एकता का महत्व पर निबंध – Ekta ka Mahatva Hindi mai

हेलो दोस्तों आज फिर में आपके लिए लाया हु एकता का महत्व पर निबंध पर पुरा आर्टिकल लेकर आया हु। अकेला सैनिक शत्रुओं से डरकर भाग जाता है लेकिन कई सैनिक मिलकर दुश्मन के छक्के छुड़ा देते हैं। इस तरह की कई कहावते अपने सुनी होंगी इससे पता चलता है की संगठन में ही शक्ति है इस आर्टिकल में हम आपके लिए लाये है Ekta ka Mahatva पर निबंध की पूरी जानकारी जो आपको अपने बच्चे का होमवर्क करवाने में बहुत मदद मिलेगी।

Ekta ka Mahatva

Ekta ka Mahatva Essay in Hindi

प्रस्तावना : 

संगठन में ही शक्ति है’ इस बात को कोई भी नहीं झुठला सकता। एकता ही सब शक्तियों का मूल है। किसी भी परिवार, राष्ट्र, समाज या विश्व की उन्नति संगठन पर ही निर्भर करती है। संगठन से निर्बल व्यक्ति भी बलवान बन जाता है, और वह सुख तथा सफलता प्राप्त कर सकता है।

संगठन का महत्व :

संगठन की महत्ता अनमोल और अवर्णनीय है। अकेला धागा कमजोर होता है, आसानी से टूट जाता है। लेकिल अनेक धागों के मेल से बनी रस्सी बड़े-बड़े हाथियों को भी अपने वश में कर लेती है। पानी की अकेली बूंद बेमोल होती है, लेकिन जब बूंद इकट्ठी होकर नदी बन जाती है तो उनका जल गंगाजल बन जाता है।

छोटी-छोटी ईंटों के मेल से बड़ा महल बनकर तैयार हो जाता है। अकेला सैनिक शत्रुओं से डरकर भाग जाता है लेकिन कई सैनिक मिलकर दुश्मन के छक्के छुड़ा देते हैं। अनेकों मधुमक्खियाँ मिलकर एक बड़ा छत्ता तैयार कर लेती है और शहद देती है। किसी ने सच ही कहा है, “अकेला चना फाड़ नहीं फोड़ सकता।”

संगठन की आवश्यकता :

प्रत्येक व्यक्ति संगठन की शक्ति से परिचित है तभी तो बड़ा परिवार होने से कुछ नहीं होता। यदि वह संगठित न हो तो कोई भी उन्हें हानि पहुँचा सकता है। प्रायः बड़े-बड़े उद्योगों में इसी संगठन के बल पर श्रमिक अपनी माँगें मँगवाने में सफल हो जाते हैं।

यदि ये मजदूर संगठन न होते, मजदूर एकत्रित न होते, तो पूँजीपति तो उन्हें कब का अपना शिकार बना चुके होते। संगठन की आवश्यकता हर स्थान पर होती है।

चाहे वह संस्था छोटी हो या बड़ी, संगठन के बिना कार्य पूरा नहीं हो सकता। जिस परिवार, जाति या देश में जितना अधिक संगठन होता है, वह उतना ही अधिक उन्नति करता है और दूसरे लोग उससे डरते भी हैं।

संगठन के अभाव में हानियाँ :

संगठन के अभाव में हानियाँ ही हानियाँ हैं। इतिहास गवाह है कि भारतवर्ष की परतंत्रता का सबसे बड़ा कारण संगठन की कमी थी। अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और शासन करो’ वाली नीति अपनाकर हिन्दू और मुसलमानों को अलग कर दिया और देश पर शासन किया।

लेकिन जब हम संगठित हो गए तो अंग्रेजों को देश छोड़कर भागना पड़ा। वर्तमान युग में जो इतनी चोरियाँ, डकैतियाँ, लूटपाट हो रही हैं, वे सब संगठन के अभाव के कारण है। आज परिवारों में बड़े-बूढ़े नहीं रहते, इसीलिए बाहरी लोग आकर परिवारों को लूट लेते हैं। पहले सभी भाई साथ रहते थे इसीलिए बाहरी व्यक्ति घर में घुसने से डरता था।

इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण कन्नौज नरेश जयचंद तथा दिल्ली सम्राट पृथ्वीराज है। ये दोनों आपसी फूट की वजह मा से अपना राज्य गँवा बैठे, साथ ही मृत्यु को भी प्राप्त हुए। यदि आज के युग में हिन्दू-मुस्लिम साथ-साथ होते, तो फिर कौन आतंकवादी होता? शायद कोई भी नहीं।

