विज्ञान से लाभ और हानि पर निबंध vigyan se labh hani essay in hindi

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हेलो दोस्तों आज फिर में आपके लिए लाया हु vigyan se labh hani essay in hindi पर पुरा आर्टिकल लेकर आया हु। विज्ञान से लाभ और हानि पर निबंध आपके बहुत काम आएगा इससे आप अपनी जानकारी के साथ बच्चो का स्कूल में भी ये पूछा जा सकता है। इस आर्टिकल में हम आपके लिए लाये है विज्ञान से लाभ और हानि पर निबंध की पूरी जानकारी

Vigyan se labh hani essay in hindi

विज्ञान से लाभ और हानि पर  निबंध vigyan se labh hani essay in hindi 3

बीसवीं शताब्दी के महानतम वैज्ञानिक और भौतिकी में नोबेल शास्त्र का पुरस्कार जीतने वाले अल्बर्ट आइंस्टीन का कहना था कि विज्ञान के विभिन्न आविष्कार जहाँ मनुष्यता के लिए वरदान हैं, वहीं अभिशाप भी हैं। आइस्टीन की यह बात अपनी जगह सौ फीसदी सत्य है। विभिन्न वैज्ञानिक अविष्कारों-रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, कंप्यूटर, रेल, हवाई जहाज, टेलीफोन, चिकित्सा के क्षेत्र में अनेक उपकरणों व औषधियों के निर्माण आदि से मनुष्य को काफी राहत मिली है। उससे समय की बचत हुई है और अब उसे पहले के मुकाबले श्रम भी उतना नहीं करना पड़ता। वहीं दूसरी और परमाणु शक्ति के दुरुपयोग को लेकर आज दुनिया आतंकित है।

विनाशकारी हथियारों व आयुधों के निर्माण के कारण ऐसा लगता है कि आज दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी है। कहने का आशय यह है कि वैज्ञानिक आविष्कारों का नकारात्मक प्रयोग करना एक सीमा के बाद अभिशाप भी बन जाता है।

विगत दस दशकों में विज्ञान की अभूतपूर्व समुन्नति हुई है। चिकित्सा के क्षेत्र में, आवागमन के क्षेत्र में, युद्ध सामग्री निर्माण के क्षेत्र में, वस्तुओं के परिरक्षण के क्षेत्र में, छपाई के क्षेत्र में, संचार साधनों तथा प्रसारण के क्षेत्रों में, सुविधापूर्ण जीवन जीने के क्षेत्र में और न जाने कितने क्षेत्रों में विज्ञान ने अपनी उपादेयता प्रमाणित की है। आज सैकड़ों  लोगों द्वारा सम्पन्न किया जाने वाला भारवाही कार्य क्रेनें मिनटों में कर देती हैं।

अरबों- खरबों के जोड़, घटा, गुणा, भाग सेकण्डों में कम्प्यूटर अथवा संगणक कर डालता है। लम्बी दूरियां हवाई जहाज द्वारा अल्प समय में तय कर ली जाती हैं। रक्त ट्रांसफ्यूजन द्वारा मरणासन्न व्यक्ति की जान बचाई जा सकती है। डाइलेसिस पर रक्तशोधन करके विषाक्त रक्त को शुद्ध किया जाता है और आदमी काफी समय तक जीवित रह सकता है। इसके अतिरिक्त, संगीत तथा मनोरंजन के इतने साधन बाजार में उपलब्ध हो गए हैं कि आप बड़े से बड़े स्वर साधक तथा कलाकार को घर बैठे ही सुन सकते हैं, देख सकते हैं तथा उसकी साधना का आनन्द उठा सकते हैं। यह सब संभव कैसे हुआ? विज्ञान के द्वारा।

विज्ञान मानव श्रम को बचाता है, उसे इतनी सुविधाएं देता है कि वह अन्ततः सुविधाभोगी ही रहना चाहता है। परिश्रम करने से वह घबराने लगता है, थक जाता है और पुनः सुविधाओं की खोज में जुट जाता है। विज्ञान का दुरुपयोग होने से भी कई हानियां होती हैं। परमाणु शक्ति का उपयोग बमों को बनाने हेतु होता देखकर पूरा विश्व आतंकित है। परमाण्विक अस्त्रों की यह दौड़ हमें कहां पहुंचायेगी, हमें ज्ञात नहीं है।

