मद, मोह, ईर्ष्या, वैर-भाव पैदा करने वाली होती है। बुरे व्यक्ति की समाज में कोई इज्जत नहीं होती इसलिए कुसंगति को त्यागकर सत्संगति को अपनाना चाहिए।

उपसंहार :

अतः उन्नति की एकमात्र सीढ़ी सत्संगति है। किसी कवि ने ठीक ही कहा है–“जैसी संगति बैठिए, तैसो ही फल दीन।” अर्थात् इंसान ‘ जैसी संगति में बैठता है, वह भी वैसा ही बन जाता है। सत्संगति की राह पर चलकर ही हमारे जीवन की नैया भवसागर से पार जा सकती है।

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मनुष्य के चरित्र-निर्माण में संगति का बहुत प्रभाव पड़ता है। हमारे शास्त्रों में सत्संगति को बहुत महत्त्व दिया गया है। सत्संगति अर्थात सच्चरित्र व्यक्तियों के सम्पर्क में रहना, उनसे सम्बन्ध बनाना । सच्चरित्र व्यक्तियों, सज्जनों, विद्वानों आदि की संगति से साधारण व्यक्ति भी महत्त्वपूर्ण बन जाता है। सत्संगति मनुष्य को सदैव धर्म-कर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है और बुराइयों से बचाव के दिशा-निर्देश देती है।

सत्संगति से ही मनुष्य में मानवीय गुण उत्पन्न होते हैं और उसका जीवन सार्थक बनता है। सत्संगति में ज्ञानहीन मनुष्य को भी विद्वान बनाने की सामर्थ्य होती है। सत्संगति वास्तव में मनुष्य के व्यक्तित्व को निखारने का कार्य करती है और उसमें सद्गुणों का संचार करती है।

इस पृथ्वी पर जन्म लेने वाला प्रत्येक बालक अबोध होता है। उस पर सर्वप्रथम परिवार की संगति का प्रभाव पड़ता है। बड़ा होकर बालक घर से बाहर निकलकर विद्यालय में ज्ञान प्राप्त करता है और शिक्षकों, मित्रों, आदि की संगति का उस पर बहुत प्रभाव पड़ता है। धीरे-धीरे आयु बढ़ने के साथ मनुष्य जीवन का अर्थ समझने का प्रयास करता है और उसकी संगति के अनुसार ही जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण बनता है।

सत्संगति मनुष्य को उच्च विचारों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है और उसके चरित्र-बल को बढ़ाती है, जबकि कुसंगति से मनुष्य के चरित्र में निरन्तर गिरावट आती है और मनुष्य पथभ्रष्ट होकर स्वयं अपना बहुमूल्य जीवन तबाह कर लेता है।

मानव-जीवन ईश्वर की अमूल्य देन है। मनुष्य इस पृथ्वी पर धर्म-कर्म के पथ पर चलते हुए मानव-समाज का विकास करने के लिए जन्म लेता है। सत्संगति जीवन को अर्थपूर्ण बनाने के लिए प्रेरित करती है, ताकि मानव-समाज उन्नति कर सके। स्पष्टतया कुसंगति मनुष्य को पतन के मार्ग पर ले जाती है और सम्पूर्ण मानव-जाति के लिए अहितकर सिद्ध होती है। कुसंगति से मनुष्य में अनेक बुराइयाँ जन्म लेने लगती हैं। कुसंगति मनुष्य को व्यसनी, व्यभिचारी बना देती है और ऐसे व्यक्ति मानव-समाज की सुख-शांति भंग करने के साथ स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य करते हैं।

स्पष्टतया सद्विचारों , सज्जनों से ही मानव-समाज की सुख-शांति स्थिर रह सकती है। सद्विचार मनुष्य को कर्तव्यों का पालन करना सिखाते हैं और उनसे मनुष्य में संघर्ष की भावना जन्म लेती है। संघर्ष से ही मनुष्य उन्नति करता है और उसे सुख-सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। सद्विचारों से मनुष्य को मर्यादा में रहने की प्रेरणा मिलती है और मर्यादा में रहकर ही मनुष्य समाज की सुख-शांति बनाए रख सकता है।