उपसंहार :

संगठन की शक्ति के द्वारा ही हम अपने बाहरी तथा आन्तरिक शत्रुओं का डटकर मुकाबला कर सकते हैं। अतः हमारा यह कर्त्तव्य है कि हम अपने पारिवारिक, राष्ट्रीय तथा सामाजिक हित के लिए संगठित होकर रहें।

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मिलजुल कर कार्य करने की शक्ति को ही संगठन या एकता कहते हैं। संगठन सब प्रकार की शक्तियों का मूल है। कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितना भी समृद्ध हो, शक्तिशाली हो अथवा बुद्धिमान हो. अकेले अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता है। वह केवल दूसरों के सहयोग से ही अपनी आवश्यकताओं को पूरा | कर सकता है। कोई भी परिवार, समाज तथा राष्ट्र अपनी उन्नति संगठित हुए। बिना नहीं कर सकता है।

बिना संगठन के कोई भी कार्य संभव नहीं है। यह हम | भली-भाँति जानते हैं कि सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण भी पाँच तत्त्वों के मेल से हुआ संगठन में असीमित शक्ति होती है। संगठित होकर ही कोई भी समाज सुख-समृद्धि तथा सफलता को प्राप्त कर सकता है। ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सम्मुख हैं जो इस बात के प्रमाण हैं।

अकेले धागे को कोई भी आसानी से तोड़ सकता है परन्तु अनेक धागों के मेल से बनी रस्सी द्वारा बड़े-से-बड़े हाथी को आसानी से बाँधा जा सकता है। अकेली पानी की बूँद का कोई महत्त्व नहीं होता, यदि जब ये बूँदें मिलकर नदी का रूप धारण कर लेती हैं तो वह नदी अपने प्रवाह के रास्ते में आने वाले बड़े-से-बड़े पेड़ों और शिलाओं (चट्टानों) को भी बहा ले जाती है। इतिहास साक्षी है कि जो देश, जातियाँ तथा कुटुम्ब जितने अधिक संगठित रहे हैं उनका संसार में उतना ही अधिक बोलबाला रहा है।

हम भली-भाँति जानते हैं कि भारतवर्ष की परतन्त्रता का मूल कारण हमारे अन्दर संगठन की कमी थी। अंग्रेजों ने इस बात का लाभ उठाया। उन्होंने हम भारतवासियों में फूट डालकर हमें गुलाम बना लिया था। परन्तु जब हमने संगठित होकर उनसे संघर्ष किया तो हमारा देश स्वतंत्र हो गया। यह थी संगठन (एकता) की शक्ति। आज हमें इसकी अत्यन्त आवश्यकता है।

संगठित होकर ही मजदूर अपने हितों की रक्षा करने में समर्थ हो पाते हैं। आज के संघर्षशील युग में, संगठित होकर ही हम अधिक सुखी और समृद्धिशाली बन सकेंगे। आज कोई भी देश, जाति. संस्था अथवा समाज चाहे वह बड़ा हो या छोटा हो बिना संगठन के जीवित नहीं रह सकते हैं।

हमारे देश भारत को आजकल अनेक शत्रु राष्ट्रों की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इनके अतिरिक्त कुछ आन्तरिक शत्रु भी हैं जो हमारे देश को नष्ट करने पर तुले हुए हैं। यदि हम इन बाह्य तथा आन्तरिक शत्रुओं का सामना करना चाहते हैं तो हमें संगठित होकर रहना होगा।

अतः हमें अपने पारिवारिक हित के लिए, अपने समाज तथा देश के हित के लिए सभी भेदभावों को भुला कर संगठित होकर रहना चाहिए।

एकता का महत्व पर निबंध

एक समय की बात है कि कबूतरों का एक दल आसमान में भोजन की तलाश में उड़ता रहुआ जा रहा था। गलती से वह दल भटककर ऐसे प्रदेश के ऊपर से गुजरा, जहां भयंकर अकाल पड़ा था। कबूतरों का सरदार चिंतित था। कबूतरों के शरीर की शक्ति समाप्त होती जा रही थी। शीघ्र ही कुछ दाना मिलना जरूरी था। दल का युवा कबूतर सबसे नीचे उड़ रहा था। भोजन नजर आने पर उसे ही बाकी दल को सूचित करना था।