विज्ञान के वरदान-टी.वी., द्रुतगामी वाहन, मनोरंजन के साधन, इन्टरनेट, डी.टी.एच. आदि बड़े पैमाने पर प्रयुक्त हो रहे हैं। अतः वे सब वरदान होने की बजाय अभिशाप बनकर हमारी युवा पीढ़ी तथा बच्चों की मानसिकता पर कुप्रभाव डाल रहे हैं। विज्ञान के आविष्कारों व कुप्रयोग से गरीबों व अमीरों के बीच का अन्तर भी बढ़ा है। लोग भुक्त-भोगी, विलासी तथा कर्महीन पाषाण बनकर रह गये हैं। यह तथ्य मानवजाति के उज्ज्वल भविष्य की ओर इंगित नहीं करते।

आंकड़े बताते हैं कि भारत में सुविधाएं बढ़ जाने के कारण, वैज्ञानिक चिकित्सा उपकरण आम जनता को भी सुलभ होने की वजह से लोगों के जीवन की गुणवत्ता में काफी सुधार आ गया है। पहले औसत आयु यदि 48 वर्ष थी तो अब वह 63 वर्ष तक के स्तर को छूने लगी है। किन्तु, इस क्रान्ति का फायदा उठाने वाले भी साधन सम्पन्न तथा ऊंची पंहुच वाले लोग हैं। चाहे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान हो, सफदरजंग, लोहिया या लोकनायक अस्पताल हो, जान-पहचान होने वालों की कोई पंक्ति नहीं होती, कोई नम्बर नहीं होता। गरीब अपना नम्बर आते-आते परलोकगामी जाते हैं और साधन सम्पन्न लोग अपने साधनों के बल पर गरीबों की आयु, उनके गुर्दे, आंखें, हाथ और पैर सब कुछ छीन लेते हैं।

संस्कृत में एक बहुत बढ़िया कहावत है- “अति सर्वत्र वर्जयेत्” अर्थात् किसी वस्तु का सीमा से ज्यादा उपयोग/उपभोग नहीं करना चाहिए। विज्ञान के उपयोग के क्षेत्र में भी यही कहावत लागू होती है। विज्ञान को भी सीमा के भीतर ही अपनाना गुणकारी होगा। सीमा से ज्यादा इसका उपयोग किया जाएगा तो राष्ट्र आलसी, निकम्मा एवं विवेकशून्य होता चला जाएगा। उसमें संघर्ष करने की शक्ति नहीं रहेगी। ऐसी दशा आने पर हमें प्रत्येक दिशा से निराशा ही मिलेगी।

वैसे तो विज्ञान का अत्यधिक उपयोग हर देश के लिए विनाशकारी है, किन्तु, भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह और भी अनिष्टकर है। आजकल हमारे देश में मोटरकारों तथा स्वचालित वाहनों का उपयोग काफी बढ़ रहा है। इसकी वजह से प्रदूषण भी बढ़ रहा है। लेकिन प्रदूषण की चिन्ता इसलिए नहीं की जा रही कि उसका प्रभाव अकेले एक पर ही नहीं, पूरे समाज पर पड़ता है जबकि कार का सुख केवल एक व्यक्ति और उसका परिवार भोगता है। अतः कार रखना जरूरी है। चीन में ऐसा नहीं है, वहां कार खरीदने की भी स्वीकृति लेनी पड़ती है जिसमें वह देखा जाता है कि जो व्यक्ति कार खरीदना चाहता है, उसका व्यवसाय क्या है, उसे तत्काल गन्तव्य तक पहुंचना कहां तक जरूरी है और कार खरीदने के लिए उसने बचत किस प्रकार की है।

कहीं उसने सरकारी टैक्सों की चोरी तो नहीं की है। संबंधित व्यक्ति के पास क्या इतनी जगह है कि वह कार खड़ी कर सके, यह सब जांच होने पर ही कार खरीदने की अनुमति दी जाती है। यहां सब विपरीत है। निष्कर्ष यह है कि अनावश्यक रूप से वैज्ञानिक सुविधाओं अथवा विज्ञान के उपहारों का उपयोग हममें अनेक प्रकार के दुर्गुणों तथा दुर्भावनाओं को जन्म देता है। इसलिए इसके लाभों को हमें एक सीमा तक ही अपनाना चाहिए क्योंकि लाभों के साथ-साथ विज्ञान की ऊपर लिखी हानियां भी कम नहीं हैं।

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Written by

Romi Sharma

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