दूसरी ओर कुसंगति से मनुष्य की शक्ति क्षीण होती है। उसमें संघर्ष की भावना समाप्त होने लगती है और वह कामचोर बन जाता है। ऐसे व्यक्ति सदैव दूसरों की धन-सम्पत्ति पर आनन्द उठाने को ही जीवन समझते हैं और मर्यादाएँ लांघते हुए वे समाज के लिए खतरा बनते रहते हैं। चोर, डकैत, धोखेबाज बुराई के रास्ते पर अनेक खतरे उठाने के लिए तैयार रहते हैं, परन्तु उनमें ईमानदारी से परिश्रम करने की क्षमता नहीं रहती। वे एक बार में अधिकाधिक धन लूटकर महीनों आराम से रहने को ही जीवन का आनन्द समझते हैं।

ऐसे लोग समाज की सुख-शांति तो भंग करते ही हैं, अंततः अकाल मृत्यु का भी शिकार बनते हैं। अवसर मिलने पर लोग चोर, डकैतों पर हमला कर देते हैं अथवा वे पुलिस मुठभेड़ में मारे जाते हैं।

सार्थक जीवन के लिए मनुष्य को सत्संगति की ही आवश्यकता होती है। सज्जनों की संगति में ही मनुष्य को जीवन के वास्तविक अर्थ का ज्ञान होता है। साधुजनों की प्रेरणा से ही मनुष्य जीवन के मूल्य को पहचानता है। वह सदैव बुराई के रास्ते से बचा रहता है, ताकि अपने मूल्यवान जीवन को नष्ट होने से बचा सके।

सत्संगति से ही मनुष्य को यह ज्ञान होता है कि यह जीवन बार-बार प्राप्त नहीं होता। सौभाग्य से प्राप्त हुए जीवन को सार्थक बनाने के लिए सत्य के मार्ग पर चलना आवश्यक है। सत्य के मार्ग पर चलकर ही मनुष्य महान कार्य करता है और मानव-समाज को दिशा देता है। अतः समाज के विकास के लिए सत्संगति महत्त्वपूर्ण है।

Satsangati ka Mahatva par Nibandh in Hindi

सत्संगति से तात्पर्य है सज्जनों की संगति में रहना, उनके गुणों को अपनाना तथा उनके अच्छे विचारों को अपने जीवन में उतारना। सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य को किसी-न-किसी का संग अवश्य चाहिए। यह संगति जो वह पाता है अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी। यदि उसकी संगति अच्छी है तो उसका जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होता है और यदि यह संगति बुरी हुई तो उसका जीवन _ संगति का मनुष्य के जीवन पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

वह जैसी संगति में रहता है उस पर उसका वैसा ही प्रभाव पड़ता है। एक ही स्वाति बूंद केले के गर्भ में पड़कर कपूर बनती है, सीप में पड़ जाती है तो मोती बन जाती है और यदि साँप के मुँह में पड़ जाती है तो विष बन जाती है। इसी प्रकार पारस के छूने से लोहा सोने में बदल जाता है। फूलों की संगति में रहने से कीड़ा भी देवताओं के मस्तक पर चढ़ जाता है।

महर्षि बाल्मीकि रत्नाकर नामक ब्राह्मण थे। किन्तु भीलों की संगति में रहकर डाकू बन गये। परन्तु बाद में वही डाकू देवर्षि नारद की संगति में आने से तपस्वी बनकर महर्षि बाल्मीकि से नाम से प्रसिद्ध हुए। ऐसे ही अंगुलिमाल नामक भयंकर डाकू भगवान बुद्ध की संगति पाकर महात्मा बन गया।

गन्दे जल का नाला भी पवित्र-पावनी भागीरथी में मिलकर गंगा जल बन जाता है। अच्छे व्यक्ति की संगति का फल अच्छा ही होता है।