बहुत समय उड़ने के बाद कहीं वह दल सूखाग्रस्त क्षेत्र से बाहर आया। नीचे हरियाली नजर आने लगी तो भोजन मिलने की उम्मीद बनी। युवा कबूतर और नीचे उड़ान भरने लगा। तभी उसे नीचे खेत में बहुत-सा अन्न बिखरा नजर आया-“चाचा, नीचे एक खेत में बहुत सारा दाना बिखरा पड़ा है। हम सबका पेट भर जाएगा।”

सरदार ने सूचना पाते ही कबूतरों को नीचे उतरकर – खेत में बिखरा दाना चुगने का आदेश दिया। सारा दल नीचे उतरा और दाना चुगने लगा। वास्तव में वह दाना पक्षी पकड़ने वाले एक बहेलिए ने बिखेर रखा था। ऊपर पेड़ पर तना था उसका जाल । जैसे ही कबूतर दल दाना चुगने लगा, जाल उन पर आ गिरा। सारे कबूतर फंस गए।

कबूतरों के सरदार ने माथा पीटा-“ओह! यह तो हमें फंसाने के लिए फैलाया गया जाल था। भूख ने मेरी अक्ल पर पर्दा डाल दिया था। मुझे तो सोचना चाहिए था कि इतना अन्न बिखरा होने का कोई मतलब है। अब पछताए होत क्या. जब चिडिया चग गई खेत?” एक कबूतर रोने लगा—“हम सब मारे जाएंगे।”

बाकी कबूतर तो हिम्मत हार बैठे थे, पर सरदार गहरी सोच में डूबा था। एकाएक उसने कहा-“सुनो, जाल मजबूत है यह ठीक है, पर इसमें भी इतनी शक्ति नहीं है कि एकता की शक्ति को हरा सके। हम अपनी सारी शक्ति को 0 जोड़ें तो मौत के मुंह में जाने से बच सकते हैं।”

युवा कबूतर फड़फड़ाया-“चाचा! साफ-साफ बताओ तुम क्या कहना चाहते हो। जाल ने हमें म तोड़ रखा है, शक्ति कैसे जोड़ें?”

सरदार बोला-“तुम सब चोंच से जाल को पकड़ो, फिर जब मैं फुर्र कहूं तो एक साथ जोर लगाकर उड़ना।”  सबने ऐसा ही किया। तभी जाल  बिछाने वाला बहेलियां आता नजर आया। जाल में कबूतरों को फंसा देख उसकी आंखें चमकी। हाथ में पकड़ा डंडा उसने मजबूती से पकड़ा व जाल की ओर दौड़ा। बहेलिया जाल से कुछ ही दूर था कि कबूतरों का सरदार बोला—“फुर्रर्रर्र!”।

सारे कबूतर एक साथ जोर लगाकर उड़े तो पूरा जाल हवा में ऊपर उठा और सारे कबूतर जाल को लेकर ही उड़ने लगे। कबूतरों को जाल सहित उड़ते देखकर बहेलिया अवाक रह गया। कुछ संभला तो जाल के पीछे दौड़ने लगा।

कबूतर सरदार ने बहेलिए को नीचे जाल के पीछे दौड़ते पाया तो उसका इरादा समझ गया। सरदार भी जानता था कि अधिक देर तक कबूतर दल के लिए जाल सहित उड़ते रहना संभव न होगा। पर सरदार के पास इसका उपाय था। निकट ही एक पहाड़ी पर बिल बनाकर उसका एक चूहा मित्र रहता था। सरदार ने कबूतरों को तेजी से उस पहाड़ी की ओर उड़ने का आदेश दिया। पहाड़ी पर पहुंचते ही सरदार का संकेत पाकर जाल समेत कबूतर चूहे के बिल के निकट उतरे।

सरदार ने मित्र चूहे को आवाज दी। सरदार ने संक्षेप में चूहे को सारी घटना बताई और जाल काटकर उन्हें आजाद करने के लिए कहा। कुछ ही देर में चूहे ने वह जाल काट दिया। सरदार ने अपने मित्र चूहे को धन्यवाद दिया और सारा कबूतर दल मुक्त आकाश की ओर आजादी की उड़ान भरने लगा। सीखः एकजुट होकर बड़ी से बड़ी विपत्ति का सामना किया जा सकता है।

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