किसी कवि ने ठीक ही कहा है – “जैसी संगति बैठिए, तैसो ही फल दीन।

जो व्यक्ति जीवन में ऊँचा उठना चाहता है उसे समाज में अच्छे लोगों से सम्पर्क स्थापित करना चाहिए क्योंकि मनुष्य के मन पर इसका प्रभाव शीघ्र ही होता है। मानव मन तथा जल एक से ही स्वभाव के होते हैं। जब ये दोनों गिरते हैं तो शीघ्रता से गिरते हैं परन्तु इन्हें ऊपर उठने में बड़ा प्रयत्न करना पड़ता है। कुसंगति में पड़ने वाले व्यक्ति का समाज में बिल्कुल आदर नहीं होता। वह जीवन में गिरता ही चला जाता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को कुसंगति से दूर रहना चाहिए। तथा उत्तम लोगों से सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए।

बुद्धिमान व्यक्ति सदैव सज्जनों के सम्पर्क में रहते हैं तथा अपने जीवन को भी वैसा ही बनाने का प्रयत्न करते हैं। उन्हें सत्संगति की पतवार से अपने जीवन रूपी नौका को भवसागर से पार लगाने का प्रयत्न करना चाहिए। सत्संगति से ही वह ऊँचे-से-ऊँचे पहुँच सकता है और समाज में सम्मान भी प्राप्त कर सकता है।

 

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सत्संगति का महत्व पर निबंध

संगति का प्रभाव मानव जीवन पर अवश्य पड़ता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए वह समाज के बिना नहीं रह सकता। समाज में रहने के कारण वह किसी न किसी की संगत जरूर करेगा। यदि संगत अच्छी है तो वह गुणवान होगा और यदि कुसंगत है तो उसमें कई बुराइयां होंगी। संगति दो प्रकार की होती है। इनमें पहली है सत्संगत अर्थात् अच्छे लोगों की संगत तथा दूसरी है कुसंगत अर्थात् बुरे लोगों की संगत। अच्छे लोगों की संगत से जहां मान सम्मान में बढ़ोतरी होती है वहीं वह उन्नति दिलाती है। कोई भी व्यक्ति जन्म से बुरा भला नहीं होता। वह समाज में रहकर ही भला या बुरा बनता है।

जन्म के बाद से बच्चा तीन-चार वर्ष की आयु तक ज्यादातर समय घर में ही रहता है इसलिए इस दौरान वह अपने माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों से काफी कुछ सीखता है। उसके माता-पिता के जैसे संस्कार होंगे वह वैसे ग्रहण करेगा। इसके बाद से वह घर से बाहर निकलने लगता है और समाज से काफी कुछ सीखता है।

अच्छी संगत सच्चरित्रता का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है कि-

सठसुधरहिसत्संगति पाई।
पारस परसि कुधातु सुहाई॥

अर्थात् पारस के संपर्क में आने से जैसे लोहा सोना बन जाता है उसी प्रकार सत्संगति करने से बुरा आदमी भी सुधर जाता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है उस पर समाज का अच्छा और बुरा दोनों प्रकार का प्रभाव पड़ता है। कुछ लोग बचपन से ही अच्छी संगति के कारण अच्छाई की तरफ मुड़ते हैं। कुछ बुरी संगति के कारण अवगुणों की तरफ जाते हैं। अच्छी संगति वाला व्यक्ति सदा सत्यवादी, ईमानदार तथा विश्वास के योग्य होता है। वह सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म तथा अच्छाई-बुराई को समझता है। इन गुण-अवगुणों में से वह केवल गुण ग्रहण करता है। सत्संगति का महत्व बताते हुए गुरु गोविन्द सिंह जी ने कहा है कि-

जो साधुन सारणी परे तिनके कथन विचार
दंत जीभ जिमी राखि है, दुष्ट अरिष्ट संहार

अर्थात् जो लोग सज्जनों की छत्रछाया में रहते हैं उन्हें किसी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा है कि जैसे दांतों से घिरी जीभ सुरक्षित रहती है उसी प्रकार गुरुभक्त लोग भी दुष्टों और दुर्भाग्य से काफी दूर रहते हैं। अवगुणों की तरफ वह कभी नहीं मुड़ता है। सत्संगति वाला व्यक्ति चरित्रवान होता है। चरित्र की श्रेष्ठता ही उसे श्रेष्ठता प्रदान करती है। सत्संगति पाकर वह अपने जीवन को आदर्श बना लेता है तथा सुख, शांति और संतोष से जीता है। संसार का सारा सुख और वैभव उसे प्राप्त होता है। उसके सम्पर्क में आकर बुरा भी अच्छा बनने का प्रयत्न करता है।

सत्संगति वाले व्यक्ति का जीवन चंदन के वृक्ष के समान होता है। इस वृक्ष की सुगन्ध मv साँप या विषधर उससे लिपटे रहते हैं लेकिन चंदन का वृक्ष अपनी सुगन्ध नहीं छोड़ता है। इसी प्रकार कुसंगति वाले व्यक्ति सत्संगति वाले का कुछ भी नुकसान नहीं कर सकते हैं। सत्संगति वाला व्यक्ति स्वयं अपने परिवार, समाज तथा राष्ट्र की एक मूल्यवान सम्पत्ति होता है। वह सभी को लाभ पहुँचाता है। कहा भी गया है कि सत्संग पाप, ताप और दैत्य का तत्काल नाश कर देता है।

सत्संगति साधु तथा सज्जनों की संगति है। जो हर प्रकार वंदनीय तथा गुणों की खान होते हैं, जो अवगुणों को सद्गुणों में बदलते हैं। वे समाज के उत्तम प्रकृति के व्यक्ति होते हैं जिन पर संत-समाज श्रद्धा रखता है। हमें सत्संगति दो प्रकार से मिल सकती है। प्रथम, सज्जन तथा साधु पुरुषों के सम्पर्क से तथा दूसरी अच्छी पुस्तकों से। दोनों प्रकार की संगति से कोई भी मनुष्य विवेकी, ज्ञानी तथा चरित्रवान बन सकता है।

कुसंगति का असर किसी भी व्यक्ति पर बड़ी आसानी से पड़ जाता है। यदि आप कुसंगति वाले के साथ थोड़ी देर के लिए खड़े भी हो गये तो जिन लोगों ने आपको उनके साथ खड़े देखा है। उनकी नजरों में आप कुसंगति वाले हो गये। इसके लिए आप लाख सफाई देते रहें कि मैं तो वैसे ही खड़ा था या मुझे उन्होंने रोक लिया था। अच्छी संगत के साथ उठने बैठने पर कोई कुछ नहीं कहता।

Satsangati ka Mahatva par Nibandh in Hindi

मनुष्य का जीवन अपने आस-पास से प्रभावित होता है। मूलरूप से । मानव के विचारों तथा कार्यों को उसके संस्कार, वंश, परंपराओं द्वारा ही दिशा मिलती है। यदि मनुष्य को अच्छा वातावरण मिलता है तो वह कल्याण के मार्ग पर चलता है, यदि वह दूषित वातावरण में रहता है तो उसके कार्य भी उससे प्रभावित हो जाते हैं।

संगति का प्रभाव व अनिवार्यता-मनुष्य अधिकतर जिस वातावरण और संगति में अपना समय व्यतीत करता है, उस पर उसका प्रभाव अनिवार्य रूप से पड़ता है। मनुष्य ही नहीं, वरन् पशुओं व वनस्पतियों तक पर इसका असर होता है। मांसाहारी पशु को यदि शाकाहारी प्राणी के साथ रखा जाए तो उसकी आदतें स्वयं परिवर्तित हो जाती हैं। इसी प्रकार यदि मनुष्य को अधिक समय तक मानव से दूर पशु-संगति में रखा जाए तो वह शनैः-शनैः मनुष्य-स्वभाव छोड़कर पशु-प्रवृत्ति ही अपना लेता है। कमला तथा रामू भेड़िया बालक के उदाहरण प्रसिद्ध हैं।

सत्संगति का अर्थ-सत्संगति का अर्थ है अच्छी संगति। वास्तव में सत्संगति शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-‘सत्’ और ‘संगति’ अर्थात् अच्छी संगति। अच्छी संगति का अर्थ है ऐसे सत्पुरुषों के साथ निवास, जिनके विचार अच्छी दिशा की ओर ले जाएँ।

सत्संगति के लाभ-सत्संगति के अनेक लाभ हैं। सत्संगति मनुष्य को सन्मार्ग की ओर अग्रसर करती है। इससे दुष्ट व्यक्ति श्रेष्ठ बन जाते हैं, पर पुण्यात्मा, दुराचारी सदाचारी हो जाते हैं। ऋषियों के प्रभाव से वाल्मीकी कवि बन गए। संतों के प्रभाव से आत्मा के मलिन भाव दूर हो जाते हैं तथा वह निर्मल बन जाती है।

सज्जनों के पास शुद्ध मन तथा ज्ञान का विशाल भंडर होता है। उसके अनुभवों को प्राप्त करके मूर्ख भी विद्वान् बन जाते हैं। सत्पुरुषों की संगति से मनुष्य के दुर्गुण दूर होकर सद्गुणों का विकास होता है। उनके हृदय में भी आशा और धैर्य का संचार होता है। सज्जनों के कारण उनका भी यश गाया जाता है।

कबीर का कथन है-

कबिरा संगत साधु की, हरै और की व्याधि,
संगत बुरी असाधु की, आठों पहर उपाधि।

सत्संगति के प्रभाव से मनुष्य के चरित्र का विकास होता है। वह अपना और संसार का भी कल्याण कर सकता है। सत्संगति अल्प समय में ही व्यक्ति की जीवन-दिशा को अनोखा मोड़ प्रदान कर देती हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने उचित ही कहा है-

एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी से ही आध,

तुलसी संगत साधु की, हरै कोटि अपराध।

जो विद्यार्थी संस्कारी छात्र की संगति में रहते हैं, उनका चरित्र श्रेष्ठ होता है। उनसे समाज व राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़ती है। कुसंगति से हानि-कुसंगति में लाभ की आशा करना व्यर्थ है। कुसंगति से पुरुष का विनाश निश्चित है। कुसंगति के प्रभाव से मनस्वी पुरुष भी अच्छे कार्य करने में असमर्थ हो जाते हैं।

कुसंगति में बँधे रहने के कारण वे चाहकर भी अच्छा कार्य नहीं कर पाते हैं। जो छात्र कुसंगति में पड़ जाते हैं, वे अनेक व्यसन सीख जाते हैं, जिनका प्रभाव उनके जीवन पर बहुत बुरा पड़ता है। उनके लिए प्रगति के मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। उनका मस्तिष्क अच्छे-बुरे का भेद करने में असमर्थ हो जाता है। उनमें अनुशासनहीनता आ जाती है। गलत दृष्टिकोण रखने के कारण ऐसे छात्र पतन के गर्त में गिर जाते हैं। वे देश के प्रति अपने उत्तरदायित्व तथा कर्त्तव्य को भूल जाते हैं।

पं. रामचंद्र शुक्ल ने ठीक ही लिखा है-‘

कुसंग का ज्वार सबसे भयानक होता है। किसी युवा पुरुष की संगति बुरी होगी तो वह उसके पैर में बँधी चक्की के समान होगी, जो उसे दिन पर दिन अवनति के गड्ढे में गिराती जाएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देनेवाली बाहु के समान होगी, जो उसे निरंतर उन्नति की ओर उठाती जाएगी।’ वास्तव में सत्संगति वह पारस है, जो जीवन रूपी लोहे को कंचन बना देती है। मानव-जीवन की सर्वांगीण उन्नति के लिए सत्संगति आवश्यक है। इसके माध्यम से हम व्यक्तिगत लाभ तो प्राप्त करेंगे ही, साथ-साथ अपने देश | के उत्तरदायी तथा निष्ठावान नागरिक बन सकेंगे।

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